28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर बड़ा सैन्य हमला किया, जिससे दुनिया की राजनीति में बड़ा बदलाव आया है। यह संघर्ष भारत से भले ही दूर हो, लेकिन इसका आर्थिक असर भारत तक पहुंचने लगा है।
इसकी बड़ी वजह दुनिया का सबसे अहम तेल मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज है, जो इस युद्ध के कारण खतरे में है। जो अगर जारी रहता है तो भारत की तेल आपूर्ति और निर्यात पर इसका साफ असर पड़ सकता है। यही वजह है कि भारत संभावित ऊर्जा और व्यापार संकट को लेकर सतर्क हो गया है।
दरअसल, भारत की ऊर्जा आपूर्ति काफी हद तक सिर्फ 33 किलोमीटर चौड़ी समुद्री पट्टी पर निर्भर है। भारत कच्चे तेल की अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है। हर दिन करीब 25 से 27 लाख बैरल तेल आयात किया जाता है जो मुख्य रूप से इराक, सऊदी अरब, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात से आता है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते भारत तक पहुंचता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमत में हर 1 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत के सालाना आयात बिल में करीब 2 अरब डॉलर की वृद्धि हो जाती है। अगर कीमतों में लगातार 10 डॉलर की बढ़ोतरी होती है, तो भारत को 13–14 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ सकता है। इससे रुपए पर दबाव बढ़ेगा और चालू खाते का घाटा भी बढ़ सकता है।
अगर ईरान में रोजाना 33 लाख बैरल तेल के उत्पादन में बाधा आती है, तो तेल की कीमतें तुरंत 9 से 15 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं। वहीं, अगर हालात और बिगड़ते हैं और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में नाकेबंदी जैसी स्थिति बनती है तो ब्रेंट क्रूड तेल की कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल या उससे भी अधिक हो सकती है। ब्रेंट क्रूड तेल उत्तरी सागर से निकाला जाने वाला कच्चा तेल है, जिसकी कीमत को दुनिया में तेल के दाम तय करने का एक प्रमुख मानक माना जाता है।
पेट्रोल ही नहीं गैस पर भी असर
यह असर सिर्फ पेट्रोल तक सीमित नहीं है, आपकी रसोई भी इससे प्रभावित हो सकती है।
केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने डाउन टू अर्थ को बताया कि अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में नाकेबंदी होती है या लंबे समय तक बाधा बनी रहती है, तो तेल और गैस के जहाजों की आवाजाही में देरी हो सकती है।
इससे माल ढुलाई, बीमा और परिवहन की लागत बढ़ेगी और दुनिया भर में एलपीजी की उपलब्धता भी कम हो सकती है, क्योंकि भारत के एलपीजी आयात का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से आता है।
भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 से 85 प्रतिशत एलपीजी और करीब 60 प्रतिशत एलएनजी होर्मुज के रास्ते आयात करता है। ऐसे में अगर इस मार्ग में रुकावट आती है, तो गैस के जहाज देर से पहुंच सकते हैं और बीमा प्रीमियम बहुत बढ़ सकता है जो पहले ही करीब 50 प्रतिशत तक बढ़ चुका है।
इसका असर सिर्फ आयात पर नहीं, बल्कि भारत के निर्यात पर भी पड़ रहा है। भारत के बासमती चावल के कुल निर्यात में ईरान की हिस्सेदारी लगभग 25 प्रतिशत है। इराक को जोड़ दें तो इन दोनों देशों के साथ भारत का व्यापार 2 अरब डॉलर से अधिक का है। तनाव के कारण बंदर अब्बास जैसे बंदरगाहों पर जहाजों की आवाजाही रुकने से भारतीय सामान की कई खेपें फंस गई हैं।
ईरान को होने वाला भारत का चाय निर्यात भी प्रभावित हो सकता है। भारत हर साल लगभग 7 अरब रुपए की चाय ईरान को निर्यात करता है, लेकिन भुगतान में देरी और समुद्री मार्गों में रुकावट से व्यापार पर असर पड़ रहा है।
भारत में 2 मार्च 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की बैठक की। इस बैठक में तीन प्रमुख मुद्दों पर चर्चा हुई।
पहला, पश्चिम एशिया में रह रहे लगभग 90 लाख भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
दूसरा, समुद्री व्यापार मार्गों को सुरक्षित रखना।
तीसरा, जरूरत पड़ने पर रूस या दक्षिण अमेरिका जैसे वैकल्पिक स्रोतों से तेल और गैस की आपूर्ति की व्यवस्था करना।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति भारत के लिए एक चेतावनी है। तेल की कीमतों को लेकर बार-बार बनने वाली भू-राजनीतिक निर्भरता से बचने के लिए भारत को बिजली आधारित परिवहन और एथेनॉल मिश्रण जैसे विकल्पों को तेजी से आगे बढ़ाना होगा।
फिलहाल भारत की आर्थिक प्रगति काफी हद तक इसी एक संकरे समुद्री मार्ग की स्थिरता पर टिकी हुई है।