घाटबरा मामले ने ध्यान आकर्षित किया क्योंकि अडानी समूह की हसदेव अरंड में खनन गतिविधियों को पर्यावरण विनाश और स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले प्रभाव के कारण विरोध सामना करना पड़ा है (फोटो सौजन्य: X/@LicypriyaK)
पर्यावरण

देश की सर्वोच्च पर्यावरण अदालत के छह महीने : पर्यावरण और जनहित पक्ष हारा, उद्योग को 59 फीसदी मामलों में राहत

2026 में जनवरी से जून तक एनजीटी की पांचों पीठों ने 119 अपीलों का निपटारा किया। मेरिट पर तय 67 मामलों में पर्यावरण और जनहित पक्ष की सभी 16 अपीलें खारिज हुईं, जबकि उद्योग, परियोजना प्रस्तावक और संपत्ति मालिक पक्ष को 51 में से 30 मामलों में राहत मिली

Vivek Mishra

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में जनवरी से जून 2026 के बीच पर्यावरण और जनहित पक्ष की दाखिल की गई 16 अपीलों में से एक भी अपील मेरिट के आधार पर सफल नहीं हुई। इसके उलट उद्योग, परियोजना प्रस्तावकों और संपत्ति मालिकों की 51 अपीलों में 30 में उन्हें अनुकूल आदेश मिला। यह आंकड़ा 58.8 प्रतिशत सफलता दर के बराबर है।

साउथ एशियन रिपोर्टर ऑन एनवायरनमेंटल लॉ (सारेल) की रिपोर्ट के मुताबिक, इस अवधि में एनजीटी की पांचों पीठों ने कुल 119 अपीलों का निपटारा किया। इनमें एनजीटी की पुणे स्थित पश्चिमी, भोपाल स्थित मध्य, नई दिल्ली स्थित प्रधान पीठ, चेन्नई स्थित दक्षिणी और पूर्वी क्षेत्र की पीठ शामिल रहीं।

119 मामलों में 52 अपीलें प्रक्रियागत आधार पर निपटा दी गईं और उनके गुण-दोष पर सुनवाई नहीं हुई। इस तरह 67 मामलों में ही मेरिट के आधार पर फैसला हुआ। इनमें पर्यावरण या जनहित पक्ष की सभी 16 अपीलें खारिज हुईं। उद्योग पक्ष की 51 अपीलों में 30 को राहत मिली, तीन में यथास्थिति बरकरार रही और 18 खारिज हुईं।

पुणे में सर्वाधिक मामले, पर्यावरण पक्ष की सभी अपीलें खारिज

पश्चिमी क्षेत्र पीठ पुणे ने छह महीनों में सबसे अधिक 74 अपीलों का निपटारा किया। इनमें 41, यानी करीब 55 प्रतिशत, प्रक्रियागत आधार पर ही खत्म हो गईं।

मेरिट पर तय 33 मामलों में नौ अपीलें पर्यावरण या जनहित पक्ष की थीं और 24 उद्योग, परियोजना प्रस्तावक या संपत्ति मालिक पक्ष की। पर्यावरण पक्ष की सभी नौ अपीलें खारिज हुईं, जबकि उद्योग पक्ष की 24 में से 15 अपीलों में राहत मिली। उद्योग पक्ष की सफलता दर 62.5 प्रतिशत रही।

मिसाल के तौर पर गुजरात खेदुत समाज बनाम केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय मामले में किसानों ने वडोदरा-मुंबई एक्सप्रेसवे को दी गई पर्यावरणीय स्वीकृति को चुनौती दी थी। जन-सुनवाई में प्रक्रियागत उल्लंघन के आरोप को पीठ ने असिद्ध पाया।

वहीं, सुवर्ण राजाराम बांदेकर बनाम गोवा तटीय क्षेत्र प्रबंधन प्राधिकरण में रेत के टीलों को हुए नुकसान की बहाली का मुद्दा उठाया गया। पीठ ने कहा कि प्राकृतिक बहाली पहले ही हो चुकी थी, हालांकि बचा हुआ मलबा हटाने का निर्देश दिया।

ब्रैकिश वाटर रिसर्च सेंटर बनाम एसईआईएए, गुजरात में गुजरात अल्कलीज एंड केमिकल्स लिमिटेड की पर्यावरणीय स्वीकृति को खतरनाक अपशिष्ट प्रबंधन के आधार पर चुनौती दी गई थी। पीठ ने कहा कि कैप्टिव टीएसडीएफ के लिए अलग स्वीकृति जरूरी नहीं थी।

इसी तरह शमशीर अब्दुल वहाब खान बनाम महाराष्ट्र राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण के तीन जुड़े मामलों में रेत खनन परियोजनाओं की पर्यावरणीय स्वीकृतियों को त्रुटिपूर्ण रीप्लेनिशमेंट अध्ययन के आधार पर चुनौती दी गई थी। तीनों स्वीकृतियां बरकरार रहीं।

