एंड्रियास सीबर 350.ओआरजी में पॉलिटिकल स्ट्रेटेजी के प्रमुख हैं। सिसिलिया नूरमाला देवी 350.ओआरजी में इंडोनेशियाई टीम लीडर हैं। यह एक अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संगठन है, जो जमीनी स्तर पर काम करता है 
ऊर्जा

ऊर्जा सुरक्षा की खुलती कलई

जीवाश्म ईंधन पर आधारित यह अर्थव्यवस्था सबसे पहले उन्हीं को धोखा देने के लिए बनी है, जिनका वजूद इस पर टिका है

Andreas Sieber, Cecilia Nurmala Devi

ईरान में लोग युद्ध की विभीषिका झेल रहे हैं। वहीं, पूरी दुनिया एक बड़े ऊर्जा संकट की गिरफ्त में है। अब तक इस संकट को लेकर सारा ध्यान यूरोप पर रहा है। लेकिन असल में एशिया के लिए यह खतरा कहीं अधिक बड़ा है। एशिया के एलएनजी आयात का लगभग एक-तिहाई हिस्सा इसी होर्मुज मार्ग से होकर गुजरता है। यही नहीं, करीब 60 प्रतिशत कच्चा तेल भी इसी रास्ते से आता है। इस संघर्षग्रस्त “चोक-पॉइंट” से गुजरने वाले 75 प्रतिशत तेल और 59 प्रतिशत एलएनजी की खपत अकेले चार देश करते हैं।

ये देश हैं चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया। साल 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण तेल की कीमतों में भारी उछाल आया था। उस झटके ने दुनिया भर के 7 करोड़ लोगों को गरीबी के दलदल में धकेल दिया। यदि ईरान से जुड़ा यह युद्ध इसी तरह क्रूर बना रहा, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में फंस जाएगी। इसकी सबसे पहली और गहरी मार उन लोगों पर पड़ेगी जो पूरी तरह से जीवाश्म ईंधन की अर्थव्यवस्था पर निर्भर हैं। इनमें एशिया के गिग वर्कर जैसे कि डिलीवरी और टैक्सी चालक, रेहड़ी-पटरी वाले, दिहाड़ी मजदूर, छोटे कारोबारी, मछुआरे और किसान शामिल हैं। ये सभी अपनी आजीविका और परिवहन के लिए पूरी तरह तेल पर निर्भर हैं। वे इस संकट में सबसे पहले डूबेंगे।

भारत में रसोई गैस की कीमतों में हुई बढ़ोतरी ने रेस्टोरेंट्स और होटलों को बंद होने पर मजबूर कर दिया है। बांग्लादेश ने विश्वविद्यालयों को बंद कर दिया है और पेट्रोल की राशनिंग शुरू कर दी है। पाकिस्तान में सरकार ने खर्चों में भारी कटौती करने के लिए सरकारी कर्मचारियों के वेतन कम करने की योजना बनाई है।

फिलीपींस और थाईलैंड में दफ्तरों में एसी कम चलाने और यात्राएं सीमित करने के निर्देश दिए गए हैं। वहीं, म्यांमार ने सड़कों पर चलने वाली आधी निजी गाड़ियों पर पाबंदी लगा दी है। मार्च के मध्य में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने कीमतों को काबू में करने के लिए 40 करोड़ बैरल तेल बाजार में उतारा। यह मात्रा 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान जारी किए गए तेल से भी दोगुनी थी। हालांकि, इससे कीमतों में गिरावट बहुत मामूली रही और इसका असर केवल 12 घंटों तक ही दिखा।

चीन और जापान जैसे बड़े देशों के पास रणनीतिक भंडार हैं, जो कुछ समय के लिए राहत दे सकते हैं। लेकिन अगर यह संकट लंबा खिंचा, तो ये भंडार भी आम घरों और कारोबारों को बढ़ती कीमतों से नहीं बचा पाएंगे। एशिया के कई देशों के पास तो केवल कुछ ही दिनों का स्टॉक बचा है। इंडोनेशिया जैसा देश, जहां अपना खुद का तेल उत्पादन होता है, वह भी आयात पर बहुत अधिक निर्भर है। उसकी जरूरत का एक-चौथाई हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। घरेलू उत्पादन होने के बावजूद वह ऊंची कीमतों से सुरक्षित नहीं है, क्योंकि तेल और गैस के भाव वैश्विक बाजार से तय होते हैं। अधिकारियों का मानना है कि अब ईंधन की कीमतें बढ़ेंगी, क्योंकि सब्सिडी जारी रखने से बजट घाटा और गहरा हो जाएगा।

सब्सिडी के बजाय और भी बेहतर विकल्प मौजूद हैं। असल में सब्सिडी का ज्यादा फायदा गरीबों के बजाय अमीर तबके को मिलता है। इसका एक बेहतर समाधान यह है कि सरकारी धन का इस्तेमाल सीधे “वेलफेयर पेमेंट” के तौर पर किया जाए, इससे पैसा सीधे जरूरतमंदों तक पहुंच सकेगा। तेल भंडार खोलने या सब्सिडी बढ़ाने जैसे कदम केवल अस्थायी राहत देते हैं।

ये उपाय लंबे समय तक नहीं टिक सकते। जीवाश्म ईंधन पर आधारित यह अर्थव्यवस्था सबसे पहले उन्हीं को धोखा देने के लिए बनी है, जिनका वजूद इस पर टिका है। इसका सबसे बड़ा संकेत यह है कि निवेशक अभी से अमेरिकी तेल कंपनियों के लिए अप्रत्याशित मुनाफे का अनुमान लगा रहे हैं। एक तरफ दुनिया युद्ध और महंगाई से जूझ रही है, वहीं दूसरी तरफ ये कंपनियां भारी कमाई करने वाली हैं। ऐसे संकटों और जीवाश्म ईंधन अर्थव्यवस्था की बर्बादी से बचने का एकमात्र विश्वसनीय रास्ता नवीकरणीय ऊर्जा ही है। केवल यही विकल्प हमें भविष्य के ऐसे झटकों से सुरक्षित रख सकता है।

(एंड्रियास सीबर 350.ओआरजी में पॉलिटिकल स्ट्रेटेजी के प्रमुख हैं। सिसिलिया नूरमाला देवी 350.ओआरजी में इंडोनेशियाई टीम लीडर हैं। यह एक अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संगठन है, जो जमीनी स्तर पर काम करता है)