दिल्ली के एक सबसे व्यस्ततम इलाके तुगलकाबाद एक्सटेंशन स्थित तारा अपार्टमेंट के सामने लेबर चौक में कुछ ऐसा घट रहा है, जिसकी भागते-दौड़ते शहर को कुछ ज्यादा परवाह नहीं दिखाई देती। तपती दोपहर में लेबर चौक पर श्रमिक उम्मीद लगाए खड़े हैं। वह सोच रहे हैं कि अब भी कुछ काम हाथ आ जाए तो घर का चूल्हा जल जाए।
मूल रूप से उत्तर प्रदेश के औरेया जिले के रहने वाले श्रमिक जमील तुगलकाबाद एक्सटेंशन के गली नंबर 26 में रहते हैं। वह कहते हैं, "सर स्थिति का क्या कहें, आज ही एक श्रमिक मर गया। राजा नाम था। भूखा था, काम था नहीं। तबीयत खराब हुई और मर गया।"
जमील कहते हैं, मैंने एलपीजी संकट के बाद खुद अपने बीवी बच्चों को औरैया भेज दिया है। अब मैं भी वापस लौटना चाहता हूं।
एक दूसरे श्रमिक राम सिंह भी काम की तलाश में चौक पर बैठे हैं। वह डाउन टू अर्थ से कहते हैं मैं यूपी के गोंडा जिले से 14 साल की उम्र में दिल्ली आया था। अब गांव पर कुछ नहीं रह गया है वहां लौट नहीं सकता, नहीं तो लौट जाता। यहां कभी प्रदूषण में काम रुकने से झटका लगता है तो कभी महामारी से और अब ईरान-अमेरिका युद्ध से यह खतनाक स्थिति पैदा हो गई है। न मुझे काम मिल रहा है और न ही कोई उम्मीद दिखाई दे रही है। वह कहते हैं, "पांच रुपए का समोसा 15 रुपए का हो गया है। तीन गुना दाम बढ़ गया है। घर में गैस है लेकिन कालाबाजारी के चलते 800 रुपए की गैस 1,400 रुपए तक की मिल रही है।"
लेबर चौक पर मौजूद एक और श्रमिक चंदन सिंह बताते हैं कि उनके पास छोटू गैस है जिसमें 3 से 4 किलो गैस रिफिल होती है, लोकल में जिस दुकान से गैस रिफिल कराते थे वह अब 100 रुपए किलो के बजाए 300 से 400 रुपए किलो गैस ले रहा है।
तुगलकाबाद एक्सटेंशन के वाल्मिकी मोहल्ले में कई लोग काम पर नहीं गए हैं। चरम गर्मी, रोजगार की कमी और ऊर्जा संकट ने स्थिति को और अंधकारमय बना दिया है।
श्रमिकों ने डाउन टू अर्थ को ने बताया कि जब से गैस आपूर्ति बाधित हुई है और रोजमर्रा के कामकाज पर इसका असर पड़ा है, तब से कई श्रमिक दंपतियों के बीच तनाव बढ़ा है और तलाक के मामले भी सामने आने लगे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि गैस आपूर्ति में आई इस रुकावट के बाद अनेक परिवारों का संतुलन बिगड़ गया और कई घर टूटकर बिखर गए।
चंदन सिंह बताते हैं कि एलपीजी संकट के बाद 40 फीसदी श्रमिक यहां से गांव लौट गए हैं। युद्ध खत्म होने की खबरें आ रही हैं लेकिन अब तक कोई रेट सामान्य नहीं हुए हैं। न ही गैस आपूर्ति सामान्य हुई है। जमील कहते हैं कि ऊर्जा संकट ने उन्हें और ज्यादा गरीब बना दिया है और इसी समय श्रमिकों के लिए आर्थिक संकट भी और गहरा हो चुका है। पूरे दिन की दिहाड़ी मिलना एक सपने जैसा है।
तुगलकाबाद के ही वाल्मिकी मोहल्ले में रहने वाले श्रमिक सुभाष आज के दिन भाग्यशाली थे, उन्हें फरीदाबाद में काम मिल गया, लेकिन वह डाउन टू अर्थ से बताते हैं कि गैस आपूर्ति बहुत ज्यादा परेशानी पैदा कर रही है। यह महीने के गुजर-बसर पर बड़ी चोट कर रही है।
मयूर विहार फेस थ्री के घड़ौली कॉलोनी में लेबर का बड़ा संकट पैदा हो गया है। वहां से करीब 30 फीसदी श्रमिक घर को पलायन कर गए हैं।
श्रमिक राम सिंह के मुताबिक, काम तो गांव में भी नहीं है लेकिन वहां जंगलों से लकड़ी उपलब्ध हो जाती है और कुछ राशन उपलब्ध हो जाता है। कम से कम भूखे तो नहीं मरेंगे। यहां तो भूख से मरने की नौबत है।
ताजा ऊर्जा संकट के बीच ज्यादातर श्रमिक महीना पार करने के लिए कभी लकड़ी तो कभी गोबर के उपले तो थोड़े दिन महंगी गैस पर निर्भर हैं।
वह कहते हैं, कोविड में तो घर लौट गए थे क्योंकि यहां लॉकडाउन था, कुछ खुला होने या चलने का भ्रम ही नहीं था। लेकिन इस वक्त तो पूरा शहर दौड़भाग रहा है और सबकुछ खुला नजर आ रहा है लेकिन न जाने हमारा काम कहां गुम हो गया है।
चंदन कहते हैं। अब जिस भोजन को हम सस्ता समझते थे वह भी महंगा हो गया है, शायद ही अब हम सस्ता भोजन फिर हासिल कर सकें।