भुवनेश्वर स्थित एम्स के डॉ. रामदास बालामुरुगन अनिल अग्रवाल डायलॉग को संबोधित करते हुए। फोटो: विकास चौधरी 
खान-पान

अनिल अग्रवाल डायलॉग 2026 : स्थानीय प्रीबायोटिक और खमीर वाले आहार से गर्भवती महिलाओं और बच्चों का स्वास्थ्य सुधार संभव

ग्रामीण और जनजातीय आबादी में माइक्रोबियल पैटर्न यानी सूक्ष्म जीवों की संरचना और उनकी उपस्थिति का ढांचा शहरों से पूरी तरह अलग हैं

Vivek Mishra

"आपका स्थानीय आहार खासतौर से बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए वरदान साबित हो सकता है। ऐसे आहार जिसमें प्रीबायोटिक यानी वह आहार तत्व जो आंतों के अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ने में मदद करता है और खमीर उठे या प्राकृतिक किण्वन से बने खाद्य पदार्थ हैं, वह आंतों के बैक्टीरिया को इस तरह से संतुलित कर सकते हैं जो पोषण की कमी को पूरा करने में सहायक हो सकते हैं।"

उड़ीसा में भुवनेश्वर स्थित एम्स के डॉ. रामदास बालामुरुगन ने 27 फरवरी, 2026 को राजस्थान के अलवर में निमली गांव स्थित अनिल अग्रवाल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में अनिल अग्रवाल डायलॉग 2026 के एक सत्र में वीडियो कांन्फ्रेंसिंग के जरिए यह बातें कही। वह डिस्बायोसिस (आंतों में अच्छे और बुरे बैक्टीरिया के संतुलन बिगड़ने की स्थिति) यानी आंतों में बैक्टीरिया असंतुलन के विकारों का अध्ययन करते हैं।

उन्होंने कहा कि आंतों में बैक्टीरिया सुधार का विचार उन्होंने मिट्टी के जीवविज्ञानी से लिया है। उन्होंने बताया कि जब वह एनीमिया और माइक्रोबायोम (शरीर या आंतों में मौजूद सूक्ष्म जीवों का समूह) पर काम शुरू किया तो वह कुपोषण पर विशेष ध्यान दे रहे थे ताकि कुपोषण जीवविज्ञान को समझ सकें और उसके लिए एक हस्तक्षेप यानी समस्या के समाधान के लिए तय किया गया विशेष उपाय डिजाइन कर सकें।

हमने देखा कि ग्रामीण और जनजातीय आबादी में माइक्रोबियल पैटर्न यानी सूक्ष्म जीवों की संरचना और उनकी उपस्थिति का ढांचा शहरों से पूरी तरह अलग हैं। एनीमिक व्यक्तियों में लैक्टोबैसिलस ( लाभकारी बैक्टीरिया की एक प्रमुख प्रजाति) की कमी और कुछ अन्य लाभकारी बैक्टीरिया का असंतुलन अधिक पाया गया। साथ ही, सेगमेंटेड फिलामेंटेस बैक्टीरिया (एसएफबी), यह आंत में पाई जाने वाली धागेनुमा संरचना वाले बैक्टीरिया का एक प्रकार है, इसकी मात्रा भी अधिक थी। एसएफबी दरअसल हल्की लेकिन लगातार रहने वाली अंदरूनी सूजन और आयरन अवशोषण में बाधा डालती है।

हमने अपने प्रयोग में मानव अध्ययन में गर्भवती महिलाओं को 180 दिन तक लगभग 60 एमजी आयरन प्रतिदिन दिया। शोधकर्ताओं ने पाया कि केवल 10 फीसदी आयरन ही अवशोषित हुआ, बाकी कोलन में जाकर कुछ बैक्टीरिया को बढ़ावा देता है और आंत की लाइनिंग में इंटरोसाइट आयरन ट्रैप यानी आंत की कोशिकाओं में आयरन फंस जाने की प्रक्रिया की वजह से आयरन ट्रैप्ड रहता है। यह प्रक्रिया बताती है कि केवल आयरन देने से एनीमिया का समाधान नहीं होता। इसी कारण, शोधकर्ताओं ने स्थानीय प्रीबायोटिक देने का तरीका अपनाया।

बच्चों के लिए प्रीबायोटिक चॉकलेट चिप कुकी, गर्भवती महिलाओं के लिए नेटिव योग बनाना शेक और फर्मेंटेड राइस वाटर (किण्वित चावल का पानी) दिया गया।

इन उपायों से बच्चों में खनिजों का अवशोषण बेहतर हुआ, आंत में शॉर्ट-चेन फैटी एसिड यानी आंत के बैक्टीरिया द्वारा फाइबर को तोड़ने पर बनने वाले लाभकारी वसा अम्ल बढ़ा और लाभकारी बैक्टीरिया का संतुलन सुधरा। खास बात यह रही कि नेटिव योग बनाना शेक के सेवन से बच्चों के स्टूल माइक्रोब्स (मल में मौजूद सूक्ष्म जीव) और ब्रेस्टमिल्क माइक्रोब्स (मां के दूध में मौजूद सूक्ष्म जीव) के बीच आपसी जुड़ाव और परस्पर क्रिया भी बढ़ा, जबकि जो बच्चे इसे नहीं पाते, उनमें इंटरैक्शन कम और कुछ हानिकारक बैक्टीरिया ज्यादा थे।

इस अध्ययन के साथ ही शोधकर्ताओं ने यह भी दिखाया कि भारत में खाद्य विविधता, जैसे मसाले, फर्मेंटेड फूड्स और हाई फाइबर डाइट्स (रेशे से भरपूर आहार) आंत के माइक्रोबियल वातावरण (आंत में मौजूद सूक्ष्म जीवों का समग्र वातावरण) को प्रभावित करती है। इसके अलावा, कृषि क्षेत्रों में भी सॉयल माइक्रोबायोम (मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म जीवों का समूह) पर शोध किया गया, जिसमें धान और चाय बागान के पौधों में माइक्रोबियल हस्तक्षेप से उनकी सेहत सुधारी गई और उनकी पैदावार भी बढ़िया हुई।

उन्होंने कहा कि यह साबित करता है कि महंगे सप्लीमेंट या विदेशी उत्पादों की बजाय, पारंपरिक और स्थानीय विकल्प अपनाना एनीमिया जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को कम करने में प्रभावी है।