छत्तीसगढ़ में इथेनॉलज फैक्ट्री से प्रभावित ग्रामीणों का विरोध प्रदर्शन, फोटो द्वारा : सिद्दीक खान 
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प्रदूषण के चलते छत्त्तीसगढ़ में जारी है एथेनाल संयंत्रों का विरोध

राज्य के बतेमरा जिले में स्थापित हो रहे संयंत्रों पर ग्राम पंचायतों का कहना है कि सरकार और प्रशासन ग्राम पंचायतों के नियमों का अनदेखा कर रही है

Anil Ashwani Sharma

छत्तीसगढ़ के बमेतरा जिले में स्थापित हो रहे एथेनाल संयंत्रों के खिलाफ स्थानीय ग्रामीण पिछले चार सालों से आंदोलनरत हैं। संयंत्रों के कारण ग्रामीणों की न केवल उपजाऊ जमीन अधिग्रहित की जा रही है बल्कि संयंत्रों से जल संकट से लेकर भू-जल प्रदूषित होने की आशंका भी ग्रामीण जता रहे हैं। डाउन टू अर्थ ने राकां और पथर्रा गांव के लोगों की मांगें जानी और समझी..पढ़िए पहली किश्त..  

चिलचिलाती गर्मी में एक किसान हाथों में फावड़ा लिए सड़क के पास काटी गई एक नाली को फिर से ठीक कर उसे अपने खेत में जोड़ रहे थे तभी उन्होंने देखा कि सड़क पर सामने से एक साइकिल सवार तेजी से आ रहा है, ऐसे में उन्होंने तेज आवाज देकर पास उसे रुकवाया और जमकर उसे खरीखोटी सुनाई। किसान राकां गांव (जिला बमेतरा, तहसील बेरला) के संतोष साहू हैं और वह अपने खेत के साथ 35 एकड़ में फैले एथेनाल संयंत्र से निकलने वाले दूषित जल को अपने खेत के दूसरी ओर मोड़ रहे थे। साइकिल सवार संयंत्र का कर्मचारी है और उसी ने संयंत्र के दूषित जल की नाली काट कर उनके खेतों की ओर मोड़ दी थी। इस पर साहू ने पास खड़े अपने राकां गांव के सरपंच धनाराम निषाद से शिकायती स्वर में कह रहे हैं कि पहले तो इस संयंत्र से निकलने वाली असहनीय बदबू ने पूरे गांव के लोग को परेशान कर रखा है और ऊपर से अब उनके कर्मचारी संयंत्र से निकलने वाले दूषित जल को हमारे खेतों से जोड़ रहे हैं ताकि पता ही चले कि इस संयंत्र से किसी प्रकार दूषित जल की निकासी भी होती है कि नहीं।

पिछले कुछ महिने से छत्तीतसगढ़ के बमेतरा जिले के चार गांवों में इसी प्रकार की झड़प आए दिन देखने को मिल जाती है। आखिर ग्रामीण करें भी तो क्या करें, वे संयंत्र का विरोध बीते चार सालों से लगातार करते आ रहे हैं लेकिन उनकी सुनवाई कहीं नहीं हो पा रही है बल्कि उनके अहिंसक आंदोलन के बावजूद ग्रामीणों पर आए दिन पुलिस द्वारा आशांति फैलाने के आरोप में उन पर एफआईआर दर्ज हो रही है साथ ही कई बार ग्रामीणों को पुलिस ने पिछले माहों में गिरफ्तार कर जेल में भी डाल चुकी है। स्थानीय किसान शांति पूर्ण आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन पुलिस ने धारा 170 (पुरानी प्रतिबंधात्मक धारा 151) में ही जेल भेज दिया। बाद में जिला सत्र न्यायालय ने आंदोलनकारियों को जेल भेजने की कार्यवाही को अवैध ठहराया। इसी प्रकार आंदोलन को कुचलने के इरादे से की गई एफआईआर भी गलत साबित हो चुकी है। तत्कालीन तहसीलदार ने दो आंदोलनकारी अजिताभ मिश्रा और सिद्दीक खान पर जिला कार्यालय बेमेतरा में लागू प्रबंधात्मक क्षेत्र घेराव का आरोप लगा कर एफआईआर दर्ज करा दी। इसके बाद जब पीड़ित पक्ष ने सूचना के अधिकार के तहत जानकारी निकाली तो उसमें तथ्य निकल कर आया कि एफआईआर तिथि के दिन धारा 163 (पुरानी धारा 144) लागू ही नहीं थी।