उद्योग पक्ष के मामलों में अनुकूल आदेश का प्रमुख पैटर्न पर्यावरणीय स्वीकृति की अस्वीकृति को रद्द कर मामले को दोबारा विचार के लिए संबंधित प्राधिकरण के पास भेजना रहा। ऐसा खिमजीभाई लक्ष्मणभाई चावड़ा और पांच जुड़े मामलों तथा जादवजी रविजी वेखरिया बनाम एसईआईएए, गुजरात में हुआ।

हालांकि, उद्योग पक्ष की सभी अपीलों में राहत नहीं मिली। कुछ मामलों में अधिकरण ने पर्यावरण से जुड़े आदेशों को बरकरार रखा, जिनमें अवैध सीआरजेड निर्माण को ध्वस्त करने और पर्यावरणीय स्वीकृति की अस्वीकृति कायम रखने के आदेश शामिल थे।

भोपाल पीठ में तकनीकी जीत, लेकिन व्यावहारिक राहत नहीं

मध्य क्षेत्र पीठ, भोपाल ने 10 प्रमुख अपीलों का निपटारा किया। इनमें तीन पर्यावरण पक्ष और पांच उद्योग पक्ष की थीं। कपिल अग्रवाल समूह की करीब 24 जुड़ी अपीलों को एक प्रमुख अपील के रूप में गिना गया।

पर्यावरण पक्ष की एक अपील ताहिर हुसैन बनाम राजस्थान सरकार व अन्य (अपील संख्या 03/2025) तकनीकी रूप से “एलाउड” हुई। 13 मई 2026 को न्यायमूर्ति शियो कुमार सिंह और डॉ. अफरोज अहमद की पीठ ने फैसला सुनाया।

मामला राजस्थान की फरवरी 2025 की भूजल दिशा-निर्देशिका से जुड़ा था। इसमें “सरकारी पेयजल आपूर्ति योजनाओं” को केंद्रीय भूजल प्राधिकरण की सख्त एनओसी व्यवस्था से छूट दी गई थी।

लेकिन फैसला आने से पहले ही राज्य सरकार ने सीजीडब्ल्यूए की आपत्ति के बाद दिशा-निर्देशिका वापस ले ली थी। अधिकरण ने भी इसे पहले ही वापस ली जा चुकी अधिसूचना मानते हुए रद्द घोषित किया।

फैसले में भूजल संरक्षण को लेकर कोई नया दायित्व नहीं लगाया गया और न ही ऐसी राहत दी गई जिसे राज्य सरकार पहले ही स्वीकार न कर चुकी हो। इस वजह से रिपोर्ट ने इसे पर्यावरण पक्ष की वास्तविक मेरिट-आधारित जीत के रूप में नहीं गिना। पुनर्गणना के बाद भोपाल पीठ में पर्यावरण पक्ष का रिकॉर्ड 0/3 रहा और अखिल भारतीय आंकड़ा 0/16 रहा।

शेष दो पर्यावरण अपीलें भी खारिज हुईं। किशन विकास सेवा समिति, मेसिया बनाम राजस्थान सरकार में पर्यावरणीय स्वीकृति को जनहित में चुनौती दी गई थी। सुरजीत सिंह बनाम मध्य प्रदेश एसईआईएए में भी स्वीकृति को चुनौती दी गई।

उद्योग पक्ष की पांच अपीलों में एक एम/एस यूनिवर्सल रिसोर्सेज में पर्यावरणीय स्वीकृति से जुड़े मुद्दे पर राहत मिली। बाकी चार अपीलें खारिज हुईं या अपीलकर्ताओं के पक्ष में नहीं गईं।

दिल्ली में यथास्थिति

प्रधान पीठ, नई दिल्ली ने 20 अपीलों का निपटारा किया। इनमें आठ, यानी 40 प्रतिशत, प्रक्रियागत आधार पर खत्म हुईं। मेरिट पर तय 12 मामलों में दो पर्यावरण पक्ष और 10 उद्योग पक्ष की थीं। दोनों पर्यावरण अपीलें खारिज हुईं।

पर्यावरण कार्यकर्ता सुदीप श्रीवास्तव की अपील में गेवरा-पेंड्रा रेल गलियारे के लिए दी गई वन स्वीकृतियों को चुनौती दी गई थी। पीठ ने कहा कि वैकल्पिक मार्ग पर विचार किया गया था और उसे अव्यावहारिक पाया गया था। पूर्व स्वीकृति के निष्कर्ष इसलिए बरकरार रहे।

संतोष कुमार सिंह के मामले में जैव-चिकित्सा अपशिष्ट उपचार सुविधा की पर्यावरणीय स्वीकृति को चुनौती दी गई थी। पीठ ने कहा कि सीबीडब्ल्यूटीएफ दिशा-निर्देशों के तहत जरूरी अंतराल विश्लेषण और स्थल चयन मानदंडों का पालन हुआ था।

