बीकानेर में सोलर कंपनियां बड़ी तेजी से पैर पसार रही हैं। ये कंपनियां प्लांट के लिए किसानों से जमीन लीज पर लेने के साथ ही खरीद भी रहीं हैं। प्लांट आने से पहले कंपनी के एजेंट इलाके में सक्रिय हो जाते हैं और किसानों से व्यक्तिगत रूप से मिलकर उन्हें तरह-तरह के लालच देकर जमीन देने को राजी करते हैं। एजेंट किसानों को खेती के बदले जमीन लीज पर देने या बेचने के लाभ गिनाकर मना लेते हैं।
इसके बाद कंपनी किसानों से 15,625 रुपए प्रति बीघा प्रतिवर्ष की दर पर जमीन 30 साल के लिए लीज पर ले लेती है। कई गांव में किसानों से 50 हजार रुपए प्रति बीघा से 2 लाख रुपए प्रति बीघा तक जमीन खरीदी भी गई है। हालांकि कंपनी को जमीन देने वाले अधिकांश किसानों को इसका पछतावा है। वे कहते हैं कंपनियां कागजों पर दस्तखत करवा लेती हैं और वे उन्हें पढ़ तक नहीं पाते क्योंकि ये कागज मुख्यत: अंग्रेजी में होते हैं। उन्हें सबसे अधिक पीड़ा खेजड़ी की कटाई से हो रही है।
सोलर प्लांट के लिए 2024 में अपनी 100 बीघा जमीन बेचने वाले कालासर गांव के कालूराम कहते हैं कि उन्हें इसका इतना पछतावा है कि बस मरना बाकी रह गया है। वह बताते हैं कि उनके खेतों में 100 से अधिक खेजड़ी के पेड़ थे, जिन्हें पूरी तरह काट दिया गया गया है। धरती खेजड़ी से नंगी हो चुकी है।
उनका दर्द यह कहते हुए छलक उठा, “जमीन बेचकर मुझे 50 लाख रुपए तो मिल गए लेकिन इसके बदले मैंने अपना सब कुछ खो दिया।” उनका पूरा पैसा बीमारियों, कर्ज चुकाने और शादियों में खर्च हो गया। अब उनके पास केवल घर बचा है। उनका यहां तक कहना है कि पूरे गांव की जमीन सोलर परियोजना में चली गई है।
जैव विविधता, कृषि और पशुधन पर असर
डाउन टू अर्थ ने बीकानेर के सात से आठ गांवों का दौरा किया और पाया कि ये गांव सौर प्लांट की भारी कीमत चुका रहे हैं। कालूराम गांव में पड़ रही गर्मी से इसे जोड़ते हुए कहते हैं, “अभी सर्दी का मौसम गया नहीं लेकिन लेकिन गर्मी पड़ने लगी है।”
उन्हें डर है कि आने वाले समय में पूरे गांव को पलायन करना पड़ सकता है क्योंकि गर्मी असहनीय हो जाएगी। वह कहते हैं कि खेजड़ी के पेड़ों से छाया रहती और गर्मी से बचाव होता था। आगे वह बताते हैं कि 2022-23 हिरण, मोर, नीलगाय खूब दिखते थे लेकिन अब गायब से हो गए हैं।
उनकी बात को आगे बढ़ाते हुए गणेश कहते हैं कि उनके गांव से लाखूसर जाने वाली 12 किमीमीटर लंबी सड़क पर 10-12 हिरण दिख जाते हैं लेकिन अब एक भी नहीं दिखता। उनका कहना है कि आसपास के करीब 20 गांवों में बड़े पैमाने पर सौर प्लांट लग रहे हैं। इन सभी गांवों में खेती, पशुपालन और जैव विविधिता खत्म हो रही है।
हरीश चौधरी कहते हैं कि प्लांट अभी निर्माणाधीन है लेकिन इसके नुकसान अभी से दिखने लगे हैं। गांव में रोजगार खत्म हो गया है। वह पशुधन के उदाहरण से समझाते हैं कि करीब 600 परिवार वाले उनके गांव में पशुधन पिछले दो तीन वर्षों में आधा हो गया है।
उनका मानना है कि गांव के लिए सोलर समाधान नहीं बल्कि समस्या है। उनके अनुसार, एनटीपीसी ने सरकारी जमीन भी खरीद ली है जिससे चारागाह खत्म हो गए और पशु भूख से मर रहे हैं।
महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय में पर्यावरण विभाग के प्रमुख अनिल कुमार छंगाणी ने 2025 में अपने अध्ययन में पाया था कि जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर और बाड़मेर में बड़े सोलर प्लांट ने थार की पारिस्थितिकी और जैव विविधता पर नकारात्मक असर डाला है।
