2026 के ईरान युद्ध ने न केवल जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता की खामियों को उजागर कर दिया है, बल्कि एक बार फिर उस सवाल को गंभीरता से उठाया है, जिसका जवाब अब हर सरकार को देना ही होगा। और वह सवाल है- कार्बन उत्सर्जन कम करने के साथ ऊर्जा सुरक्षा भी कैसे सुनिश्चित की जाए?
सबसे पहला जवाब मिलता है अक्षय ऊर्जा को अपनाने का, लेकिन अक्षय ऊर्जा की सप्लाई चेन पर चीन का दबदबा है। इसके साथ ही महत्वपूर्ण खनिजों का इस्तेमाल सामरिक तौर पर हथियार की तरह हो रहा है। वहीं, औद्योगिक कच्चे माल के तौर पर तेल और गैस की भूमिका भी अब तक खत्म नहीं हुई है। यह सभी वजहें उस विचार की खामियों को उजागर करती हैं कि अक्षय ऊर्जा ही ऊर्जा सुरक्षा की गारंटी है। कम से कम अल्पकालिक और मध्यम अवधि के लिए तो यह साफ तौर पर दिखाई दे रहा है। इंटरनेशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी के अनुसार, ईरान संकट से पहले ही अक्षय ऊर्जा प्रतिस्पर्धी बन चुकी थी।
सोलर फोटोवोल्टिक, जीवाश्म ईंधन के सबसे सस्ते विकल्पों की तुलना में औसतन 41 प्रतिशत सस्ता था। तटीय पवन ऊर्जा तो 53 प्रतिशत तक सस्ती थी। इसका मतलब है कि पहली बार तेल संकट की मार ऐसी दुनिया पर पड़ी है, जहां स्वच्छ ऊर्जा केवल एक उम्मीद भर नहीं है, बल्कि अब यह कई जगहों पर व्यावसायिक तौर पर सफल हो चुकी है। सैद्धांतिक तौर पर ईरान युद्ध के कारण जीवाश्म ईंधन की बढ़ती कीमतें अक्षय ऊर्जा की ओर बढ़ने के तर्क को मजबूत करती हैं। जैसे-जैसे तेल और गैस की कीमतें बढ़ती हैं, उनके स्वच्छ विकल्प और अधिक आकर्षक लगने लगते हैं। लेकिन यह तस्वीर का सिर्फ एक हिस्सा है। यह युद्ध इस बदलाव की राह में बाधा भी बन सकता है। वैश्विक ऊर्जा की मांग का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आज भी जीवाश्म ईंधन से पूरा होता है। जब तेल और गैस की कीमतें बढ़ती हैं, तो परिवहन से लेकर भोजन तक महंगाई बढ़ जाती है। इससे केंद्रीय बैंकों को ब्याज दरें बढ़ाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। अक्षय ऊर्जा के लिए यह बुरी खबर है, क्योंकि इन परियोजनाओं में भारी पूंजी लगती है और ये कर्ज की लागत के प्रति बहुत संवेदनशील होती हैं। ऊंची ब्याज दरें परियोजनाओं के विस्तार की रफ्तार को धीमा कर सकती हैं।
ऊर्जा का महंगा होना सरकारी बजट पर भी बोझ डालता है, खासकर विकासशील देशों में। ऐसे हालात में स्वच्छ तकनीकों के लिए जरूरी सब्सिडी सीमित हो जाती है और इसके विरोधाभासी नतीजे दिखाई देने लगते हैं। यह संकट अक्षय ऊर्जा के पक्ष में आर्थिक तर्क तो मजबूत करता है, लेकिन उनके विस्तार के लिए जरूरी वित्तीय हालात को कमजोर कर देता है। बाजार के संकेतों से इस तनाव की साफ झलक मिलती है। ब्लूमबर्ग का विश्लेषण बताता है कि पारंपरिक ऊर्जा कंपनियां बढ़ी हुई कीमतों का फायदा उठा रही हैं। विशेष रूप से वे कंपनियां, जिनका पश्चिम एशिया में जोखिम सीमित है। उदाहरण के तौर पर “टोटल” जैसी कंपनियां, जिनकी