उद्योग पक्ष की 10 अपीलों में पांच में अनुकूल आदेश आया।

जॉनसन मैथे केमिकल्स इंडिया के मामले में पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति 42 लाख रुपये से घटाकर 38.5 लाख रुपये कर दी गई।

एम/एस चारमीनार जॉइंटिंग्स मामले में बंदी का आदेश रद्द कर सीएक्यूएम को मामले पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया गया। इकाई को बिजली बहाल कर परिचालन शुरू करने की अनुमति भी दी गई।

तीन मामलों में सीएक्यूएम के फैसले लंबित रहने तक यथास्थिति कायम रखी गई। दो अपीलें खारिज हुईं।

चेन्नई पीठ में अंतर सबसे ज्यादा

दक्षिणी क्षेत्र पीठ, चेन्नई में उद्योग पक्ष की सफलता दर 75 प्रतिशत रही। हालांकि पर्यावरण पक्ष की यहां केवल एक अपील थी, इसलिए दोनों पक्षों के आंकड़ों की तुलना सीमित नमूने पर आधारित है।

आरण्य, परिसरा मधु हवामाना बदलावने संघ बनाम कर्नाटक सरकार में 400 केवी ट्रांसमिशन लाइन के लिए पेड़ काटने की अनुमति को चुनौती दी गई थी। अधिकरण ने अपील को निष्प्रभावी और ग्राह्य न मानते हुए खारिज कर दिया, क्योंकि पेड़ों की कटाई पहले ही हो चुकी थी।

उद्योग पक्ष की 12 में से नौ अपीलों में राहत मिली। इनमें कई मामले खनन और क्वारीइंग परियोजनाओं की पर्यावरणीय स्वीकृति की अस्वीकृति से जुड़े थे। अधिकरण ने ऐसे मामलों में अस्वीकृति को रद्द कर दोबारा विचार के लिए भेजा।

इनमें के. रविकुमार बनाम एसईआईएए, तमिलनाडु और राजा जेबादोस बनाम एसईआईएए शामिल हैं। राजा जेबादोस मामले में वन्यजीव सुरक्षा उपायों के साथ पुनर्विचार का निर्देश दिया गया।

वीपीएमआर कंस्ट्रक्शन बनाम तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में सहमति-से-संचालन आवेदन पर पुनर्विचार का अवसर दिया गया। साथ ही अधिकरण ने पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाने का निर्देश दिया।

पूर्वी पीठ में सिर्फ एक मामला

पूर्वी क्षेत्र पीठ ने जनवरी-जून 2026 के दौरान सिर्फ एक मामले का निपटारा किया। यह जनहित पक्ष की अपील थी और खारिज कर दी गई।

इस अवधि में पीठ ने किसी परियोजना प्रस्तावक की अपील का निपटारा नहीं किया। इसलिए अखिल भारतीय आंकड़े में पूर्वी पीठ का योगदान एक पर्यावरण पक्ष की खारिजी के रूप में दर्ज हुआ।

119 मामलों में 52 प्रक्रियागत आधार पर खत्म

छह महीने के आंकड़ों में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि सभी 119 अपीलें मेरिट पर नहीं पहुंचीं। 52 मामले सीमा अवधि, क्षेत्राधिकार, ग्राह्यता या वापसी जैसे प्रक्रियागत आधारों पर निपटा दिए गए। यानी करीब 44 प्रतिशत मामलों में अधिकरण ने विवाद के मूल पर्यावरणीय या परियोजना-संबंधी मुद्दे पर फैसला नहीं दिया।

मेरिट पर तय 67 मामलों में पर्यावरण या जनहित पक्ष की 16 अपीलों में कोई अनुकूल फैसला नहीं आया। उद्योग, परियोजना प्रस्तावक और संपत्ति मालिक पक्ष की 51 अपीलों में 30 में राहत मिली, तीन में यथास्थिति रही और 18 खारिज हुईं।

रिपोर्ट के आंकड़े यह भी दिखाते हैं कि अनुकूल आदेश का एक प्रमुख रूप अस्वीकृत पर्यावरणीय स्वीकृति को रद्द कर मामले को संबंधित प्राधिकरण के पास पुनर्विचार के लिए भेजना रहा। पश्चिमी और दक्षिणी पीठों में ऐसे मामले खास तौर पर दिखाई देते हैं।

रीमांड का अर्थ अपने आप में अंतिम पर्यावरणीय स्वीकृति नहीं है। ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय संबंधित प्राधिकरण के पुनर्विचार के बाद होना होता है। कुछ मामलों में अधिकरण ने पुनर्विचार के साथ अतिरिक्त शर्तें भी लगाईं, जैसे वन्यजीव सुरक्षा उपाय या पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति।

जनवरी-जून 2026 के इस छह महीने के आंकड़े इसलिए एनजीटी में दाखिल अपीलों के तत्काल नतीजों की तस्वीर पेश करते हैं। ये आंकड़े किसी परियोजना के अंतिम पर्यावरणीय प्रभाव या किसी एक मामले के व्यापक प्रभाव का स्वतंत्र आकलन नहीं हैं।