भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की नौ सरकारी ऊर्जा कंपनियां (पीएसयू) अब भी लगातार बड़ा निवेश जीवाश्म ईंधन पर कर रही हैं। 2025 में इन कंपनियों ने कुल 2.6 लाख करोड़ रुपये का पूंजीगत निवेश किया। इसमें से करीब 2.3 लाख करोड़ रुपये यानी करीब 89 फीसदी जीवाश्म ईंधनों पर खर्च हुए, जबकि केवल 0.3 लाख करोड़ रुपये यानी 11 फीसदी स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में लगाए गए।
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट (आईआईएसडी) की रिपोर्ट में यह आकलन किया गया है। रिपोर्ट का आकलन है कि यदि मौजूदा निवेश का एक हिस्सा क्रमिक रूप से स्वच्छ ऊर्जा की ओर स्थानांतरित किया जाए, तो हर साल लगभग 2 लाख करोड़ रुपये तक स्वच्छ ऊर्जा के लिए उपलब्ध कराए जा सकते हैं।
रिपोर्ट कहती है कि यह बदलाव भारत के अल्पकालिक निवेश और दीर्घकालिक नेट-जीरो लक्ष्यों के बीच की दूरी कम कर सकता है। साथ ही, वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा में बढ़ती नवीकरणीय ऊर्जा और विद्युतीकरण की भूमिका के अनुरूप भी होगा।
आईआईएसडी के सलाहकार दीपक शर्मा ने कहा कि सरकारी कंपनियों का मौजूदा जीवाश्म ईंधन निवेश काफी हद तक पहले से चल रही परियोजनाओं से जुड़ा है, लेकिन नए और अतिरिक्त निवेश को स्वच्छ ऊर्जा की ओर मोड़ा जा सकता है जिससे संतुलन बन सकता है। शर्मा के मुताबिक, यदि पीएसयू ऊर्जा भंडारण, स्थिर नवीकरणीय ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिजों और विद्युतीकरण को प्राथमिकता दें तो भारत वैश्विक ईंधन बाजार की अस्थिरता से जोखिम कम कर सकता है और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा मजबूत कर सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025 में इन नौ कंपनियों ने कुल 26 लाख करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित किया है, जो भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 8 प्रतिशत है। साथ ही, उन्होंने करों और लाभांश के रूप में करीब 6 लाख करोड़ रुपये सरकारों को दिए। रिपोर्ट में कहा गया है कि यही आर्थिक और संस्थागत ताकत उन्हें भारत के ऊर्जा संक्रमण में निर्णायक भूमिका देती है।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि एनएचपीसी को छोड़कर नौ में से आठ ऊर्जा पीएसयू भारत के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 11 प्रतिशत प्रत्यक्ष रूप से उत्पन्न करती हैं। लेकिन जब इनके द्वारा बेचे गए ईंधन और उत्पादों के उपयोग से होने वाले उत्सर्जन को भी शामिल किया जाता है, तो इनकी हिस्सेदारी राष्ट्रीय उत्सर्जन के लगभग 44 प्रतिशत तक पहुंच जाती है।
रिपोर्ट के अनुसार, यह कंपनियां आपस में गहराई से जुड़ी हुई हैं। उदाहरण के लिए, कोल इंडिया द्वारा निकाला गया कोयला एनटीपीसी के बिजली संयंत्रों में इस्तेमाल होता है, जबकि एनटीपीसी की बिजली सरकारी रिफाइनरियों तक पहुंचती है। ऐसे में यदि ये कंपनियां समन्वित तरीके से काम करें तो पूरे ऊर्जा तंत्र में बड़े स्तर पर उत्सर्जन कटौती संभव हो सकती है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत की ऊर्जा पीएसयू के पास कम लागत वाली वित्तीय पहुंच और बड़े पैमाने पर निवेश क्षमता है, जिससे वे स्वच्छ और भरोसेमंद ऊर्जा विस्तार में अहम भूमिका निभा सकती हैं। उदाहरण के तौर पर, एनटीपीसी अब 60 गीगावाट स्वच्छ ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही है और स्थिर व डिस्पैचेबल नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश बढ़ा रही है।
दीपक शर्मा ने कहा, “पीएसयू वही जगह हैं जहां भारत की ऊर्जा, अर्थव्यवस्था और जलवायु संबंधी चुनौतियां एक साथ मिलती हैं। अब इनके अगले कदम तय करेंगे कि भारत कितनी तेजी से आयात निर्भरता घटा सकता है और स्वच्छ व भरोसेमंद ऊर्जा व्यवस्था की ओर बढ़ सकता है।”