सुप्रीम कोर्ट ने हाल के दो महत्वपूर्ण मामलों में यह स्पष्ट संकेत दिया है कि पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों में न तो नियमों से समझौता होगा और न ही संस्थागत जवाबदेही से।
एक ओर, उत्तराखंड के नैनीताल स्थित जीलिंग एस्टेट में प्रस्तावित फाइव स्टार होटल एवं रिसॉर्ट परियोजना पर अदालत ने केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) से विस्तृत जमीनी सर्वे और पर्यावरणीय जांच कराने का आदेश दिया है।
अदालत ने कहा कि पर्यावरणीय मंजूरी, भवन स्वीकृति, पेड़ों की कटाई, वन क्षेत्र को हुए नुकसान और सरकारी भूमि पर अतिक्रमण जैसे पहलुओं की पुष्टि के बिना परियोजना को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
दूसरी ओर, कर्नाटक के राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण और राज्य स्तरीय विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति में कथित रूप से अयोग्य और राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की नियुक्ति पर भी सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए सभी संबंधित पक्षों से जवाब तलब किया है।
इन दोनों मामलों से साफ है कि शीर्ष अदालत केवल पर्यावरणीय कानूनों के पालन पर ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय निर्णय लेने वाली संस्थाओं की पारदर्शिता, विशेषज्ञता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए भी गंभीर है।
उत्तराखंड के नैनीताल जिले स्थित 'जीलिंग एस्टेट' में प्रस्तावित फाइव स्टार होटल और रिसॉर्ट परियोजना पर सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत पर्यावरणीय जांच के आदेश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह जांच पूरी होने के बाद ही तय किया जाएगा कि इस क्षेत्र में निर्माण की अनुमति दी जा सकती है या नहीं।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने 16 जुलाई 2026 को सुनवाई करते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध दस्तावेजों और सुनवाई के दौरान अपीलकर्ताओं की ओर से प्रस्तुत गूगल इमेज का अवलोकन करने के बाद यह आवश्यक हो गया है कि किसी स्वतंत्र निगरानी एजेंसी से पूरे क्षेत्र का विस्तृत सर्वे कराया जाए।
इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) को निर्देश दिया कि वह क्षेत्र का व्यापक निरीक्षण करने के लिए एक सक्षम अधिकारी नियुक्त करे। साथ ही इस बारे में तीन सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत करने को कहा गया है।
पर्यावरणीय मंजूरी पर उठे बड़े सवाल
अदालत ने कहा कि सर्वेक्षण और निरीक्षण के दौरान सीईसी यह भी जांचेगी कि क्या यह परियोजना पर्यावरणीय मंजूरी और संबंधित स्थानीय प्राधिकरण से भवन निर्माण योजना की स्वीकृति के बिना शुरू की जा सकती है। साथ ही यह भी देखा जाए कि प्रोजेक्ट साइट तक पहुंचने के लिए बनाई गई सड़क के निर्माण के दौरान कहीं पेड़ों की कटाई, वन क्षेत्र को नुकसान या सरकारी भूमि पर अतिक्रमण तो नहीं हुआ।
समिति को पिछले 10 वर्षों में इस इलाके के 'ट्री-कवर' (पेड़ों के आवरण) में आए बदलाव का तुलनात्मक अध्ययन कर रिपोर्ट भी अदालत में सौंपनी होगी। अदालत ने सभी संबंधित पक्षों को सर्वे के लिए आवश्यक दस्तावेज और जानकारी उपलब्ध कराने का भी आदेश दिया।
क्या है पूरा विवाद?
यह मामला नैनीताल जिले के भीमताल–मुक्तेश्वर क्षेत्र स्थित जीलिंग एस्टेट में निर्माण और विकास गतिविधियों से जुड़ा है। यहां प्रस्तावित 'देवान्या' फाइव स्टार होटल एवं रिसॉर्ट सहित अन्य परियोजनाओं को लेकर आशंका जताई गई है कि इससे संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंच सकता है।
साथ ही इसकी वजह से वन्यजीवों के प्राकृतिक आवाजाही में बाधा उत्पन्न हो सकती है।
अब इस मामले में सीईसी की रिपोर्ट ही तय करेगी कि नैनीताल की संवेदनशील पहाड़ियों में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन संभव है या नहीं। अदालत का अंतिम फैसला इसी जमीनी जांच और पर्यावरणीय तथ्यों पर आधारित होगा।
योग्य विशेषज्ञों की जगह राजनीतिक नियुक्तियां? कर्नाटक की पर्यावरण संस्थाओं पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
कर्नाटक में राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (एसईआईएए) और राज्य स्तरीय विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (एसईएसी) में आवश्यक योग्यता न रखने वाले लोगों को अध्यक्ष और सदस्य बनाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
17 जुलाई 2026 को हुई सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि महेश ए एन नामक एक पूर्णकालिक राजनीतिज्ञ को इन संस्थाओं में नियुक्त किया गया, जबकि नियमों के अनुसार यदि विशेषज्ञ उपलब्ध न हों, तभी पर्याप्त अनुभव रखने वाले पेशेवरों पर विचार किया जाना चाहिए।
लेकिन इस अनिवार्य शर्त को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि निजी प्रतिवादियों के पास पारिस्थितिकी और पर्यावरण के क्षेत्र में पर्याप्त अनुभव नहीं है। ऐसे में उनकी नियुक्तियां नियमों की भावना के विपरीत हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा है।
अब अदालत इस बात की जांच करेगी कि क्या इन नियुक्तियों में निर्धारित नियमों और योग्यता संबंधी मानकों का पालन किया गया था।