उनके अनुसार, केवल इन चार जिलों में सौर परियोजनाओं के लिए हरित ऊर्जा के नाम खेजड़ी, रोहिड़ा, केर, बेर, देसी बबूल जैसे 25 लाख पेड़ों को काट दिया गया है।
इस कारण सोलर प्लांट के केंद्र से करीब 1000 मीटर की दूरी के बीच तापमान में 3 से पांच डिग्री सेल्सियस बढ़ गया। उनका कहना है कि सूखे क्षेत्र में तापमान में यह बदलाव पौधों और पशुओं पर नकारात्मक असर डाल सकता है। आवास नष्ट होने, बढ़ा तापमान और पानी की कमी स्थानीय प्रजातियों का जीवन मुश्किल में डाल सकती है।
इससे स्थानीय प्रजातियों की आबादी कम होने के साथ ही विलुप्त का भी खतरा है। उनके अनुसार, सौर पैनल जैसी काली सरफेस प्राकृतिक वनस्पतियों की तुलना में अधिक सौर रेडिएशन सोखती हैं, जिससे अक्सर हीट आइलैंड प्रभाव उत्पन्न होता है।
सौर ऊर्जा प्लांट के प्रभाव स्थानीय जल निकायों पर भी पड़ते हैं। छंगाणी ने डाउन टू अर्थ को बताया कि सौर प्लांट में लगे पैनलों को धोने के लिए लाखों लीटर पानी की आवश्यकता होती है। थार क्षेत्र में पहले ही पानी की सीमित उपलब्धता है।
इस क्षेत्र में ये प्लांट स्थानीय जल निकायों पर बेहद बुरा प्रभाव डाल रहे हैं। बीकानेर के खारी चरणान क्षेत्र में सैटेलाइट तस्वीरों के माध्यम से पता चला कि 2014 से 2022 के बीच इस क्षेत्र में जल निकाय 100 से घटकर गिने चुने ही बचे हैं।
वह चेताते हैं कि पारंपरिक जल स्रोतों से सोलर प्लांट के लिए पानी उठाने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इससे खेतों, समुदाय और स्थानीय पारिस्थितिकी में जल की उपलब्धता बुरी तरह प्रभावित होगी। साथ ही निकाय निकाय के आसपास की जैव विविधता पर भी असर पड़ेगा।
उनका कहना है कि क्षेत्र में अधिकांश प्लांट इंदिरा गांधी नहर के कमांड क्षेत्र में आ रहे हैं, जहां सरकार ने खेतों और घरों में पानी पहुंचाने के लिए भारी निवेश किया है। बहुत से इलाकों में यह इन्फ्रास्ट्रचर ध्वस्त कर दिया गया है। किशना राम गोदारा कहते हैं कि खेतों के लिए पहुंचने वाला नहरी पानी का इस्तेमाल सोलर कंपनी कर रही हैं, जिससे खेतों को पानी नहीं मिल रहा है।
बीकानेर में पदस्थ एक वैज्ञानिक ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि अधिकांश प्लांट कृषि भूमि पर आ रहे हैं, जहां किसान साल की एक फसल ले रहे हैं। वनस्पति खत्म होने पर यह भूमि पूरी तरह से बंजर हो जाएगी।
छंगाणी के अनुसार, ग्रीन परियोजना के नाम पर सौर प्लांट पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) से मुक्त हैं। इन परियोजनाओं के लिए भी ईआईए जरूरी होना चाहिए क्योंकि ये थार की जैव विविधता पर बुरा असर डाल रहे हैं।
वह कहते हैं कि अधिकांश सोलर प्लांट वाली जमीन पर सांपों और चूहों के बिल थे, जिन्हें कंक्रीट से भरकर जिंदा दफन कर दिया गया है। वह आगे कहते हैं कि प्लांट से उत्पन्न होने वाली बिजली को नंगी तारों ले जाया जा रहा है जिसकी चपेट में आकर गोडावन और गिद्धों की मौत हो रही है।
उनका सुझाव है कि सौर ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए बहुत से वैकल्पिक स्थान हैं, जैसे इंदिरा गांधी नहर के ऊपर पैनल लगाए जा सकते हैं। इससे जहां पानी का वाष्पीकरण रुकेगा, वहीं पैनलों को धोने के लिए इस्तेमाल पानी वापस नहर में गिरेगा। इसके अलावा तमाम हाइवे और एक्सप्रेस के किनारे भी सौर ऊर्जा पैदा की जा सकता है।