बमेतरा की बेरला तहसील में लगे इन दो संयंत्रों से लगभग 35 हजार की आबादी प्रभावित हो रही है। इस संबंध में आंदोलन कर रहे सिद्दीक खान कहते हैं कि कहने के लिए तो यह संयंत्र केवल दो गांव में ही लगे हैं लेकिन वास्तविकता ये है कि इससे अकेले हमारे ये दो गांव ही प्रभावित नहीं हो रहे हैं बल्कि हमारे गांव के आसपास के 25 से 30 गांव भी प्रभावित हो रहे हैं। वह बताते हैं कि हमारे आंदोलन में गांव के आसपास के इन 30 गांव के ग्रामीण भी हमेशा शामिल हो रहे हैं।

इस संबंध में रायुपर स्थित “नदी घाटी मोर्चा” के संयोजक गौतम बंदोपाध्याय ने डाउन टू अर्थ से कहा, “छत्तीसगढ़ में स्थापित किए जाने वाले 29 एथेनॉल संयंत्रों में से 21 गांव के बीचोबीच या गांव के आसपास ही लगाए जा रहे हैं, ऐसे हालात में ग्रामीणों की खेती की जमीन और गांव का वातावरण तो पूरी तरह से दूषित हो रहा है और पिछले चार सालों का ग्रामीणों का विरोध प्रदर्शन पूरी तरह से जायज है।” वह कहते हैं कि इन संयंत्रों के लिए अधिग्रहीत की गई अधिकांश जमीनें चारागाह, श्मशान घाट और गौशालाएं जैसे गांव के निस्तार की जमीनें हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंच रहा है और सबसे बड़ी कमी यह है कि पिछले चार सालों से चल रहे विरोध प्रदर्शन के बावजूद सरकार ने अब तक इसकी समीक्षा करना उचित नहीं समझा है। यहां तक कि विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य को “धान के कटोरे” की संज्ञा मिली हुई है। यही नहीं जिस बमेतरा जिले में राज्य सरकार 11 एथेनॉल प्लांट लगाने की तैयारी में है, यहां धान का रकबा राज्य में सबसे अधिक है। इस संबंध में बंदोपाध्याय कहते हैं, “धान और पराली पर आधारित कई एथेनॉल प्लांट स्थापित होने से खाद्य सुरक्षा को भी खतरा हो सकता है।”

यह स्थिति अकेले छत्तीसगढ़ के इस गांव की नहीं है बल्कि देश के आधा दर्जन से अधिक राज्यों में एथेनाल संयंत्रों का विरोध हो रहा है। छत्तीसगढ़ के अलावा राजस्थान, हरियाणा और बिहार में भी उग्र विरोध प्रदेर्शन हो रहा है। सभी ग्रामीणों का विरोध तीन बातो पर विशेष रूप से केंद्रित है। पहला जहां संयंत्र स्थापित हो रहे हैं वहां के भूजल को प्रदूषित करने की आशंका और दूसरा चूंकि अधिकांश संयंत्र गांव के बीचोबीच या आसपास ही स्थापित किए जा रहे हैं, इससे उन इलाके में वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है और तीसरी बात है जिस इलाके में ये संयंत्र स्थापित किए जा रहे हैं, उस इलाके में पानी का संकट खड़ा होते जा रहा है। निषाद बताते हैं कि अकेले बमेतरा में 11 एथेनॉल संयंत्र को मंजूरी मिली है। इनमें से दो पूरे हो चुके हैं और दो निर्माणाधीन हैं। वह बताते हैं कि इसमें सबसे खतरनाक बात ये है कि ये सभी संयंत्र शिवनाथ नदी के किनारे ही स्थापित किए जा रहे हैं। ध्यान रहे कि छत्तीसगढ़ सरकार ने 2024 में विधान सभा में जानकारी दी थी कि राज्य में कुल 34 एथेनाल संयंत्रों के निर्माण के लिए समझौते ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए हैं। जबकि केंद्र सरकार ने राज्य में कुल 42 सयंत्रों को मंजूरी दी हुई है। वहीं दूसरी ओर देश के 22 राज्यों में केंद्र सरकार ने 499 एथेनाल की मंजूरी दी हुई है। इनमें अधिकांश अनाज आधारित संयंत्र स्थापित किए जाने हैं। 

