इलेस्ट्रेशन- योगेंद्र आनंद 
पर्यावरण

युद्ध से पर्यावरण को मिले गहरे जख्म

हाल के भू-राजनीतिक संघर्ष हमें फिर से सोचने पर मजबूर कर रहे हैं। ये संघर्ष सवाल उठा रहे हैं कि युद्ध के दौरान पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कैसे समझा जाए। साथ ही, वे मौजूदा कानूनी ढांचे की सीमाओं को भी उजागर कर रहे हैं

Rituparna Sengupta

मार्च की शुरुआत में मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि इजराइल ने दक्षिणी लेबनान के रिहायशी इलाकों में व्हाइट फास्फोरस दागा। यह एक ज्वलनशील पदार्थ है जो हवा के संपर्क में आते ही जलने लगता है। इससे शरीर गंभीर रूप से झुलस जाता है। यह इंसानों, जानवरों और पर्यावरण के लिए जानलेवा खतरे पैदा करता है। इससे एक महीने पहले लेबनानी अधिकारियों ने एक और रिपोर्ट दी थी। उन्होंने बताया कि एक इजरायली विमान ने कृषि क्षेत्रों पर गाढ़े “ग्लाइफोसेट” का छिड़काव किया था। इसकी मात्रा खेती में इस्तेमाल होने वाले सामान्य स्तर से कई गुना ज्यादा थी। ग्लाइफोसेट एक शाकनाशी है। हवा से इसका छिड़काव जल स्रोतों और मिट्टी को बुरी तरह प्रदूषित कर सकता है। “कॉन्फ्लिक्ट एंड एनवायरनमेंट ऑब्जर्वेटरी” ब्रिटेन की एक गैर-लाभकारी संस्था है। इसने पश्चिम एशिया में चल रहे मौजूदा संघर्ष से जुड़ी ऐसी 120 घटनाओं की पहचान की है, जिनमें पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया गया है। ये घटनाएं दिखाती हैं कि युद्ध के अप्रत्यक्ष नतीजों में पर्यावरण को होने वाला नुकसान भी शामिल है।

मार्च की शुरुआत में खबरें आईं कि इजरायल ने अपने हवाई हमलों में तेहरान के आसपास कई तेल डिपो और रिफाइनरियों को निशाना बनाया। इन हमलों की वजह से भीषण आग लग गई। इससे कालिख, हाइड्रोकार्बन और प्रदूषण फैलाने वाले अन्य तत्वों का भारी गुबार निकलने लगा। स्थानीय निवासियों ने कालिख से भरी “काली बारिश” होने की भी जानकारी दी। अधिकारियों और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने इस तरह की अम्लीय वर्षा की चेतावनी दी है। ऐसा जलते हुए ईंधन से निकलने वाले सल्फर और नाइट्रोजन के यौगिकों के वातावरण में घुलने के कारण होता है।

जब ऐसी घटनाएं होती हैं, तो यह देखना जरूरी हो जाता है कि युद्ध के दौरान पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कैसे परिभाषित और रेगुलेट किया जाए। हमें यह समझना होगा कि इसे किस स्तर पर केवल एक आकस्मिक प्रभाव न मानकर नुकसान की एक अलग श्रेणी माना जाना चाहिए। सशस्त्र संघर्षों में जानबूझकर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने का सबसे चर्चित ऐतिहासिक उदाहरण वियतनाम युद्ध है। इसमें “एजेंट ऑरेंज” जैसे केमिकल्स का इस्तेमाल किया गया था। बड़े पैमाने पर किए गए इस केमिकल के हवाई छिड़काव ने दशकों तक जंगलों के पारिस्थितिकी तंत्र को बदल दिया। इससे मिट्टी और पानी के स्रोत भी प्रदूषित हो गए। तब से अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के जरिए युद्ध के नियमों में पर्यावरण संरक्षण को शामिल करने की कोशिश हो रही है। जेनेवा कन्वेंशन के 1977 के “अतिरिक्त प्रोटोकॉल” में युद्ध के उन तरीकों पर रोक लगाई गई है, जिनसे प्राकृतिक पर्यावरण को व्यापक, दीर्घकालिक और गंभीर नुकसान होने की आशंका हो। इसी तरह, 1992 के “पर्यावरण और विकास पर रियो घोषणापत्र” में 27 सिद्धांत अपनाए गए थे। इसका सिद्धांत 24 यह मानता है कि युद्ध स्वाभाविक रूप से सतत विकास के लिए विनाशकारी है।

“इंटरनेशनल कमेटी ऑफ द रेड क्रॉस” द्वारा मार्च 2025 में प्रकाशित एक विश्लेषण में कहा गया है इन प्रावधानों के बावजूद, जवाबदेही तय करने वाले तंत्र सीमित हैं। उन्हें व्यवहारिक तौर पर लागू करना कठिन है। उदाहरण के लिए, रोम स्टेट्यूट के अनुच्छेद 8(2)(बी)(iv) को देखें। इसे 1998 में संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों ने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) बनाने के लिए पारित किया था। इसके तहत पर्यावरण का विनाश एक युद्ध अपराध माना जा सकता है। ऐसा तब होता है जब कोई हमला जानबूझकर किया जाए और उससे पर्यावरण को व्यापक, दीर्घकालिक और गंभीर नुकसान हो। साथ ही यह नुकसान अपेक्षित सैन्य लाभ की तुलना में बहुत अधिक होना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में व्यवहारिक तौर पर इस प्रावधान का कभी इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसकी मुख्य वजह सबूतों के लिए तय किए गए कड़े मानक हैं। इसके तहत अपराधी के इरादे और उसकी जानकारी, दोनों को साबित करना जरूरी होता है। इसका मुख्य कारण सबूतों का बहुत ऊंचा पैमाना है। इसमें हमले के पीछे का “इरादा” और “जानकारी” दोनों को साबित करना जरूरी होता है।

