साल 2022 की बात है। मैं उत्तराखंड के चमौली जिले के पास थी। रास्ते में चाय की तलब लगने पर एक ढाबे पर रुकी। ढाबे के पास एक किसान अपनी उपज बेच रहा था। उसकी मेज पर रखे भूरे लाल रंग के बीजों ने मेरा ध्यान आकर्षित किया जिसे वह “तोर” बता रहा था। यह नाम मेरे लिए नया था। मैंने 50 रुपए में उसका एक छोटा सा पैकेट खरीद लिया। मैं और शायद किसान भी इससे अनजान थे कि इन बीजों को जीआई (भोगौलिक संकेतक) टैग दिलाने के प्रयास किए जा रहे हैं। जीआई टैग उस उत्पाद को मिलता है जो केवल क्षेत्र विशेष में पाया जाता है और उसमें विशेष स्थानीय गुण निहित होते हैं।
पहाड़ी तोर अरहर की ही एक किस्म है, लेकिन यह मैदानी क्षेत्रों में पाई जाने वाली अरहर से काफी भिन्न है। वैसे वैज्ञानिकों के लिए दोनों ही कैजानस कैजान हैं। तोर की खेती पूरे उत्तराखंड में होती है, लेकिन चमोली, अल्मोड़ा, टिहरी गढ़वाल, नैनीताल, पिथौरागढ़ और चंपावत इसके मुख्य उत्पादन क्षेत्र हैं।
टिहरी गढ़वाल की एक स्थानीय एफपीओ सेवा कोशिश किसान उत्पादक स्वायत्त सहकारिता ने अप्रैल 2022 में उत्तराखंड ऑर्गेनिक कमोडिटी बोर्ड, उत्तराखंड सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण विभाग तथा नाबार्ड के सहयोग से इसको जीआई टैग दिलाने के लिए आवेदन किया था। चेन्नई स्थित जियोग्राफिकल इंडिकेशन रजिस्ट्री ने नवंबर 2023 में इसे यह टैग प्रदान किया।
तोर की विशेषता यह है कि यह अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों (लगभग 2,000 मीटर तक) में उग सकती है, यह अल्पकालिक किस्म है और सूखा सहन करने की भी क्षमता रखती है। यही कारण है कि यह उन इलाकों में आराम से उगाई जा सकती है जहां सिंचाई की सुविधा न हो। इसके अलावा, प्रदूषण रहित वातावरण में जैविक तरीके से उगाए जाने के कारण इसका स्वाद बहुत अच्छा होता है। यह दाल पहाड़ी भोजन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और अक्सर चौंसा जैसी पारंपरिक रेसिपियों में इस्तेमाल होती है, जिसमें इसे सूखा भूनकर दरदरे पाउडर में पीसा जाता है। फिर इसे लोहे की कढ़ाई में मसालों और जखिया के तड़के के साथ धीमी आंच पर पकाया जाता है। इसके अलावा यह मसालेदार तरी के साथ भी पकाया जा सकता है।
तोर लंबे समय से उत्तराखंड की पारंपरिक “बारहनाजा” खेती पद्धति का हिस्सा रही है। इस पद्धति में 12 या उससे अधिक फसलें एक साथ उगाई जाती हैं ताकि मौसम की अनिश्चित परिस्थितियों में भी अच्छी उपज सुनिश्चित हो सके। तोर के हरे बीज और फलियां भी सब्जी के रूप में खाई जाती हैं। इसके बीज का छिलका और भूसी दुधारू पशुओं के लिए पौष्टिक चारे का काम करते हैं। इसकी हरी पत्तियां और कोमल शाखाएं भी पशुओं के लिए पोषक चारा हैं।
अरहर में ऐसे यौगिक हैं जो इसे सूजनरोधी, जीवाणुरोधी, एंटी ऑक्सीडेंट, कैंसर रोधी और मधुमेह रोधी गुण प्रदान करते हैं
भारत अरहर का मूल उद्गम केंद्र माना जाता है। अध्ययनों से पता चलता है कि यह सबसे पहले पूर्वी प्रायद्वीपीय भारत के तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में जंगलों और मैदानी इलाकों की सीमा पर उगी थीं। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं थी कि वर्ष 2025 में ओडिशा के कोरापुट जिले के एक आदिवासी गांव में मुझे यह दलहन फिर से देखने को मिली। यहां मुझे इसे एक बिल्कुल अलग व्यंजन अंबिला में चखने का अवसर मिला।
