श्रीनगर की सड़कों पर इलेक्ट्रिक कारें न के बराबर दिखाई देती हैं। फोटो: भागीरथ 
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भारत का ई-सफर: जम्मू-कश्मीर में क्यों जोर नहीं पकड़ रहीं इलेक्ट्रिक कारें?

जागरुकता की कमी, महंगी कारें, ईवी पॉलिसी न होना और बिजली कटौती इलेक्ट्रिक कारों की राह में सबसे बड़ी अड़चनें हैं

Bhagirath

जम्मू-कश्मीर में पंजीकृत कुल वाहनों में करीब एक तिहाई (33.41 प्रतिशत) हिस्सेदारी कारों की है। यहां अब तक पंजीकृत 26.65 लाख वाहनों में 8.90 लाख कारें हैं। सड़कों पर दौड़ रही ये कारें जहां जाम का कारण बन रही हैं, वहीं वायु प्रदूषण में भी बड़ा योगदान दे रही हैं।

इस केंद्र शासित प्रदेश में जहां एक तरफ पब्लिक ट्रांसपोर्ट धीरे-धीरे ई मोबिलिटी पर शिफ्ट हो रहा है, वहीं कारों में यह बदलाव लगभग न के बराबर है। यही कारण है कि इसके मुख्य शहर श्रीनगर में इलेक्ट्रिक कारें दिखना दुर्लभ है।

जम्मू-कश्मीर में हर साल करीब 50 हजार कारें पंजीकृत हो रही हैं। वाहन डैशबोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, साल 2026 में अब तक 44,199 कारों का पंजीकरण हुआ है। परिवहन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि साल 2026 में अब तक 486 इलेक्ट्रिक कारों का ही पंजीकरण हुआ है। यानी कुल कारों में एक प्रतिशत से कुछ अधिक हिस्सेदारी (1.10 प्रतिशत) ही इलेक्ट्रिक कारों की है। इससे पहले के वर्षों में यह हिस्सेदारी और कम है। 2025 में कुल 458, 2024 में 271 और 2023 में केवल 166 इलेक्ट्रिक कारें ही पंजीकृत हुईं।  

ऐसे में सवाल उठता है कि वायु प्रदूषण से जूझ रहे और नॉन अटेनमेंट शहरों में शामिल जम्मू और कश्मीर में इलेक्ट्रिक कारों का चलन क्यों नहीं हैं? विशेषज्ञ और स्थानीय निवासी इसके पीछे कई कारण गिनाते हैं। जागरुकता का कमी और बिजली कटौती को वे मुख्य कारण के तौर पर पेश करते हैं।

जम्मू और कश्मीर सड़क परिवहन निगम (जेकेआरटीसी) के एक अधिकारी के अनुसार, गर्मियों में शहरी क्षेत्रों में 12-14 घंटे और ठंड में करीब 8 घंटे ही बिजली रहती है। ग्रामीण क्षेत्रों का और भी बुरा हाल है। बिजली का यह संकट बैट्री की चार्जिंग में बड़ी रुकावट पैदा करता है। यह स्थिति ट्रांसपोर्ट सेक्टर के ई मोबिलिटी में शिफ्ट होने की राह में बड़ी अड़चन है।

परिवहन विभाग के आंकड़े इलेक्ट्रिक कारों के कम पंजीकरण की तस्दीक करते हैं

जम्मू कश्मीर राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से सेवानिवृत्त वैज्ञानिक एवं वर्तमान में वैली इंडस्ट्रियल पॉल्यूशन कंट्रोल, एनवायरमेंट मैनेजमेंट एंड क्लाइमेट चेंज (वीआईपीसीईसीसी) कंसल्टेंसी की संचालक मुताहरा आबिदा वहीद देवा के अनुसार, प्रदूषण के हालात को देखते हुए इलेक्ट्रिक वाहनों की तरफ जाना बहुत जरूरी है, लेकिन जागरुकता के अभाव में लोगों की इसमें दिलचस्पी नहीं है। उनका कहना है कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट की कमी के कारण जीवाश्म ईंधन वाली कारों पर निर्भरता बहुत बढ़ गई है। बिजली की कमी के कारण लोग इलेक्ट्रिक कारों से कतरा रहे हैं।

स्थानीय लोगों के अनुसार, श्रीनगर में चलने वाली 100 इलेक्ट्रिक बसों के लिए चार्जिंग की समस्या नहीं है। ये बसें पांथा चौक में चार्ज होती हैं और वहां बिजली की समस्या नहीं है। लेकिन निजी वाहनों के मामले में ऐसा नहीं है। निजी वाहनों के लिए चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं बन पाया है।

मुताहरा के अनुसार, चार्जिंग स्टेशन के लिए शहर में जगह नहीं है। जेकेआरटीसी के अधिकारी के अनुसार, पावर सेक्टर के बेहतर होने पर लोगों का झुकाव इलेक्ट्रिक कारों की तरफ हो सकता है।  

राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वैज्ञानिक फैयाज अहमद मानते हैं कि इलेक्ट्रिक वाहन महंगे हैं और डीजल-पेट्रोल पर चलने वाले वाहन सस्ते पड़ते हैं। लोग आमतौर पर 3-4 लाख रुपए खर्च कर पुरानी कार खरीद लेते हैं। इस बजट में इलेक्ट्रिक कार मिलनी असंभव है। यहां के लोग दिल्ली जैसे राज्यों से पुरानी और चलन से बाहर हो चुकी कारें सस्ती दरों पर ले आते हैं और उसे पुन: पंजीकृत करवा लेते हैं। ईवी कारों के मुकाबले ये वाहन उन्हें 60-80 प्रतिशत सस्ते दाम पर मिल जाते हैं।

जानकार बताते हैं कि अब तक ईवी पॉलिसी न होने के कारण इलेक्ट्रिक वाहन खासकर कारें लोकप्रिय नहीं हो पा रही हैं। इस कारण जम्मू-कश्मीर में इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद पर कोई आर्थिक मदद सरकार की तरफ से नहीं मिल रही है। ठंडा इलाका होने और लंबी दूरी के लिए इलेक्ट्रिक कारों की उपयोगिता पर भी लोगों के मन में संदेह है।