आईआरईएनए की नई रिपोर्ट बताती है कि दुनिया की ऊर्जा व्यवस्था तेजी से एक ऐतिहासिक मोड़ पर पहुंच रही है। सौर ऊर्जा परियोजनाओं की लागत में 87 फीसदी और पवन ऊर्जा की लागत में 55 फीसदी की भारी गिरावट आई है, जबकि बैटरी स्टोरेज तकनीक 93 फीसदी तक सस्ती हो चुकी है।
इन बदलावों ने सौर, पवन और बैटरी आधारित “24/7 रिन्यूएबल पावर” को न केवल संभव बनाया है, बल्कि कई जगहों पर कोयला और गैस से भी सस्ता बना दिया है।
रिपोर्ट के अनुसार, उच्च धूप और हवा वाले क्षेत्रों में अब हाइब्रिड हरित ऊर्जा परियोजनाएं लगातार और स्थिर बिजली आपूर्ति करते हुए कम लागत पर ऊर्जा दे रही हैं। सौर-बैटरी सिस्टम की लागत 54 से 82 डॉलर प्रति मेगावाट-घंटा तक आ चुकी है, जबकि कोयला और गैस आधारित बिजली इससे महंगी पड़ रही है।
आईआरईएनए के अनुसार, यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है। बैटरी क्रांति ने ऊर्जा भंडारण को सस्ता और भरोसेमंद बना दिया है, जिससे उद्योगों, डेटा सेंटरों और एआई जैसे क्षेत्रों को लगातार बिजली मिल सकती है।
अनुमान है कि 2030 तक इन तकनीकों की लागत में करीब 30 फीसदी और 2035 तक करीब 40 फीसदी की अतिरिक्त गिरावट आ सकती है।
दुनिया में ऊर्जा समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। सौर और पवन ऊर्जा को लंबे समय तक 'अविश्वसनीय' कहकर खारिज किया जाता रहा। तर्क दिया जाता था कि सूरज ढलने या हवा थमने पर बिजली उत्पादन रुक जाता है। लेकिन अब यह धारणा तेजी से बदल रही है।
नई वैश्विक रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि बैटरी स्टोरेज के साथ मिलकर सौर और पवन ऊर्जा अब चौबीसों घंटे सस्ती, भरोसेमंद और स्थिर बिजली देने में सक्षम हो चुकी हैं।
इंटरनेशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी (आईआरईएनए) ने अपनी रिपोर्ट ‘24/7 रिन्यूएबल्स: द इकोनॉमिक्स ऑफ फर्म सोलर एंड विंड’ में जानकारी दी है कि दुनिया के कई हिस्सों में 24 घंटे यानी हर समय उपलब्ध रहने वाली अक्षय ऊर्जा अब कोयला और गैस आधारित बिजलीघरों से भी सस्ती पड़ रही है।
ऊर्जा समीकरण में ऐतिहासिक बदलाव की शुरुआत
रिपोर्ट से पता चला है कि जिन क्षेत्रों में अच्छी धूप और हवा है वहां बैटरी स्टोरेज के साथ तैयार की गई हाइब्रिड परियोजनाएं लगातार बिजली आपूर्ति करते हुए जीवाश्म ईंधनों की तुलना में कम लागत पर ऊर्जा दे रही हैं।
आंकड़े दर्शाते हैं कि जिन क्षेत्रों में अच्छी धूप रहती है, वहां बैटरी स्टोरेज के साथ सौर ऊर्जा से बिजली उत्पादन की फर्म लागत अब 54 से 82 डॉलर प्रति मेगावाट-घंटे तक पहुंच गई है। वहीं 2020 में यह लागत 100 डॉलर प्रति मेगावाट-घंटे से भी अधिक थी। यानी कुछ ही वर्षों में अक्षय ऊर्जा उत्पादन की लागत में भारी गिरावट आई है।
इसके मुकाबले चीन में नए कोयला बिजलीघरों से बिजली बनाने की लागत 70 से 85 डॉलर प्रति मेगावाट-घंटे और दुनिया में नई गैस आधारित बिजली की लागत 100 डॉलर प्रति मेगावाट-घंटे से भी अधिक है। यह बदलाव दिखाता है कि अक्षय ऊर्जा अब केवल पर्यावरण के लिए ही नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी फायदे का सौदा बनती जा रही है।
