छत्तीसगढ़ में ताप विद्युत संयंत्रों ने 2021 की ऐश उपयोग अधिसूचना के अनुसार पहले तीन वर्षों में 100 प्रतिशत फ्लाई ऐश उपयोग लक्ष्य पूरा किया।
हिमाचल प्रदेश सरकार ने छह प्रमुख वेटलैंड को रामसर सूची में शामिल करने के लिए प्रस्तावित किया, जिससे जैव विविधता संरक्षण मजबूत होगा।
केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश के बरेली और बदायूं जिलों में फ्लोराइड स्तर सुरक्षित सीमा में पाया गया।
अमृत और अमृत 2.0 योजनाओं के तहत देशभर में हजारों करोड़ रुपये की लागत से नई सीवेज उपचार क्षमता विकसित की जा रही।
जल जीवन मिशन के तहत देशभर में लाखों पेयजल नमूनों की जांच कर नागरिकों को सुरक्षित और स्वच्छ पानी उपलब्ध कराया जा रहा।
छत्तीसगढ़ में फ्लाई ऐश का उपयोग
संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण आज, नौ मार्च से शुरू हो गया है। इसी बीच सदन में उठाए गए एक सवाल के जवाब में आज, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने लोकसभा में बताया कि कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों से बड़ी मात्रा में फ्लाई ऐश और बॉटम ऐश निकलती है। इसके सुरक्षित और उपयोगी निपटान के लिए 31 दिसंबर 2021 को राख या ऐश उपयोग अधिसूचना, 2021 जारी किया। इस अधिसूचना के अनुसार सभी ताप विद्युत संयंत्रों को निर्धारित समय सीमा में 100 प्रतिशत ऐश का उपयोग करना अनिवार्य किया गया है।
सिंह ने कहा कि छत्तीसगढ में स्थित ताप विद्युत संयंत्रों ने पहले अनुपालन चक्र (वित्त वर्ष 2022-23 से 2024-25) में ऐश उपयोग के लक्ष्य का पालन किया है। इसलिए किसी भी संयंत्र पर पर्यावरणीय जुर्माना नहीं लगाया गया है।
छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण बोर्ड के अनुसार, कोरबा जिले में कई पुराने ऐश डाइक के फिर से उपयोग योग्य बनाया गया है। हालांकि हसदेव थर्मल पावर स्टेशन में अभी भी कुछ पुरानी ऐश जमा है। यहां लगभग 210.64 लाख मीट्रिक टन ‘लेगेसी ऐश’ मौजूद है, जिसे धीरे-धीरे उपयोग में लाया जा रहा है।
हिमाचल प्रदेश में आर्द्रभूमि संरक्षण
सदन में उठे एक और प्रश्न के उत्तर में आज, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने लोकसभा में कहा कि आर्द्रभूमि यानी वेटलैंड पर्यावरण के लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। ये जैव विविधता को बनाए रखते हैं और जल संरक्षण में मदद करते हैं। हिमाचल प्रदेश सरकार ने छह महत्वपूर्ण झीलों और वेटलैंड को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाने के लिए आर्द्रभूमि पर रामसर कन्वेंशनमें शामिल करने का प्रस्ताव दिया है।
इन वेटलैंड में शामिल हैं -
रेवालसर झील
पराशर झील
खज्जियार झील
मणिमहेश झील
ब्रिघू झील
नाको झील
इन जगहों को इसलिए चुना गया है क्योंकि यहां अनोखे पारिस्थितिकी, समृद्ध जैव विविधता, प्रवासी पक्षियों की उपस्थिति और दुर्लभ प्रजातियों का आवास मिलता है। यदि इन वेटलैंड को रामसर सूची में शामिल किया जाता है तो इनके संरक्षण को और मजबूत किया जा सकेगा।
भूजल प्रदूषण की निगरानी
भूजल प्रदूषण को लेकर सदन में उठाए गए एक सवाल के जवाब में आज, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने लोकसभा में बताया कि देश में भूजल की गुणवत्ता की निगरानी का काम केंद्रीय भूजल बोर्ड द्वारा किया जाता है। यह संस्था वैज्ञानिक अध्ययन और निगरानी कार्यक्रम के माध्यम से समय-समय पर पानी की गुणवत्ता का परीक्षण करती है।
सिंह ने हाल ही में जारी वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट 2025 का हवाला दिया। जिसके अनुसार उत्तर प्रदेश के बरेली जिला और बदायूं जिला में फ्लोराइड की मात्रा निर्धारित सीमा 1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक नहीं पाई गई है। इससे यह पता चलता है कि इन क्षेत्रों में भूजल की गुणवत्ता फिलहाल सुरक्षित है, हालांकि निगरानी लगातार जारी रहेगी।
सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट
सदन में सवालों का सिलसिला जारी रहा, एक और प्रश्न के लिखित उत्तर में आज, राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने लोकसभा में बताया कि शहरों में बढ़ती आबादी के कारण सीवेज और गंदे पानी की समस्या बढ़ रही है। इस समस्या के समाधान के लिए केंद्र सरकार ने अटल कायाकल्प और शहरी परिवर्तन मिशन (अमृत) योजना शुरू की।