संपत्ति इस क्षेत्र में है, उनको उत्पादन घटने से जितना नुकसान हुआ, उसकी भरपाई कीमतों में हुई बढ़ोतरी से हो गई। इसके उलट अक्षय ऊर्जा कंपनियों का प्रदर्शन कमजोर रहा और इसका मुख्य कारण फाइनेंसिंग के लिए चुकाई जाने वाली भारी कीमत है। इस संकट से ऊर्जा की अनियमितता पर होने वाली बहस को भी नया नजरिया मिलता है। जीवाश्म ईंधन में भू-राजनीतिक बाधाएं आती हैं। ये बाधाएं अचानक आती हैं और इन्हें नियंत्रित करना मुमकिन नहीं है।
इसके विपरीत, अक्षय ऊर्जा की अनियमितता एक तकनीकी चुनौती है। इसे स्टोरेज और ग्रिड डिजाइन के जरिए धीरे-धीरे हल किया जा रहा है। दुनिया भर के देश इस पर कैसी प्रतिक्रिया देंगे, यह उनकी अपनी परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। चीन ने बेहतरीन मॉडल पेश किया है। बीते कई सालों के दौरान वह अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने में कामयाब रहा है। उसने अक्षय ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा और कोयले में निवेश किया है। वह कई अलग-अलग आपूर्तिकर्ताओं से हाइड्रोकार्बन खरीद रहा है। साथ ही, उसने बड़े रणनीतिक भंडार भी बनाए हैं। ऊर्जा संकट के बाद यूरोप, पाकिस्तान और क्यूबा सौर ऊर्जा की ओर बढ़ रहे हैं। कुछ ऐसे देश भी हैं जो कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए अपने स्वतंत्र रास्ते अपना रहे हैं। इथियोपिया अपनी 95 प्रतिशत ऊर्जा जैव ईंधन से प्राप्त करता है। उसने 2023 से ही “इंटरनल-कम्बशन” यानी आंतरिक दहन इंजन वाले वाहनों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है। नेपाल ने 2023 में अपनी पूरी बिजली अक्षय ऊर्जा से पैदा की है। वहां बिकने वाली 70 प्रतिशत नई कारें इलेक्ट्रिक हैं। हालांकि, जिन देशों के पास पर्याप्त घरेलू कोयला है, उनका झुकाव इसकी ओर बढ़ सकता है। वे इसे एक अल्पकालिक समाधान के तौर पर देख रहे हैं।
थाईलैंड व ताइवान ने ऊर्जा की कमी पूरी करने के लिए पहले ही आदेश दे दिए हैं। उन्होंने कोयला संयंत्रों को अधिकतम उत्पादन करने और बंद पड़ी इकाइयों को फिर शुरू करने को कहा है। ईरान संकट ने ऊर्जा परिवर्तन को देखने का नजरिया बदल दिया है। यह विषय अब केवल उत्सर्जन कम करने तक सीमित नहीं है, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा भी इससे जुड़ गया है। विकासशील देशों के लिए इसके नतीजे बहुत स्पष्ट हैं। जो देश शुरुआत में ही अपनी घरेलू अक्षय ऊर्जा क्षमता में निवेश करेंगे और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाएंगे, उन्हें भविष्य में बड़ा फायदा मिल सकता है। वहीं इसके उलट जो देश फिर से जीवाश्म ईंधन पर दांव लगाएंगे, वे खुद को एक असुरक्षित रास्ते पर ले जाएंगे। ऐसा ही पैटर्न 1973 और 2022 के पिछले संकटों के बाद देखा गया था। थोड़े समय के लिए तो यह संकट इस बदलाव की रफ्तार को धीमा कर सकता है, लेकिन मध्यम और लंबी अवधि में यह ऊर्जा सुरक्षा की बुनियाद के रूप में अक्षय ऊर्जा के पक्ष को ही और मजबूत करेगा।