निकोबार द्वीपसमूह  फोटो साभार :आई-स्टॉक
पर्यावरण

एनजीटी ने अंडमान-निकोबार की बंदरगाह परियोजना को दी मंजूरी, सभी याचिकाएं की खारिज

ट्रिब्यूनल ने इस मेगा परियोजना को हासिल हुई पर्यावरणीय मंजूरी (ईसी) और तटीय क्षेत्र नियमावली (आईसीआरजेड-2019) की शर्तों के तहत आगे बढ़ाने की अनुमति दी है

Vivek Mishra

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने तमाम आलोचानों और विनाशकारी पर्यावरणीय चेतावनियों के बीच अंडमान निकोबार के गैलेथिया खाड़ी में प्रस्तावित बंदरगाह निर्माण परियोजना को हरी झंडी दे दिया है और ग्रेट निकोबार परियोजना से संबंधित याचिकाएं निरस्त कर दी हैं।

अंडमान और निकोबार के ग्रेट निकोबार द्वीप पर स्थित गैलेथिया बे एक प्रमुख पारिस्थितिक और रणनीतिक स्थान है। यहां भारत का 13वां प्रमुख बंदरगाह मेगा इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट (आसीटीपी) विकसित किया जा रहा है। यह स्थान दुर्लभ लेदरबैक कछुओं के घोंसले के लिए महत्वपूर्ण रहा है, लेकिन अब यह एक बड़े बुनियादी ढांचे के विकास का केंद्र है।

एनजीटी का यह आदेश कोलाकाता स्थित पूर्वी क्षेत्र पीठ ने दिया है। यह आदेश एनजीटी के चेयरमैन और जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव, न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह, न्यायमूर्ति अरुण कुमार त्यागी और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए. सेंथिल वेल, डॉ. अफरोज अहमद, ईश्वर सिंह की ओर से 16 फरवरी को दिया गया।  

एनजीटी ने इस मेगा परियोजना को हासिल हुई पर्यावरणीय मंजूरी (ईसी) और तटीय क्षेत्र नियमावली (आईसीआरजेड-2019) की शर्तों के तहत आगे बढ़ाने की अनुमति दी है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि निर्माण कार्य आईसीआरजेड-2019 के प्रावधानों के अनुसार ही होगा और किसी भी निर्माण कार्य को सीआरजेड-आईए क्षेत्र में अनुमति नहीं दी जाएगी।

पीठ ने कहा, “हम पाते हैं कि परियोजना के पर्यावरणीय मंजूरी और तटीय क्षेत्र नियमावली की शर्तों का पालन किया जाएगा और इन शर्तों के तहत कार्य शुरू किया जाएगा। परियोजना के निर्माण में कोई उल्लंघन नहीं पाया गया है।”

अधिकरण ने माना कि ग्रेट निकोबार परियोजना का राष्ट्रीय सुरक्षा, सामरिक स्थिति तथा आर्थिक विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण महत्व है। कोर्ट ने कहा कि पर्यावरणीय स्वीकृति की शर्तों में कोरल संरक्षण संबंधी पर्याप्त व्यवस्था है और परियोजना स्थल पर प्रमुख कोरल रीफ मौजूद नहीं है। ट्रिब्यूनल ने पाया कि प्रभावित कोरल कॉलोनियों का वैज्ञानिक पद्धति से स्थानांतरण किया जाएगा।

वहीं, एनजीटी ने कहा कि उच्चाधिकार प्राप्त समिति ने यह माना कि बंदरगाह परियोजनाओं के लिए प्रासंगिक दिशा-निर्देशों के अनुसार एक गैर-मानसून मौसम का डेटा पर्याप्त है। अतः इस आधार पर स्वीकृति में हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं पाया गया।