भारत में अरहर की कई किस्मों को जीआई टैग प्राप्त है और प्रत्येक की अपनी अलग विशेषता है। उदाहरण के लिए, केरल की अट्टापडी थुवरा में बड़े, क्रीम रंग के बीज होते हैं। महाराष्ट्र की नवापुर तूर छोटे आकार और सफेद बीजों वाली किस्म है। कर्नाटक की गुलबर्गा तूर का स्वाद सौंधा और हल्का मीठा होता है। तेलंगाना की तंदूर रेड ग्राम में अन्य किस्मों की तुलना में अधिक प्रोटीन पाया जाता है। मध्य प्रदेश की बैंगनी अरहर जैसी कुछ अन्य किस्में भी जीआई टैग प्राप्त करने की प्रक्रिया में हैं।
8 मई 2024 को लेग्यूम साइंस पत्रिका में प्रकाशित एक शोधपत्र के अनुसार, अरहर प्रोटीन, आवश्यक अमीनो एसिड्स और खनिजों का उत्कृष्ट स्रोत है। इसके बीजों में थायमिन, एस्कॉर्बिक एसिड, राइबोफ्लेविन और नियासिन जैसे विटामिन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। अरहर में ऐसे यौगिक भी होते हैं जो इसे सूजनरोधी, जीवाणुरोधी, एंटीऑक्सीडेंट, कैंसररोधी और मधुमेह रोधी गुण प्रदान करते हैं।
यह दलहन भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक रूप से उगाई जाती है और वैश्विक उत्पादन का 75 प्रतिशत से अधिक हिस्सा भारत में होता है। आंध्र प्रदेश के पाटनचेरु स्थित इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स (इक्रिसेट) का जीन बैंक अरहर के आनुवंशिक संसाधनों का वैश्विक भंडार है और इसमें 74 देशों से प्राप्त 13,771 नमूने सुरक्षित हैं। इनमें अरहर की 13,216 खेती योग्य किस्मों के नमूने शामिल हैं। इस भंडार में 8,315 लैंडरेसेस, 4,830 प्रजनन सामग्री, 71 उन्नत किस्में और 555 जंगली किस्मों के नमूने शामिल हैं। भारत इसका सबसे बड़ा योगदानकर्ता है, जिसने 9,200 नमूने उपलब्ध कराए हैं।
इन किस्मों का उपयोग करके उन्नत किस्में विकसित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। अरहर की फसल 90 से 300 दिनों के बीच अपना चक्र पूरा करती है और किसानों की आय बढ़ाने के लिए कम अवधि वाली किस्मों के विकास पर काम हो रहा है। उत्तराखंड की पहाड़ी तोर पहले से ही अत्यंत कम अवधि में तैयार होने वाली किस्म है और जीआई टैग के आवेदन के अनुसार, यह मात्र 110 दिनों में पककर तैयार हो जाती है।
सामग्री
साबुत तोर: 1 कप
जखिया के बीज: 1 छोटा चम्मच
हरी मिर्च: 1 (बारीक कटी हुई)
लहसुन: 4-6 कलियां (कुटी हुई)
अदरक: 1 छोटा चम्मच (कद्दूकस किया हुआ)
टमाटर: 1 (कटे हुए टुकड़ों में)
प्याज: 1 (कटे हुए टुकड़ों में)
हल्दी पाउडर: 1/2 छोटा चम्मच
लाल मिर्च पाउडर: 1 छोटा चम्मच (स्वादानुसार)
सरसों का तेल: 2 बड़े चम्मच
नमक: स्वादानुसार
विधि: तोर दाल को अच्छी तरह साफ करके धो लें और कुछ घंटों के लिए पानी में भिगो दें। प्रेशर कुकर में दाल, हल्दी, नमक और 3 कप पानी डालकर दाल को नरम होने तक पकाएं। लोहे की कढ़ाई में सरसों का तेल गर्म करें और उसमें जखिया डालकर चटकने दें। फिर इसमें प्याज, लहसुन, अदरक और हरी मिर्च डालकर अच्छी तरह भूनें। एक कटोरी में लाल मिर्च पाउडर में थोड़ा पानी मिलाएं ताकि मसाले जलें नहीं, फिर इसे कढ़ाई में डालें। अब उबली हुई दाल डालकर अच्छी तरह मिलाएं। आवश्यकतानुसार पानी डालकर दाल का गाढ़ापन ठीक करें और धीमी आंच पर कुछ मिनट पकाएं ताकि सभी स्वाद अच्छी तरह मिल जाएं। इसे चावल या मंडवा (रागी) की रोटी के साथ परोसें।
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