दुनिया कोयला ऊर्जा से बाहर निकलने की राह तलाश रही है लेकिन एशिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं इस राह को लंबा कर रही हैं। साल 2025 की पहली छमाही में दुनिया में जितनी नई कोयला आधारित ऊर्जा की क्षमताएं जोड़ने का प्रस्ताव किया गया है, उनमें 87 फीसदी हिस्सेदारी अकेले चीन और भारत की है। यह तब है जब दोनों देश नवीकरणीय ऊर्जा में भी लगातार बड़ा निवेश कर रहे हैं।
वैश्विक ऊर्जा निगरानी करने वाली संस्था ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर (जीईएम)– ग्लोबल कोल प्लांट ट्रैकर पर आधारित कार्बन ब्रीफ की रिपोर्ट में यह तथ्य उजागर किया गया है।
रिपोर्ट के मुातबिक यह दोनों देश ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक जरूरतों के लिए कोयले पर निवेश बढ़ा रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2025 की पहली छमाही में चीन में 74.7 गीगावाट और भारत में 12.8 गीगावाट नई कोयला परियोजनाएं प्रस्तावित की गईं। इसके मुकाबले पूरी दुनिया में सिर्फ 11 गीगावाट के करीब नई परियोजनाओं का प्रस्ताव आया। यह साफ संकेत है कि वैश्विक ऊर्जा संक्रमण दो ध्रुवों में बंट रहा है। एक तरफ एशिया के ये बड़े देश जो विस्तार कर रहे हैं, और दूसरी तरफ वे क्षेत्र जो कोयले को चरणबद्ध तरीके से खत्म कर रहे हैं।
रिपोर्ट कहती है कि 2025 की पहली छमाही में दुनिया भर में जो कोयला आधारित बिजली संयंत्र चालू हुए या निर्माण चरण में पहुंचे, उनका लगभग पूरा फोकस एशिया में रहा। चीन ने अकेले 21 गीगावाट (GW) नई कोयला क्षमता को चालू किया, जो पिछले नौ वर्षों का उच्चतम स्तर है। 2016 के बाद किसी भी वर्ष में इतनी नई कोयला क्षमता पहली बार जुड़ी है। अगर यही रफ्तार बनी रही तो वर्ष के अंत तक यह क्षमता 80 गीगावाट तक पहुंच सकती है, जो एक दशक का सबसे बड़ा स्तर होगा।
रिपोर्ट बताती है कि चीन की ओर से यह तेजी अचानक नहीं आई। 2021-22 में बिजली संकट और डिमांड-सप्लाई गैप ने कोयला क्षेत्र में निवेश को मजबूती दी। साथ ही, ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से चीन की नीति यह रही है कि बिजली आपूर्ति में कोई कमी न हो। यही वजह है कि 2025 में भी कोयला परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जा रही है।
हालांकि, रिपोर्ट एक दिलचस्प तथ्य पर रोशनी डालती है। इतनी भारी निर्माण गतिविधि के बावजूद चीन में कोयले की खपत आनुपातिक रूप से नहीं बढ़ी। चीन की कुल कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन में पहली छमाही में लगभग एक प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है। इसका मुख्य कारण यह है कि नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत (सौर, पवन और जलविद्युत) तेजी से बिजली उत्पादन में हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं। कई नए कोयला संयंत्र वास्तव में “स्टैंडबाय” या बैकअप रोल में हैं, यानी उन्हें निरंतर नहीं चलाया जा रहा।
भारत की तस्वीर थोड़ी अलग है। देश में नवीकरणीय ऊर्जा की क्षमता मार्च 2025 तक 220 गीगावाट को पार कर चुकी है। यह एक बड़ी उपलब्धि है और ऊर्जा संक्रमण के लिहाज से उम्मीद जगाती है। लेकिन, इसी समय भारत ने कोयले को भी अपनी ऊर्जा रणनीति से हटाया नहीं है। रिपोर्ट बताती है कि भारत आने वाले सात वर्षों में करीब 90 गीगावाट अतिरिक्त कोयला आधारित क्षमता जोड़ने की योजना बना रहा है। यह अनुमानित क्षमता पहले तय किए गए लक्ष्य से लगभग 60 प्रतिशत अधिक है।
