केंद्र सरकार ने एक ऐसा प्रावधान प्रस्तावित किया है जिसके तहत यदि राज्य विद्युत नियामक आयोग समय पर टैरिफ (बिजली दर) आदेश जारी नहीं करते हैं तो बिजली दरों में हर साल एक तय सूचकांक (इंडेक्स) के आधार पर स्वतः संशोधन किया जाएगा। इससे कई राज्यों में उपभोक्ताओं के बिजली बिल बढ़ सकते हैं।
यह प्रस्ताव राष्ट्रीय विद्युत नीति (एनईपी) 2026 के ड्राफ्ट में शामिल है, जिसे 21 जनवरी 2026 को जारी किया गया। यह मौजूदा व्यवस्था से एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है। अभी तक बिजली दरों में संशोधन राज्य विद्युत नियामक आयोगों द्वारा किया जाता है, जब वितरण कंपनियां (डिस्कॉम) टैरिफ बढ़ाने या घटाने के लिए याचिका दाखिल करती हैं। व्यवहार में ये संशोधन अक्सर वर्षों तक टलते रहते हैं, जिससे वितरण क्षेत्र में घाटा और कर्ज बढ़ता जाता है।
21 जनवरी को एक उद्योग सम्मेलन में केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल ने कहा कि वितरण कंपनियों को लागत आधारित (कॉस्ट-रिफ्लेक्टिव) टैरिफ की ओर बढ़ना होगा और लोकलुभावन वादों से बचना चाहिए।
उन्होंने कहा, “जब तक राज्य सरकारें समय पर सब्सिडी का भुगतान नहीं करतीं, तब तक मुफ्त बिजली का वादा नहीं किया जाना चाहिए।” उनके अनुसार, टैरिफ की अपर्याप्त वसूली बिजली क्षेत्र की वित्तीय परेशानियों का एक बड़ा कारण है।
ड्राफ्ट एनईपी 2026 का उद्देश्य 2005 में लागू राष्ट्रीय विद्युत नीति को बदलना है, जिसका फोकस बिजली की कमी दूर करने, पहुंच बढ़ाने और बुनियादी ढांचा खड़ा करने पर था। इसके बाद से भारत की स्थापित बिजली क्षमता चार गुना बढ़ चुकी है। केंद्र सरकार का दावा है कि 2021 में सार्वभौमिक विद्युतीकरण हासिल कर लिया गया था और 2024-25 में प्रति व्यक्ति बिजली खपत बढ़कर 1,460 यूनिट (किलोवाट-घंटा) हो गई।
इसके बावजूद, वितरण क्षेत्र में संरचनात्मक कमजोरियां बनी हुई हैं। डिस्कॉम का संचित घाटा ऊंचा है, कई राज्यों में टैरिफ वास्तविक लागत को नहीं दर्शाते, और क्रॉस-सब्सिडी के चलते औद्योगिक बिजली दरें वैश्विक स्तर से कहीं अधिक हो गई हैं, जिससे प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो रही है।
इसी पृष्ठभूमि में ड्राफ्ट नीति में स्वचालित टैरिफ इंडेक्सेशन को एक “बैकस्टॉप मैकेनिज्म” के रूप में प्रस्तावित किया गया है, ताकि नियामकों की देरी के कारण वित्तीय स्थिति और न बिगड़े।
नई नीति का एक अहम केंद्र रिसोर्स एडिक्वेसी प्लानिंग है। इसके तहत डिस्कॉम और राज्य लोड डिस्पैच केंद्रों को राज्य नियमों के अनुरूप भविष्य की मांग को ध्यान में रखते हुए योजनाएं बनानी होंगी। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित योजना तैयार करेगा।
टैरिफ और वित्तीय सुधारों से जुड़े प्रस्तावों में शामिल हैं:
यदि नियामक समय पर आदेश न दें तो इंडेक्स से जुड़ा वार्षिक टैरिफ संशोधन
डिमांड चार्ज के जरिए फिक्स्ड लागत की क्रमिक वसूली
क्रॉस-सब्सिडी में चरणबद्ध कमी
विनिर्माण इकाइयों, रेलवे और मेट्रो को क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज से छूट, ताकि आर्थिक प्रतिस्पर्धा बढ़े
नीति में यह भी प्रावधान है कि राज्य सरकारों से परामर्श के बाद नियामक एक मेगावाट से अधिक कनेक्टेड लोड वाले उपभोक्ताओं के लिए वितरण लाइसेंसधारकों को सार्वभौमिक सेवा दायित्व से छूट दे सकते हैं।
भारत की कुल स्थापित बिजली क्षमता में अब नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है। एनईपी 2026 में 2030 तक नवीकरणीय और पारंपरिक बिजली के लिए शेड्यूलिंग और डिविएशन नियमों में समानता लाने की बात कही गई है।
नीति में बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम और पंप्ड हाइड्रो जैसी भंडारण परियोजनाओं को बाजार आधारित तरीके से विकसित करने, घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने और लक्षित प्रोत्साहन देने का प्रस्ताव है।
इसके अलावा, उपभोक्ताओं को यह अनुमति देने का सुझाव है कि वे वितरित नवीकरणीय ऊर्जा और स्टोरेज सिस्टम से बची हुई बिजली को अन्य उपभोक्ताओं को या एग्रीगेटर्स के जरिए बेच सकें।
ग्रिड स्थिरता के लिए थर्मल पावर को अब भी आवश्यक माना गया है। नीति पुराने बिजलीघरों के पुनः उपयोग, लचीलापन बढ़ाने और स्टोरेज के साथ बेहतर एकीकरण को प्रोत्साहित करती है।
ड्राफ्ट नीति में वितरण सुधारों पर खास जोर है। इसमें साझा वितरण नेटवर्क, डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम ऑपरेटरों का गठन, प्रीपेड स्मार्ट मीटरिंग और तकनीकी एवं वाणिज्यिक नुकसान को एकल अंक तक लाने के उपाय शामिल हैं।
प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए नीति केवल अल्पकालिक बिजली व्यापार पर निर्भरता खत्म कर नए बाजार उत्पादों की शुरुआत और बाजार में हेरफेर व मिलीभगत रोकने के लिए कड़ी निगरानी की बात करती है।
एनईपी 2026 के कई प्रस्ताव प्रस्तावित विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2025 से मेल खाते हैं, जिनमें टैरिफ अनुशासन, भुगतान सुरक्षा और विवादों के त्वरित निपटारे से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि इन सुधारों को लागू करने के लिए विधायी समर्थन जरूरी है, खासकर तब जब 2032 तक बिजली क्षेत्र में लगभग 4.5 लाख करोड़ रुपए के निवेश की उम्मीद है।