यह दिल्ली में मेरा 14वां सर्दी का मौसम है और वह मौसम जिसे मैं कभी अपनाती थी, अब मुझे डराता है। कई लोगों के लिए सर्दियों की सुबह का मतलब पार्क में टहलना, धूप का आनंद लेना या बाहर चाय पीना होता है। मेरे लिए सुबहें चिंता के साथ शुरू होती हैं। मैं अखबार नहीं खोलती। मैं वायु गुणवत्ता जानने के लिए एयर क्वालिटी ऐप खोलती हूं। एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) का वह अंक अब मेरे दिन की लय तय करता है।
बहुत से सवाल खड़े हो जाते हैं। क्या मैं बाहर जा सकती हूं? नहीं! क्योंकि हवा जहरीली है। योग करूं? केवल साधारण योग ही कर सकती हूं। खिड़कियां खोलूं? असहजता के साथ, थोड़ी देर के लिए।
हम जो सांस लेते हैं, वह अब केवल हवा नहीं है। यह प्रदूषकों का मिश्रण है। सूक्ष्म कण, रसायन और अदृश्य खतरे जो हमारी फेफड़ों और रक्तप्रवाह में बस जाते हैं। सस्टेनिबिलिटी और कचरा प्रबंधन में पंद्रह साल का अनुभव मुझे ज्ञान, संदर्भ और शब्दावली देता है लेकिन इसके साथ ही यह मुझे और संवेदनशील भी बना देता है। खासकर तब ऐसा होता है, जब आप समझते हैं कि प्रदूषण कैसे काम करता है। हवा, मिट्टी और पानी का प्रदूषण स्वास्थ्य, आजीविका और असमानता से कैसे जुड़ा हुआ है, इसे जानने के बाद आप इसका प्रभाव अलग तरह से महसूस करते हैं।
कारण और परिणाम हर जगह दिखाई देते हैं। आप राजनीतिक उदासीनता, प्रशासनिक सुस्ती और सामूहिक उदासीनता को भी स्पष्ट देख सकते हैं। दिल्ली की सड़कों पर कदम रखते ही जीवन सामान्य सा लगता है। लगभग कोई मास्क नहीं पहनता। ट्रैफिक अपनी रफ्तार में होता है, दुकानें खुलती हैं और बच्चे स्कूल जाते हैं। यह सबकुछ उनके लिए बेहद सामान्य है जो न ही देखते हैं या न ही देखना चाहते हैं कि प्रदूषण हमें कितनी गहराई तक नुकसान पहुंचाता है। अज्ञानता एक अजीब प्रकार का सौभाग्य है।
एक दिन प्रदूषण बिना बुलाए घर आ जाता है। परिवार का कोई सदस्य बीमार पड़ता है। खांसी बनी रहती है। सांस लेने में तकलीफ होती है। अचानक, हर जीवन निर्णय पर सवाल उठने लगता है। क्यों मैं यहां रही?
दिल्ली हर सर्दी सुर्खियों में रहती है लेकिन सच्चाई कहीं अधिक व्यापक है। लगभग हर भारतीय शहर वायु प्रदूषण से जूझ रहा है। यह कोई मौसमी संकट नहीं है बल्कि यह लंबी अवधि वाला है। कभी-कभी मैं चाहती हूं कि काश! मुझे इतना कुछ न पता होता। यह संकट अब अमूर्त नहीं रहा, जब आप अपने तीन साल के बच्चे को एंटीबायोटिक्स और नेबुलाइजर पर देखते हैं क्योंकि साधारण जुकाम भी प्रदूषित हवा में बिगड़ जाता है। जब किसी बच्चे को कई दिन तक घर में रखना पड़ता है और इसका कारण बारिश या तूफान नहीं बल्कि हवा की विषाक्तता होती है।
इसके साथ कचरा भी है। पहाड़ों की तरह लैंडफिल और जलता हुआ कचरा, नालियों में प्लास्टिक, बेतरतीब और अनियंत्रित फैला और फेंका गया कचरा, संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों के पास फैला हुआ कचरा। हमारी खपत की कीमत गंदे, झाग वाले, अत्यधिक पोषक तत्वों से भर चुकी नदियां, झीलें और समुद्र चुका रहे हैं। नाजुक पारिस्थितिक तंत्र अत्यधिक पर्यटन के दबाव में टूटने लगते हैं। हर यात्रा मुझे यह सोचने पर मजबूर करती है, “मैं इसे कैसे अनदेखा कर सकती हूं?” मैं नहीं कर सकती। हाल ही में उत्तराखंड की पहाड़ियों की यात्रा जो मुझे ठीक करने वाली थी, असंतुष्ट छोड़ गई। वहां घुटती हुई सड़कें, कचरे से भरी पहाड़ियां और अनियंत्रित भीड़ का दबाव झेलती छावनी मुझे भीतर तक हिला गई। मैंने अपनी इन चिंताओं पर ब्लॉग भी लिखा क्योंकि मौन रहना अपराध में सहभागिता जैसा है। इस पर कुछ अधिकारियों ने प्रतिक्रिया भी दी। लेकिन जिम्मेदार पर्यटन को केवल बाद में सोचने वाली बात नहीं माना जा सकता बल्कि यह तत्काल अत्यंत जरूरी है।
पर्यावरण से जुड़ी चिंताएं यानी ईको एंजायटी कोई कमजोरी नहीं है। यह एक समझदारी भरी प्रतिक्रिया है उस दुनिया के लिए जो अक्सर असंगत लगती है, जब हमारी जागरुकता और परवाह बदलाव की धीमी या गैर-मौजूद व्यवस्थाओं से टकराती है। मैं इस क्षेत्र में काम करने और अभिभूत महसूस करने के बीच विरोधाभास के साथ जीती हूं। मैं उन शहरों से प्यार करती हूं जो धीरे-धीरे बिगड़ रहे हैं और एक बच्चे को पालते हुए उस भविष्य पर सवाल उठाती हूं जो हम उन्हें सौंप रहे हैं। फिर भी मेरा मानना है कि व्यक्तिगत कहानियां आंकड़ों से आगे बात कर सकती हैं। जब असुविधा साझा की जाती है तो वह सामूहिक संकल्प बन सकती है। अब यह दिखावा करना कि सब ठीक है, कोई विकल्प नहीं है।