दुनिया भर में पहले से कहीं अधिक सौर पैनल लगे रहे हैं, पवन ऊर्जा परियोजनाएं तेजी से बढ़ रही हैं और लगभग हर सरकार 'ग्रीन ट्रांजिशन' को अपनी प्राथमिकता बता रही है। फिर भी एक सवाल लगातार परेशान करता है यदि नवीकरणीय ऊर्जा इतनी तेज़ी से बढ़ रही है, तो वैश्विक कार्बन उत्सर्जन हर साल नया रिकॉर्ड क्यों बना रहा है? यह विरोधाभास केवल ऊर्जा उत्पादन का नहीं, बल्कि उन आंकड़ों का भी है जिनके आधार पर दुनिया अपनी सफलता का आकलन करती है।
पिछले एक दशक में जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध संघर्ष में नवीकरणीय ऊर्जा सबसे बड़ी उम्मीद बनकर उभरी है। सौर और पवन ऊर्जा की लागत में उल्लेखनीय गिरावट आई है, नई तकनीकों का विकास हुआ है और कई देशों ने जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य घोषित किए हैं। इसके बावजूद वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता बढ़ रही है और चरम मौसम की घटनाएँ अधिक तीव्र होती जा रही हैं। यह स्थिति बताती है कि ऊर्जा परिवर्तन की कहानी केवल उपलब्धियों की नहीं, बल्कि उन सीमाओं और भ्रमों की भी है जिन्हें समझना आवश्यक है।
आज दुनिया भर में ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी घोषणाओं में अक्सर यह सुनने को मिलता है कि नई स्थापित बिजली क्षमता का बड़ा हिस्सा नवीकरणीय स्रोतों से आया है या ऊर्जा क्षेत्र का अधिकांश नया निवेश हरित परियोजनाओं में हो रहा है। ये दावे तथ्यात्मक रूप से सही हो सकते हैं, लेकिन अक्सर वे पूरी तस्वीर नहीं दिखाते हैं।
ऊर्जा क्षेत्र में प्रयुक्त शब्दावली जैसे 'स्थापित क्षमता', 'ऊर्जा निवेश', 'नवीकरणीय हिस्सेदारी' या 'हरित बिजली' तकनीकी अर्थ रखती है। जब इन्हें संदर्भ से अलग प्रस्तुत किया जाता है, तो आम नागरिक यह मान बैठता है कि जीवाश्म ईंधनों की जगह लगभग नवीकरणीय ऊर्जा ने ले ली है। जबकि वास्तविकता कहीं अधिक जटिल है।
ऊर्जा क्षेत्र में सबसे बड़ी गलतफहमियों में से एक 'स्थापित क्षमता' और 'वास्तविक उत्पादन' के बीच का अंतर है। यदि किसी देश ने 10 गीगावाट की नई सौर क्षमता स्थापित की है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह हर समय उतनी ही बिजली पैदा करेगा। सौर संयंत्र केवल दिन में और पर्याप्त धूप होने पर बिजली बनाते हैं। पवन ऊर्जा हवा की उपलब्धता पर निर्भर करती है। इसके विपरीत कोयला, गैस और परमाणु संयंत्र अपेक्षाकृत लगातार बिजली उपलब्ध करा सकते हैं।
यही कारण है कि किसी देश की ऊर्जा प्रगति का आकलन केवल स्थापित क्षमता से नहीं, बल्कि पूरे वर्ष में वास्तव में उत्पादित बिजली से किया जाना चाहिए।
बिजली ही पूरी ऊर्जा नहीं है
एक दूसरा भ्रम तब पैदा होता है जब बिजली उत्पादन और कुल ऊर्जा खपत को एक ही मान लिया जाता है। यदि किसी देश की 45 प्रतिशत बिजली नवीकरणीय स्रोतों से आ रही है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी कुल ऊर्जा का 45 प्रतिशत हिस्सा भी हरित हो चुका है। अधिकांश देशों में परिवहन अभी भी पेट्रोल और डीज़ल पर निर्भर है। इस्पात, सीमेंट और रसायन उद्योग बड़ी मात्रा में कोयला और गैस का उपयोग करते हैं। भवनों की गर्मी और औद्योगिक तापीय प्रक्रियाएँ भी जीवाश्म ईंधनों पर आधारित हैं। यानी बिजली में हरित हिस्सेदारी बढ़ना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन ऊर्जा संक्रमण की अंतिम मंज़िल नहीं।
निवेश के आँकड़े क्या बताते हैं?