ट्रिब्यूनल परियोजना की पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (ईआईए) और एक सीजन डेटा के आधार पर दी गई मंजूरी को वैध ठहराया, जबकि उच्चस्तरीय समिति द्वारा की गई समीक्षा को भी सही माना। कोर्ट ने जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जेडएसआई) द्वारा प्रस्तुत कोरल ट्रांसलोकेशन योजना को मंजूरी देते हुए कहा कि, "कोरल और अन्य समुद्री जीवन को बचाने के लिए ट्रांसलोकेशन योजना को लागू किया जाएगा और यह कार्य बिना किसी रुकावट के किया जाएगा।"

कोर्ट ने कहा, “जैसा कि जेएडएसआई ने रिपोर्ट दी है, गैलेथिया बे में कोई बड़ा कोरल रीफ नहीं पाया गया है, लेकिन जो छोटे-छोटे कोरल हैं, उन्हें ट्रांसलोट किया जाएगा।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सीआरजेड-आईए क्षेत्र में कोई निर्माण कार्य नहीं होगा और यह शर्त पर्यावरणीय मंजूरी के तहत पूरी तरह से लागू होगी।

वहीं, अदालत ने उच्चस्तरीय समिति द्वारा परियोजना की सभी गतिविधियों की निगरानी करने के बाद, यह निर्णय लिया कि यह परियोजना सीआरजेड -III क्षेत्र में स्थित है और इसके निर्माण कार्य में कोई उल्लंघन नहीं किया गया है।

अदालत ने यह भी कहा, “हम पाते हैं कि परियोजना के तहत निर्माण कार्य सीआरजेड -III के तहत ही होंगे और तटीय क्षेत्रों के संरक्षण के लिहाज से कोई भी गतिविधि सीआरजेड-आईए क्षेत्र में नहीं की जाएगी।”

कोर्ट ने यह आदेश दिया कि निर्माण कार्य पर्यावरणीय मंजूरी और तटीय क्षेत्र नियमावली की सभी शर्तों के तहत किया जाएगा, और किसी भी उल्लंघन पर परियोजना पर रोक लगाई जा सकती है।

एनजीटी में इस परियोजना को याचिकाकर्ता द्वारा पर्यावरणीय स्वीकृति और द्वीपीय तटीय विनियमन क्षेत्र (आईसीआरजेड) अधिसूचना, 2019 के कथित उल्लंघन के आधार पर परियोजना को चुनौती दी गई थी।

इसमें आरोप था कि इस परियोजना से कोरल (प्रवाल) के संभावित विनाश हो सकता है। केवल एक मौसम के पर्यावरणीय आंकड़ों पर आधारित मूल्यांकन गलत है और परियोजना पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में मौजूद है।

यह इस परियोजना से संबंधित द्वितीय चरण का वाद था। पूर्व में 03 अप्रैल 2023 के आदेश में अधिकरण ने अधिकांश मुद्दों पर पर्यावरणीय स्वीकृति को बरकरार रखा था तथा कुछ विशिष्ट बिंदुओं की समीक्षा हेतु एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति (एसपीसी) का गठन किया था।

पीठ ने कहा कि राष्ट्रीय सतत तटीय प्रबंधन केंद्र (एनसीएससीएम) द्वारा स्थल सत्यापन के पश्चात यह निष्कर्ष निकाला गया कि परियोजना का कोई भाग आईसीआरजेड-आईए क्षेत्र में नहीं आता। पर्यावरणीय स्वीकृति में स्पष्ट शर्त है कि निषिद्ध तटीय क्षेत्रों में कोई निर्माण नहीं किया जाएगा।

ट्रिब्यूनल ने कहा कि ईसी में कठोर पर्यावरणीय शर्तें लागू हैं। जैसे अनुसंधान केंद्रों की स्थापना और लेदरबैक कछुआ, निकोबार मेगापोड एवं अन्य स्थानिक प्रजातियों का संरक्षण व प्रदूषण, जैव विविधता एवं जनजातीय कल्याण की निगरानी हेतु समितियों का गठन आदि।