छत्तीसगढ़ के बमेतरा जिले के राकां गांव में निर्माणाधीन एथेनाल संयंत्र अपने अंतिम चरण में जा पहुंचा है। यह 2022 में शुरू हुआ था, तभी से स्थानीय ग्रामीणों द्वारा इसका विरोध किया जा रहा है। राकां गांव के सरपंच धनाराम निषाद कहते हैं कि प्रशासन ने इस संयंत्र की स्थापना गांव की उपजाऊ खेतों के बीचोबीच कर दी है। इसके कारण इससे निकलने वाला दूषित जल गांव के खेतों में जा रहा है। वह कहते हैं कि यही नहीं यह संयंत्र ठीक शिवनाथ नदी के किनारे निर्माण किया गया है, इससे प्रशासन नदी का अधिकांश जल संयंत्र को दे रहा है और किसानों के लिए वह नए-नए कानून बनाकर रुकावटें पैदा कर रह है। गांव के ही किसान अवध साहू ने बताया कि हालात ये हैं कि जब हम नदी में अपनी पानी की मोटर खेतों की सिंचाई के लिए लगाते हैं तो प्रशासन उसे जब्त कर लेता और जुर्माना अलग से लगा देता है। वह बताते हैं यह स्थिति पिछले चार सालों से लगातार जारी है। ध्यान रहे कि छत्तीगढ़ राज्य को “धान का कटोरा” कहा जाता है और राकां गांव में बन रहे संयंत्र को विशाल जल की आवश्यकता है। गांव के सरपंच निषाद ने बताया कि परियोजना की जल उपयोग योजना के अनुसार 935.5 घन मीटर पानी प्रतिदिन शिवनाथ नदी पर स्थित रांका-बूढ़ाजोंग एनीकट से लिया जाना प्रस्तावित है। वह बताते हैं कि भारी मात्रा में जल दोहन इसलिए गंभीर खतरा पैदा करता है क्योंकि बेरला तहसील पहले से ही “संकटग्रस्त” श्रेणी में दर्ज है।

ध्यान रहे कि केंद्रीय भूजल बोर्ड, उत्तर-मध्य छत्तीसगढ़ क्षेत्र, जल संसाधन विभाग, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण, केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट “छत्तीसगढ़ के गतिशील भूजल संसाधन, 2024” के परिशिष्ट-9 में बेरला तहसील को बेमेतरा जिले के अंतर्गत “संकटग्रस्त” के रूप में दिखाया गया है। ग्रामीणों को भय है कि संयंत्र को दिया गया भारी मात्रा में जल कृषि उद्देश्यों के लिए पानी की कमी को जन्म देगा, जिससे उन किसानों की आजीविका प्रभावित होगी जो सिंचाई के लिए इसी जलस्रोत पर निर्भर हैं। ध्यान रहे कि रांका गांव एक कृषि-प्रधान गांव के रूप में जाना जाता है। इसके अलावा यह भी आशंका है कि संयंत्र को यदि अधिक मात्रा में पानी दिया गया तो इलाके पीने के पानी का संकट उत्पन्न हो सकता है। किसान संतोष साहू कहते हैं कि यदि ऐसा होता है तो यह हमारे स्वच्छ जल के मौलिक अधिकार पर सीधे-सीधे आघात होगा। वह कहते हैं कि जब जल स्तर घटेता है तो बूढ़ाजोंग एनीकट ही पीने के लिए पानी, घरेलू उपयोग, सिंचाई और अन्य आवश्यकताओं के लिए एकमात्र स्रोत रह जाएगा।

आगे जारी है...