वर्तमान में भारत की बिजली उत्पादन में कोयले का हिस्सा करीब 70 प्रतिशत है। हालांकि सौर और पवन ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ रही है, लेकिन बेसलोड यानी लगातार आपूर्ति के लिए कोयला अभी भी भारत की रीढ़ बना हुआ है। यही वजह है कि ऊर्जा संक्रमण की बहस में भारत को “ड्यूल ट्रैक” पर चलता हुआ देश कहा जा रहा है। एक ओर तेजी से बढ़ते नवीकरणीय निवेश, दूसरी ओर कोयले पर बढ़ती निर्भरता।
वहीं, दुनिया भर में यह ट्रेंड जलवायु लक्ष्यों के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। पेरिस समझौते के तहत 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर तापमान को रोकने का लक्ष्य तभी पूरा हो सकता है जब नई कोयला परियोजनाओं को पूरी तरह रोका जाए। लेकिन कार्बन ब्रीफ का विश्लेषण बताता है कि चीन और भारत के कदम इस राह को और कठिन बना रहे हैं।
यहां यह समझना जरूरी है कि चीन और भारत इस रफ्तार को सिर्फ “कार्बन बर्निंग” के लिए नहीं रख रहे। दोनों देशों की रणनीति ऊर्जा सुरक्षा, रोजगार और औद्योगिक मांग को देखते हुए बनी है। विशेष रूप से चीन ने यह स्पष्ट किया है कि कोयले का नया इन्फ्रास्ट्रक्चर सिर्फ बैकअप के लिए है ताकि डिमांड पीक के समय कोई संकट न आए।
रिपोर्ट के मुताबिक, चीन और भारत दोनों ही देशों में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी पिछले पांच साल में तेजी से बढ़ी है। चीन हर साल दर्जनों गीगावाट सोलर और विंड पावर जोड़ रहा है, जबकि भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय क्षमता का लक्ष्य रखा है। बावजूद इसके, कोयले की समानांतर वृद्धि यह संकेत देती है कि एनर्जी ट्रांजिशन का रास्ता सीधा नहीं है।
2025 का यह आंकड़ा यह दिखाता है कि दुनिया के सबसे बड़े विकासशील देश जलवायु लक्ष्यों और ऊर्जा जरूरतों के बीच फंसे हुए हैं। चीन और भारत का यह दोहरा रास्ता वैश्विक ऊर्जा राजनीति को उलझन में डाल रहा है। एक तरफ ये देश ग्रीन एनर्जी पर जोर दे रहे हैं, दूसरी ओर कोयला आधारित इंफ्रास्ट्रक्चर को भी मजबूत कर रहे हैं। सवाल यह है कि इस तरह के निवेश अगले दो दशकों तक उत्सर्जन को किस हद तक प्रभावित करेंगे।
रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन में 46 गीगावाट क्षमता वाली कोल परियोजनाओं पर निर्माण शुरू हुआ या पुरानी परियोजनाओं को दोबारा सक्रिय किया गया। सबसे अधिक गतिविधि शिनजियांग, इनर मंगोलिया, शानदोंग और शानक्सी जैसे प्रांतों में हुई। इन परियोजनाओं को प्रांतीय मंज़ूरी, स्थानीय निवेश और बिजली मांग के आधार पर आगे बढ़ाया गया।
वहीं, भारत की स्थिति अलग है। वर्ष 2025 की पहली छमाही में भारत ने 5.1 गीगावाट नई कोयला क्षमता चालू की, जो 2024 (4.2 गीगावाट) से ज्यादा है। वर्ष 2024 में रिकॉर्ड 38.4 गीगावाट प्रस्तावों के बाद, जुलाई 2025 तक देश में कुल प्रस्तावित कोयला क्षमता 92 गीगावाट तक पहुंच गई। दूसरी ओर, पुराने संयंत्रों की सेवानिवृत्ति बेहद धीमी रही—सिर्फ 0.8 गीगावाट को ही बंद किया गया। साथ ही, प्रदूषण नियंत्रण नियमों (जैसे सल्फर डाइऑक्साइड मानक) को लागू करने में देरी ने कोयले के जीवनचक्र को और लंबा कर दिया है।
यूरोप और लैटिन अमेरिका का फेज-आउट रुख
जब एशिया में कोयला परियोजनाओं का विस्तार हो रहा है, वहीं यूरोप और लैटिन अमेरिका अलग रास्ता अपना रहे हैं। रिपोर्ट बताती है कि आयरलैंड ने जून 2025 में कोयले का उपयोग पूरी तरह बंद कर दिया। कई यूरोपीय देश वर्ष 2029 से 2033 के बीच कोयला चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की योजना पर काम कर रहे हैं। लैटिन अमेरिका में तो 2025 में सक्रिय नए कोयला प्रस्ताव लगभग खत्म हो गए हैं, यानी यहां कोयले का भविष्य लगभग समाप्त हो रहा है।