बता दें कि, “फर्म लेवलाइज्ड कॉस्ट” का मतलब उस औसत लागत से है, जिसमें बिजली संयंत्र की पूरी उम्र के दौरान बिजली उत्पादन और जरूरत के समय बिजली उपलब्ध कराने की लागत शामिल होती है। चूंकि सौर और पवन ऊर्जा मौसम पर निर्भर करती हैं, इसलिए बैटरी स्टोरेज उन्हें लगातार उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाता है।
ऊर्जा संकट ने दिखाई जीवाश्म ईंधनों की असली कीमत
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस का इस विषय में प्रेस विज्ञप्ति में कहना है, “पिछले दशकों के सबसे गंभीर ऊर्जा संकट ने जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता की असली कीमत दुनिया के सामने ला दी है। उनके मुताबिक, अब अक्षय ऊर्जा न केवल सस्ती, बल्कि सबसे सुरक्षित और भरोसेमंद विकल्प बनती जा रही है।"
वहीं आईआरईएनए के महानिदेशक फ्रांसेस्को ला कैमरा का कहना है कि तेल और गैस बाजार आज भी भू-राजनीतिक संकटों से प्रभावित हैं। ऐसे में मजबूत और पर्यावरण अनुकूल अक्षय ऊर्जा प्रणाली ही अर्थव्यवस्थाओं को सुरक्षित बना सकती है। उन्होंने कहा कि बैटरी तकनीक में आई क्रांति ने ऊर्जा भंडारण को सस्ता और अधिक प्रभावी बना दिया है, जिससे पूरी ऊर्जा अर्थव्यवस्था तेजी से बदल रही है।
बैटरी स्टोरेज बना गेमचेंजर, 93 फीसदी तक घटी लागत
रिपोर्ट में इस तथ्य को भी उजागर किया गया है कि पिछले 15 वर्षों में सौर ऊर्जा परियोजनाओं की लागत में 87 फीसदी और जमीन पर चल रही पवन ऊर्जा परियोजनाओं की लागत में 55 फीसदी की गिरावट आई है।
दिलचस्प बात है कि सबसे बड़ा बदलाव बैटरी स्टोरेज में देखा गया, जिसकी लागत 93 फीसदी तक कम हो चुकी है। यही कारण है कि अब सौर, पवन और बैटरी का संयुक्त मॉडल बड़े पैमाने पर आर्थिक रूप से फायदेमंद साबित हो रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, 24 घंटे अक्षय ऊर्जा न केवल पर्यावरण, बल्कि आधुनिक उद्योगों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), डेटा सेंटर और चौबीसों घंटे चलने वाले उद्योगों को बिना रुकावट बिजली चाहिए होती है।
ऐसे में बैटरी स्टोरेज से जुड़ी अक्षय ऊर्जा परियोजनाएं उनकी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम बन रही हैं। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि नई गैस परियोजनाओं की तुलना में सौर और पवन परियोजनाओं का निर्माण कहीं तेजी से हो रहा है। अधिकांश परियोजनाएं अनुमति और ग्रिड कनेक्शन मिलने के बाद एक से दो वर्षों में तैयार हो जाती हैं।
भविष्य में और सस्ती होगी अक्षय ऊर्जा
आईआरईएनए ने अनुमान जताया है कि 2030 तक इन तकनीकों की लागत में करीब 30 फीसदी और 2035 तक करीब 40 फीसदी की अतिरिक्त गिरावट आ सकती है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मंगोलिया, ब्राजील, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया जैसे क्षेत्रों में बैटरी स्टोरेज के साथ पवन ऊर्जा की लागत फिलहाल 59 से 94 डॉलर प्रति मेगावाट-घंटे के बीच है। 2030 तक इसके घटकर 49 से 75 डॉलर प्रति मेगावाट-घंटे तक आने की उम्मीद है।
इसका मतलब है कि आने वाले वर्षों में अक्षय ऊर्जा केवल पर्यावरण बचाने का विकल्प नहीं रहेगी, बल्कि दुनिया की सबसे सस्ती, सबसे भरोसेमंद और रणनीतिक ऊर्जा व्यवस्था के रूप में उभर सकती है। यह एक ऐसा बदलाव जो दुनिया में ऊर्जा समीकरण को पूरी तरह बदल देगा।