पवन और सौर ऊर्जा सस्ती होने के बावजूद बिजली ग्रिड में अस्थिरता और संचालन संबंधी नई जटिल चुनौतियां उत्पन्न करती हैं। फोटो साभार: आईस्टॉक
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भारत में स्वच्छ ऊर्जा के लिए खनिजों पर केंद्रित निर्भरता, किसी भी समय कर सकती है सप्लाई ब्रेक : आईईईएफए

सप्लाई बाधित हुई तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है और 500 गीगावाट अक्षय ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहन क्रांति का सपना भी टूट सकता है

Vivek Mishra

भारत जब तेजी से स्वच्छ ऊर्जा और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर बढ़ रहा है, उसी रफ्तार से एक छुपा हुआ संकट भी गहराता जा रहा है। यह संकट नवीकरणीय ऊर्जा में अहम भूमिका निभाने वाले महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति का संकट हो सकता है। सौर पैनल से लेकर इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरी स्टोरेज तक, हर तकनीक की रीढ़ माने जाने वाले कोबाल्ट, लिथियम, निकेल, ग्रेफाइट और तांबा जैसे खनिजों के लिए भारत का आयात ढांचा बेहद असंतुलित और सीमित स्रोतों पर निर्भर है। इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है और 500 गीगावाट अक्षय ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहन क्रांति का सपना भी टूट सकता है।

इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस (आईईईएफए) की ताजा फैक्टशीट (वित्त वर्ष 2019-2025) ने इसे चेताया है।

फैक्टशीट के मुताबिक, वर्तमान में भारत लिथियम, कोबाल्ट और निकेल के लिए 100 फीसदी आयात पर निर्भर है और भारत की समस्या सिर्फ आयात पर निर्भरता नहीं है, बल्कि यह निर्भरता कुछ गिने-चुने देशों तक सिमटी हुई है, जो किसी भी समय आपूर्ति झटके का कारण बन सकती है।

खासतौर से इलेक्ट्रिक वाहन, स्मार्टफोन, लैपटॉप में इस्तेमाल होने वाली लिथियम-आयन बैटरी में या फिर कैथोड सामग्री, जेट इंजन और गैस टर्बाइन के सुपरअलॉय, सिरेमिक और कांच में नीला रंग, औद्योगिक उत्प्रेरक के तौर पर इस्तेमाल होने वाले कोबाल्ट ऑक्साइड और हाइड्रॉक्साइड की तस्वीर चौंकाने वाली है। वित्त वर्ष 2025 में भारत के कोबाल्ट ऑक्साइड और हाइड्रॉक्साइड आयात का लगभग 60 प्रतिशत अकेले फिनलैंड से आया। बेल्जियम और जर्मनी जैसे अन्य स्रोत मौजूद हैं, लेकिन उनका योगदान काफी पीछे है। यानी किसी एक देश में नीति या आपूर्ति में बदलाव सीधे भारत की बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को प्रभावित कर सकता है।

ग्रेफाइट के मामले में कहानी दो हिस्सों में बंटी हुई है। प्राकृतिक ग्रेफाइट में भारत ने कुछ हद तक राहत की सांस ली है। मोजाम्बिक अब 31 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है, जिससे चीन पर निर्भरता कम हुई है। लेकिन सिंथेटिक ग्रेफाइट की स्थिति बेहद गंभीर है। यहां चीन का लगभग एकाधिकार है। 91 प्रतिशत से अधिक आपूर्ति उसी के हाथ में है। यह वही खनिज है जो लिथियम-आयन बैटरियों के लिए बेहद अहम है।

तांबा क्षेत्र में भी स्थिति संतुलित नहीं है। तांबा अयस्क में तंजानिया अचानक एक बड़े खिलाड़ी के रूप में उभरा है और 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी रखता है। वहीं तांबा कैथोड के लिए भारत 73 प्रतिशत तक जापान पर निर्भर है। तांबा ऑक्साइड और हाइड्रॉक्साइड में नॉर्वे का दबदबा बना हुआ है। यानी हर श्रेणी में एक प्रमुख देश और वही सबसे बड़ा जोखिम है।

इलेक्ट्रिक वाहनों की आत्मा यानी लीथियम बैटरी की आपूर्ति में भी दिलचस्प बदलाव देखने को मिला है। पहले जहां यूरोपीय देश प्रमुख थे, अब दक्षिण अमेरिका के देश, खासकर चिली, तेजी से उभरे हैं। वित्त वर्ष 2025 में लिथियम ऑक्साइड और हाइड्रॉक्साइड का 41 प्रतिशत चिली से आया, जबकि लिथियम कार्बोनेट में आयरलैंड सबसे बड़ा स्रोत बन गया है। यह बदलाव अवसर भी है और चुनौती भी।

निकेल के मामले में ऑस्ट्रेलिया ने तेजी से अपनी जगह बनाई है और वित्त वर्ष 2025 में  में लगभग 65 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल कर ली है। वहीं निकेल सल्फेट के लिए भारत अब भी बेल्जियम पर 65 प्रतिशत तक निर्भर है। यानी विविधीकरण की कोशिशें हो रही हैं, लेकिन तस्वीर अभी भी अधूरी है।

रिपोर्ट यह भी बताती है कि वैश्विक स्तर पर संरक्षणवादी नीतियां इस जोखिम को और बढ़ा रही हैं। चीन, इंडोनेशिया, अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे देश अपने संसाधनों को सुरक्षित रखने के लिए निर्यात नियंत्रण और घरेलू प्राथमिकता की नीतियां अपना रहे हैं। इसका सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ता है।

हालांकि, पूरी तस्वीर निराशाजनक नहीं है। भारत ने मोजाम्बिक, तंजानिया, चिली और ऑस्ट्रेलिया जैसे नए साझेदारों के साथ अपने संबंध मजबूत किए हैं। यह संकेत देता है कि देश धीरे-धीरे अपनी आपूर्ति श्रृंखला को विविध बनाने की दिशा में बढ़ रहा है।

अंततः सवाल सिर्फ खनिजों का नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा का है। अगर आपूर्ति कुछ देशों के हाथों में सिमटी रही, तो 500 गीगावाट अक्षय ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहन क्रांति का सपना भी जोखिम में पड़ सकता है।

फैक्टशीट यह चेता रही है कि ऊर्जा का भविष्य तभी सुरक्षित होगा, जब खनिजों की आपूर्ति भी उतनी ही मजबूत और विविध होगी।