इन सीमाओं की वजह से “इकोसाइड” की अवधारणा पर बहस फिर से तेज हो गई है। यह शब्द पहली बार 1970 के दशक में वियतनाम में हुए पर्यावरण विनाश की चर्चा के दौरान सामने आया था। अब यह कानूनी चर्चाओं में फिर से उभरा है। इसका मकसद बड़े पैमाने पर होने वाले पारिस्थितिक नुकसान को एक अलग अंतरराष्ट्रीय अपराध के रूप में पहचान दिलाना है। 2021 में “स्टॉप इकोसाइड इंटरनेशनल” द्वारा गठित एक स्वतंत्र पैनल ने इकोसाइड की परिभाषा प्रस्तावित की थी। इसके अनुसार इकोसाइड का मतलब ऐसे गैर-कानूनी या लापरवाही भरे कृत्य हैं, जो यह जानते हुए किए जाएं कि उनसे पर्यावरण को गंभीर, व्यापक या दीर्घकालिक नुकसान होने की संभावना है। 2024 में वनुआतु, फिजी और समोआ ने औपचारिक रूप से एक प्रस्ताव रखा। उन्होंने रोम स्टेट्यूट के तहत इकोसाइड को पांचवें अंतरराष्ट्रीय अपराध के रूप में मान्यता देने की मांग की। इससे जवाबदेही का दायरा केवल युद्ध तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें प्रदूषण और वनों की कटाई जैसी गतिविधियां भी शामिल होंगी। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे नियमों को अपनाने में अभी भी अनिश्चितता की स्थिति कायम है। उदाहरण के लिए, अमेरिका ने साल 2000 में रोम स्टेट्यूट पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन उसने कभी इसकी पुष्टि नहीं की। साल 2002 में उसने अपने हस्ताक्षर वापस ले लिए। इसी तरह, इजराइल ने बार-बार दोहराया है कि वह रोम स्टेट्यूट का हिस्सा नहीं है। उसने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को भी चुनौती दी है।

ब्रिटेन स्थित एक गैर-लाभकारी संस्था ने 120 ऐसी घटनाओं की पहचान की है जो पूरे पश्चिम एशिया में चल रहे मौजूदा संघर्ष के दौरान पर्यावरण को हुए नुकसान से जुड़ी हैं

संघर्ष के दौर में पारिस्थितिकी तंत्र

लेबनान और ईरान की घटनाएं एक पुरानी और लंबी बहस का हिस्सा हैं। यह बहस इस बारे में है कि जमीन, ताकत और नियंत्रण की लड़ाई कैसे धीरे-धीरे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती है। विशेषज्ञों और पत्रकारों के मुताबिक, इजरायल ने दशकों तक वृक्षारोपण अभियान चलाए। इनके जरिए उन जगहों पर विदेशी सदाबहार पेड़ लगाए गए, जहां पहले फिलिस्तीनी गांव हुआ करते थे। वहां की स्थानीय प्रजातियों की जगह यूरोपीय चीड़ के पेड़ लगा दिए गए। पेड़ों की ये प्रजातियां जैव विविधता पर बुरा असर डालती हैं। ये मिट्टी की रासायनिक संरचना और आग लगने के पैटर्न को भी बदल देती हैं। ये बदलाव समय के साथ धीरे-धीरे सामने आते हैं। हरियाली और वनस्पतियों में होने वाले ये बदलाव वहां की संस्कृति और लोगों के जुड़ाव के अहसास को भी बदल देते हैं। इससे एक और सवाल पैदा होता है, जब पर्यावरण में बदलाव का इस्तेमाल वहां के इकोसिस्टम और सदियों से रह रहे समुदायों को हटाने के लिए किया जाए, तो क्या इसे भी “इकोसाइड” के दायरे में रखा जा सकता है?

थिंक टैंक “क्लाइमेट एंड कम्युनिटी इंस्टीट्यूट” के शोधकर्ताओं का अनुमान है कि पश्चिम एशिया में बमबारी के शुरुआती 14 दिनों में ही 50 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर उत्सर्जन हुआ है। यह मात्रा आइसलैंड के पूरे साल के उत्सर्जन (लगभग 42.8 लाख टन) से भी ज्यादा है। सैन्य अभियान जारी रहने के साथ इस उत्सर्जन में भारी बढ़ोतरी होने की आशंका है। तेल बुनियादी ढांचे में लगी अनियंत्रित आग इसकी एक बड़ी वजह है। साथ ही, हथियारों के भंडार को फिर से भरने और अतिरिक्त नौसैनिक बलों की तैनाती से भी उत्सर्जन बढ़ रहा है। हॉर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से स्थिति और गंभीर हो सकती है। रिफाइनरियों और टैंकरों को पहुंचने वाला नुकसान आर्थिक और पर्यावरणीय बोझ को और ज्यादा बढ़ा सकता है।

आज के समय में भू-राजनीतिक संघर्ष तेज हो रहे हैं। पर्यावरण को होने वाला नुकसान अब रणनीतिक सैन्य उद्देश्यों के साथ गहराई से जुड़ता जा रहा है। साथ ही, दुनिया के कुछ सबसे शक्तिशाली देश अंतरराष्ट्रीय आपराधिक ढांचों से बाहर हैं। कुछ देश इनके अधिकार क्षेत्र को चुनौती दे रहे हैं। इससे वैश्विक स्तर पर कानूनी जवाबदेही को मजबूत करने की कोशिशें और भी मुश्किल हो गई हैं।

(प्रीथा बनर्जी से मिले इनपुट के साथ)