दुनिया भर में मानवजनित गतिविधियों से हर साल लगभग 38 अरब टन सीओ2 उत्सर्जन होता है, जिससे जलवायु परिवर्तन तेजी से बढ़ रहा है।
वायु प्रदूषण और लू स्वास्थ्य संकट बढ़ा रही हैं, जिससे लाखों लोगों की मौत और गंभीर बीमारियां हो रही हैं।
रूस-यूक्रेन युद्ध के पहले चार वर्षों में लगभग 311 मिलियन टन सीओ2 उत्सर्जन हुआ, जो बड़े औद्योगिक देश के बराबर है।
भारत में 2020-21 से 2024-25 के बीच लगभग 97,000 हेक्टेयर वन भूमि गैर-वन कार्यों के लिए मंजूर की गई, जिससे जंगल घट रहे हैं।
वर्ष 2025 में भारत में लगभग 99 प्रतिशत दिनों में चरम मौसम घटनाएं दर्ज हुईं, जिससे 4,421 मौतें और फसलों का भारी नुकसान हुआ।
हर साल पांच जून को मनाया जाने वाला विश्व पर्यावरण दिवस आज केवल जागरूकता का अवसर नहीं रह गया है, बल्कि यह इस बात की चेतावनी बन चुका है कि जलवायु परिवर्तन अब हमारे रोजमर्रा के जीवन को सीधे प्रभावित कर रहा है। दुनिया भर में बढ़ते तापमान, प्रदूषण, बाढ़, सूखा और तूफान, चरम मौसम जैसी घटनाएं लोगों के घर, रोजगार और स्वास्थ्य को लगातार नुकसान पहुंचा रही हैं।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के नेतृत्व में मनाया जाने वाला यह दिवस 1973 से शुरू हुआ था। इसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के लिए वैश्विक स्तर पर लोगों, सरकारों और संस्थाओं को एक साथ लाना है। हर साल 150 से अधिक देशों में इसे मनाया जाता है।
इस साल विश्व पर्यावरण दिवस “जलवायु कार्रवाई” थीम के तहत मनाया जा रहा है, जो यह दर्शाता है कि अब केवल जागरूकता पर्याप्त नहीं, बल्कि ठोस और प्रभावी कदम उठाना अनिवार्य है।
जलवायु परिवर्तन और बढ़ता स्वास्थ्य संकट
जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह एक बड़ा स्वास्थ्य संकट बन चुका है। दुनिया के कई हिस्सों में लू या हीटवेव, वायु प्रदूषण और प्राकृतिक आपदाएं लोगों की जान ले रही हैं। विशेषकर दक्षिण-पूर्व एशिया में जलवायु परिवर्तन से होने वाली मौतों की संख्या सबसे अधिक बताई जाती है।
बढ़ते तापमान के कारण लू या हीटवेव की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे बुजुर्गों, बच्चों और बीमार लोगों पर सबसे अधिक असर पड़ता है। वायु प्रदूषण हर साल लाखों लोगों की मौत का कारण बन रहा है। बाढ़ और सूखे जैसी आपदाएं न केवल घरों और खेतों को नष्ट कर रही हैं, बल्कि पीने के पानी की कमी और बीमारियों के फैलाव का कारण भी बन रही हैं।
कार्बन उत्सर्जन और बढ़ता खतरा
वैश्विक स्तर पर मानवजनित गतिविधियों के कारण हर साल लगभग 38 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) वातावरण में छोड़ा जा रहा है। प्राकृतिक संसाधन जैसे जंगल, मिट्टी और महासागर इसका लगभग आधा हिस्सा अवशोषित कर लेते हैं, लेकिन बाकी हिस्सा वातावरण में जमा होता रहता है। इसी कारण पिछले दस वर्षों में सीओ2 की मात्रा लगातार बढ़ रही है।
यह वृद्धि देखने में भले ही छोटी लगे, लेकिन इसका प्रभाव बहुत बड़ा है। इसी वजह से पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है और मौसम के पैटर्न अस्थिर हो रहे हैं।
युद्ध और पर्यावरण पर प्रभाव
पर्यावरण पर केवल उद्योग और परिवहन का ही नहीं, बल्कि युद्धों का भी बड़ा असर पड़ रहा है। हाल ही में एक अध्ययन में पाया गया कि रूस-यूक्रेन युद्ध के पहले चार वर्षों में लगभग 31.1 करोड़ टन सीओ2 के बराबर उत्सर्जन हुआ। इसमें सेना की आवाजाही, लड़ाकू विमान, मिसाइलें और भारी हथियारों का उपयोग प्रमुख कारण रहे। यह उत्सर्जन एक बड़े औद्योगिक देश जैसे फ्रांस के वार्षिक उत्सर्जन के बराबर है। यह दिखाता है कि युद्ध केवल मानव जीवन को ही नहीं, बल्कि पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंचाते हैं।
भारत की पर्यावरणीय की स्थिति को लेकर क्या कहती है रिपोर्ट?
भारत में भी पर्यावरण की स्थिति चिंताजनक होती जा रही है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की "स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट 2026: इन फिगर्स" रिपोर्ट में कई गंभीर तथ्य सामने आए हैं।
रिपोर्ट बताती है कि 2020-21 से 2024-25 के बीच लगभग 97,000 हेक्टेयर वन भूमि को गैर-वन कार्यों के लिए मंजूरी दी गई। यह जंगलों के लगातार घटने का संकेत है, जो पर्यावरण संतुलन के लिए खतरा है।
इसके अलावा, पिछले कुछ वर्षों में हाथियों के हमलों की घटनाएं 10 राज्यों में बढ़ी हैं। साल 2025 के पहले छह महीनों में बाघों के हमलों में 40 लोगों की जान चली गई। यह मानव और वन्यजीव संघर्ष की बढ़ती समस्या को दर्शाता है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पर्यावरण से जुड़े मामलों की संख्या अदालतों में लगातार बढ़ रही है और 99,000 से अधिक मामले अभी भी लंबित हैं। इससे पता चलता है कि पर्यावरणीय समस्याएं कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर भी बड़ी चुनौती बन चुकी हैं।
चरम मौसम और कृषि पर असर
रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 में देश में लगभग हर दिन किसी न किसी हिस्से में चरम मौसम की घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें लू, बाढ़, भारी बारिश, तूफान और बिजली गिरने जैसी घटनाएं शामिल थीं। इन आपदाओं के कारण हजारों लोगों की मौत हुई और करोड़ों हेक्टेयर फसलें नष्ट हो गईं। कुल मिलाकर लगभग 1.74 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि प्रभावित हुई, जिससे किसानों की आजीविका पर गंभीर असर पड़ा।
पर्यावरण दिवस का संदेश
विश्व पर्यावरण दिवस का मुख्य संदेश यह है कि अब केवल जागरूकता पर्याप्त नहीं है, बल्कि वास्तविक कार्रवाई की आवश्यकता है। पेड़ लगाना, पानी बचाना, प्रदूषण कम करना और टिकाऊ जीवनशैली अपनाना अब विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बन चुके हैं।
आज की स्थिति यह संकेत देती है कि यदि तुरंत कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और अधिक गंभीर हो सकते हैं। इसलिए पर्यावरण की रक्षा केवल सरकारों की नहीं, बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी है।