सरकारें और कंपनियाँ अक्सर यह बताती हैं कि ऊर्जा क्षेत्र का अधिकांश नया निवेश अब नवीकरणीय परियोजनाओं में हो रहा है। लेकिन निवेश के आँकड़ों को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि विभिन्न ऊर्जा स्रोतों की लागत संरचना अलग होती है।
सौर और पवन परियोजनाओं में शुरुआती पूँजी निवेश अधिक होता है, जबकि गैस या कोयला आधारित संयंत्रों का बड़ा खर्च वर्षों तक ईंधन खरीदने में आता है। इसलिए केवल पूँजी निवेश की तुलना यह नहीं बताती कि किसी देश की ऊर्जा व्यवस्था वास्तव में किस दिशा में जा रही है।
नीतिगत दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि किसी ऊर्जा स्रोत पर उसके पूरे जीवनकाल में कुल कितना खर्च होगा और उससे कितनी विश्वसनीय ऊर्जा प्राप्त होगी।
ऊर्जा संबंधी सरकारी रिपोर्टों में 'नवीकरणीय ऊर्जा' की परिभाषा कई बार व्यापक होती है। इसमें जलविद्युत, बायोमास और अन्य स्रोत भी शामिल हो सकते हैं। लेकिन आम पाठक अक्सर इसे केवल सौर और पवन ऊर्जा के रूप में समझता है। इसलिए किसी भी आँकड़े को पढ़ते समय यह देखना आवश्यक है कि उसमें किन स्रोतों को शामिल किया गया है। पारदर्शिता का अर्थ केवल आँकड़े देना नहीं, बल्कि उनकी स्पष्ट व्याख्या करना भी है।
दुनिया की सबसे बड़ी चुनौती बढ़ती ऊर्जा माँग
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी लगातार संकेत दे रही है कि वैश्विक बिजली की मांग तेज़ी से बढ़ रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक वाहन, एयर कंडीशनिंग, डिजिटल अर्थव्यवस्था और औद्योगिक विस्तार ऊर्जा की नई भूख पैदा कर रहे हैं।
यही कारण है कि कई देशों में नवीकरणीय ऊर्जा तेजी से बढ़ने के बावजूद जीवाश्म ईंधनों की खपत भी कम नहीं हो रही। नई हरित ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा पुराने स्रोतों को प्रतिस्थापित करने के बजाय बढ़ती मांग को पूरा करने में लग रहा है। यही वह बिंदु है जिसे ऊर्जा संक्रमण की बहस में पर्याप्त महत्व नहीं मिलता।
चीन दुनिया में सबसे अधिक सौर पैनल और पवन टर्बाइन स्थापित कर रहा है। इसके बावजूद वह दुनिया का सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक बना हुआ है क्योंकि उसकी ऊर्जा मांग भी अभूतपूर्व गति से बढ़ रही है।
यूरोप ने नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है, लेकिन अब उसकी सबसे बड़ी चुनौती बिजली ग्रिड को आधुनिक बनाना और बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडारण विकसित करना है।
भारत भी इसी संक्रमणकाल से गुजर रहा है। देश ने सौर ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है और गैर-जीवाश्म क्षमता बढ़ाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। लेकिन तेज़ आर्थिक विकास, बढ़ती औद्योगिक गतिविधियों और सार्वभौमिक बिजली पहुँच की आवश्यकता के कारण कोयले की भूमिका निकट भविष्य में पूरी तरह समाप्त होती नहीं दिखती। इसलिए भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु दायित्वों के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी नीति चुनौती है।
सौर और पवन ऊर्जा की लागत में आई गिरावट निश्चित रूप से उत्साहजनक है। लेकिन ऊर्जा संक्रमण केवल उत्पादन का प्रश्न नहीं है। इसके लिए मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क, स्मार्ट ग्रिड, ऊर्जा भंडारण, लचीली वितरण व्यवस्था और दीर्घकालिक सार्वजनिक निवेश की भी आवश्यकता है।
यदि बिजली उत्पादन बढ़े लेकिन उसे उपभोक्ताओं तक पहुँचाने और आवश्यकता के समय उपलब्ध कराने की व्यवस्था कमजोर रहे, तो ऊर्जा परिवर्तन अधूरा रह जाएगा।
जलवायु संकट से निपटने के लिए दुनिया को नवीकरणीय ऊर्जा की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। लेकिन उतनी ही आवश्यकता ईमानदार और पारदर्शी आँकड़ों की भी है। यदि सफलता का आकलन केवल स्थापित क्षमता, निवेश या प्रतिशत हिस्सेदारी के आधार पर किया जाएगा, तो वास्तविक चुनौतियाँ नीति निर्माण से ओझल हो जाएँगी।
ऊर्जा संक्रमण का सबसे विश्वसनीय पैमाना यह होना चाहिए कि क्या जीवाश्म ईंधनों का वास्तविक उपयोग घट रहा है, क्या कुल कार्बन उत्सर्जन कम हो रहा है और क्या ऊर्जा व्यवस्था अधिक स्वच्छ, विश्वसनीय तथा सबके लिए सुलभ बन रही है।
हरित भविष्य केवल महत्वाकांक्षी घोषणाओं से नहीं बनेगा। वह तब बनेगा जब सरकारें, उद्योग, वैज्ञानिक समुदाय और समाज मिलकर उपलब्धियों के साथ-साथ कमियों को भी ईमानदारी से स्वीकार करेंगे क्योंकि जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौती का सामना केवल आशावाद से नहीं, बल्कि तथ्यों पर आधारित निर्णयों से किया जा सकता है।