इस योजना के तहत अब तक 890 सीवरेज और सेप्टेज प्रबंधन परियोजनाएं शुरू की गई हैं, जिनकी कुल लागत लगभग 34,505 करोड़ रुपये है। इन परियोजनाओं के माध्यम से 4,447 मिलियन लीटर प्रतिदिन (एमएलडी) सीवेज ट्रीटमेंट क्षमता बनाई गई है। इसमें से 1,437 एमएलडी क्षमता पानी के पुनः उपयोग के लिए विकसित की गई है।
इसके अलावा अमृत 2.0 के तहत 592 नई परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इनकी कुल लागत 67,607.67 करोड़ रुपये है। इन परियोजनाओं से 6,739 एमएलडी अतिरिक्त सीवेज उपचार क्षमता तैयार होगी, जिसमें से 2,093 एमएलडी पानी के पुनर्चक्रण और पुनः उपयोग के लिए होगा।
देश में जलवायु अनुकूलन कोष
सदन में उठाए गए एक अन्य सवाल के जवाब में आज, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने लोकसभा में जानकारी देते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2015 में जलवायु परिवर्तन के लिए राष्ट्रीय अनुकूलन कोष (एनएएफसीसी) की स्थापना की थी। इस कोष का उद्देश्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जलवायु परिवर्तन से प्रभावित क्षेत्रों में अनुकूलन परियोजनाओं को वित्तीय सहायता देना है।
इस योजना के तहत देशभर में 30 परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है। इन परियोजनाओं के लिए धनराशि को राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के माध्यम से वितरित किया जाता है।
पश्चिम बंगाल में दो महत्वपूर्ण परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं -
दार्जिलिंग के पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन और स्थायी जल आपूर्ति
स्वीकृत राशि: 23.12 करोड़ रुपये
पुरुलिया और बांकुरा जिलों में छोटे और सीमांत किसानों की जलवायु अनुकूलन क्षमता बढ़ाना
स्वीकृत राशि: 15.06 करोड़ रुपये
इन परियोजनाओं का उद्देश्य किसानों और स्थानीय समुदायों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से सुरक्षित बनाना है।
पर्वतीय वनस्पति की निगरानी के लिए उपग्रह
पर्वतीय वनस्पति की निगरानी को लेकर सदन में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में आज, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने लोकसभा में बताया कि देश में जंगलों की स्थिति का आकलन करने के लिए उपग्रह तकनीक का उपयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया में रिमोट सेंसिंग और फील्ड सर्वे दोनों शामिल होते हैं। उन्होंने कहा यह जानकारी इंडिया स्टेट ऑफ फारेस्ट रिपोर्ट 2023 में प्रकाशित की गई है।
सिंह के द्वारा रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि भारत के पर्वतीय जिलों में कुल 2,83,713.20 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में वन आवरण है। यह इन जिलों के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 40 प्रतिशत है। इसके अलावा साल 2021 से 2023 के बीच पर्वतीय क्षेत्रों में वन आवरण में 234.14 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि दर्ज की गई है। यह पर्यावरण संरक्षण के लिए एक सकारात्मक संकेत है।
पेयजल नमूनों की जांच
सदन में उठे एक सवाल का जवाब देते हुए आज, जल शक्ति राज्य मंत्री वी. सोमन्ना ने राज्यसभा में कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के लिए जल जीवन मिशन चलाया जा रहा है। इस योजना के तहत पानी की गुणवत्ता की निगरानी के लिए जेजेएम-जल गुणवत्ता प्रबंधन सूचना प्रणाली (डब्ल्यूक्यूएमआईएस) नामक ऑनलाइन पोर्टल बनाया गया है।
इस पोर्टल के माध्यम से देशभर में पानी के नमूनों की जांच की जानकारी एकत्र की जाती है। सोमन्ना ने बताया कि-
वर्ष 2023-24 में लगभग 59 लाख पानी के नमूनों की जांच की गई।
वर्ष 2024-25 में 82 लाख से अधिक नमूनों की जांच हुई।
वर्ष 2025-26 में अब तक 63 लाख से अधिक नमूनों की जांच की जा चुकी है।
मंत्री ने कहा कि इस प्रक्रिया से यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि लोगों को स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध हो।
सरकार का दावा है कि वह भारत में पर्यावरण संरक्षण और जल प्रबंधन को मजबूत बनाने के लिए लगातार नई नीतियां और योजनाएं लागू कर रही है। फ्लाई ऐश के उपयोग, वेटलैंड संरक्षण, भूजल की निगरानी, सीवेज ट्रीटमेंट, जलवायु अनुकूलन परियोजनाओं और पेयजल परीक्षण जैसे कदम देश के सतत विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।