भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) के बढ़ते बाजार के बीच अब बैटरियों के कचरे को “संसाधन” में बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है। इस क्षेत्र में ईयू और भारत की ओर से संयुक्त निवेश के तहत करीब 169 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। 2030 तक सार्वजनिक और निजी इलेक्ट्रॉनिक परिवहनों से बड़े पैमाने पर बैटरियां निकलेंगी, जिन्हें रिसाइकल किया जाना है। यह एक अवसर की तरह भी देखा जा रहा है।
भारत और यूरोपीय संघ ने ईवी बैटरी रीसाइक्लिंग के लिए संयुक्त फंडिंग कार्यक्रम शुरू किया है, जिसके तहत उन्नत तकनीकों के विकास और पायलट प्रोजेक्ट्स को समर्थन दिया जाएगा। यह पहल व्यापार, तकनीक और सुरक्षा सहयोग के उच्चस्तरीय मंच इंडिया–ईयू ट्रेड एंड टेक्नोलॉजी काउंसिल के तहत लाई गई है।
आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, यूरोपीय संघ का प्रमुख रिसर्च और इनोवेशन फंडिंग कार्यक्रम होराइजन यूरोप के तहत करीब 9.4 मिलियन यूरो की फंडिंग दी जाएगी, जबकि भारत सरकार समानांतर सहयोग प्रदान करेगी। इस तरह कुल निवेश लगभग 15 मिलियन यूरो यानी 169 करोड़ रुपए के आसपास माना जा रहा है।
इस संयुक्त कॉल के तहत केवल भारतीय कंपनियों, स्टार्टअप्स, एमएसएमई, शोध संस्थानों और विश्वविद्यालयों से प्रस्ताव आमंत्रित किए गए हैं। आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि 15 सितंबर 2026 रखी गई है।
मिनिस्ट्री ऑफ हैवी इंडस्ट्रीज के मुताबिक, भारत में ईवी बैटरी रीसाइक्लिंग का बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है। 2024-25 में इसका आकार करीब 1,380 करोड़ से 3,510 करोड़ रुपये के बीच आंका गया है, जो 2035 तक बढ़कर लगभग 4.14 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। वहीं, नीति आयोग के अनुसार, 2030 तक भारत में 128 गीगावाट- हावर्स (जीडब्ल्यूएच) बैटरियां रीसाइक्लिंग के लिए उपलब्ध होंगी, जिसमें सार्वजनिक परिवहन और ईवी सेक्टर की बड़ी भूमिका होगी। बड़े पैमाने पर बैटरी रीसाइक्लिंग से बैटरी उत्पादन से होने वाले कार्बन उत्सर्जन में 90 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है।
इस पहल में मिनिस्ट्री ऑफ हैवी इंडस्ट्रीज प्रमुख भूमिका निभा रहा है, जो भारत में बैटरी निर्माण और एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (एसीसी) विकास के लिए नोडल मंत्रालय है। मंत्रालय 18,100 करोड़ रुपये की प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना के जरिए एसीसी निर्माण को बढ़ावा दे रहा है और बैटरी वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2022 के तहत विस्तारित उत्पादक जिम्मेदारी (ईपीआर) और उच्च सामग्री रिकवरी लक्ष्यों को लागू करने में सहयोग कर रहा है।
यह कार्यक्रम उन्नत रीसाइक्लिंग तकनीकों के विकास पर केंद्रित है। इसके तहत लिथियम, कोबाल्ट और ग्रेफाइट जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की उच्च दक्षता से रिकवरी, नई और पुरानी बैटरी तकनीकों के लिए लचीले रीसाइक्लिंग समाधान, डिजिटल कलेक्शन और सॉर्टिंग सिस्टम, तथा सेकंड-लाइफ बैटरियों के लिए एडवांस्ड डायग्नोस्टिक्स और सुरक्षा निगरानी जैसी तकनीकों पर काम किया जाएगा। साथ ही भारत में एक पायलट प्रोजेक्ट स्थापित किया जाएगा, जहां इन तकनीकों का वास्तविक परिस्थितियों में परीक्षण कर उन्हें तेजी से औद्योगिक स्तर पर लागू करने की दिशा में आगे बढ़ाया जाएगा।
यह पहल 2024 में आयोजित इंडिया–ईयू स्टार्टअप बैटरी रीसाइक्लिंग टेक्नोलॉजीज एक्सचेंज के बाद अगला महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है, जिसका उद्देश्य दोनों क्षेत्रों की विशेषज्ञता को जोड़ते हुए बैटरी कचरे को “वर्चुअल माइन” में बदलना और सर्कुलर इकॉनमी को बढ़ावा देना है।