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ऊर्जा

पीछे छूटे जीवाश्म ईंधन: 25 फीसदी के योगदान के साथ सौर ऊर्जा ने लिखा नया इतिहास

रुझान दर्शाते हैं कि 2025 में सौर ऊर्जा ने 25 फीसदी से अधिक का योगदान देकर पहली बार वैश्विक ऊर्जा वृद्धि में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है

Lalit Maurya

  • 2025 वैश्विक ऊर्जा क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक टर्निंग पॉइंट साबित हुआ, जहां पहली बार सौर ऊर्जा ने 25 फीसदी से अधिक योगदान देकर ऊर्जा वृद्धि में सबसे बड़ी भूमिका निभाई और जीवाश्म ईंधनों के दशकों पुराने दबदबे को चुनौती दी।

  • अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, कुल ऊर्जा मांग की रफ्तार भले ही 1.3 फीसदी तक सीमित रही, लेकिन बिजली की मांग दोगुनी गति से बढ़ी, जो तेजी से “इलेक्ट्रिक होती दुनिया” का संकेत है।

  • अक्षय और परमाणु ऊर्जा ने मिलकर कुल वृद्धि का करीब 60 फीसदी हिस्सा संभाला, जबकि इलेक्ट्रिक वाहनों के विस्तार ने तेल की मांग को सीमित कर दिया और कोयले का प्रभाव भी कमजोर पड़ा। साथ ही, सौर ऊर्जा में रिकॉर्ड वृद्धि, बैटरी स्टोरेज का तेजी से विस्तार और उत्सर्जन वृद्धि का धीमा पड़ना इस बदलाव को और मजबूत करते हैं।

  • यह साफ संकेत है कि दुनिया अब ऊर्जा के एक नए युग में प्रवेश कर चुकी है, जहां सूरज भविष्य की धुरी बन रहा है। आने वाले समय में वही देश आगे रहेंगे, जो इस बदलाव को तेजी से अपनाकर अपनी ऊर्जा व्यवस्था को स्वच्छ, सस्ती और पर्यावरण अनुकूल बना पाएंगे।

दुनिया में ऊर्जा क्षेत्र की तस्वीर तेजी से बदल रही है, और 2025 इस बदलाव का एक अहम मोड़ बनकर सामने आया है। ताजा आंकड़े बताते हैं कि 2025 में पहली बार सौर ऊर्जा ने वैश्विक ऊर्जा वृद्धि में 25 फीसदी से अधिक की हिस्सेदारी हासिल कर सभी स्रोतों को पीछे छोड़ दिया। गौरतलब है कि अब तक ऊर्जा की दुनिया पर तेल, गैस और कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों का दबदबा रहा, लेकिन इस साल स्थिति पूरी तरह बदल गई।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि यह महज एक आंकड़ा नहीं, बल्कि गहरे बदलाव का संकेत है, जहां दुनिया धीरे-धीरे नहीं, बल्कि निर्णायक रूप से स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रही है।

‘ग्लोबल एनर्जी रिव्यू 2026’ के मुताबिक आर्थिक और भू-राजनीतिक चुनौतियों के बीच भले ही वैश्विक स्तर पर 2025 में ऊर्जा की मांग धीमी रफ्तार से बढ़ी हो, लेकिन इस दौरान बिजली की खपत ने नया रिकॉर्ड बनाया है। रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में वैश्विक स्तर पर ऊर्जा की मांग महज 1.3 फीसदी बढ़ी, जो पिछले साल और बीते दशक के औसत (1.4 फीसदी) से भी कम है।

वहीं दूसरी तरफ इस दौरान बिजली की मांग करीब तीन फीसदी बढ़ी, यानी ऊर्जा की कुल मांग से यह दोगुनी रफ्तार से बढ़ी है। देखा जाए तो इमारतों, उद्योगों, इलेक्ट्रिक वाहनों और डेटा सेंटरों ने इस मांग को लगातार आगे बढ़ाया है। यह साफ तौर पर दर्शाता है कि हमारी जिंदगी अब पहले से कहीं ज्यादा “इलेक्ट्रिक” हो चुकी है।

हालांकि 2025 में बिजली की मांग में हुई बढ़ोतरी 2024 के मुकाबले थोड़ी धीमी रही, जिसकी वजह भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में अनुकूल मौसम के कारण कूलिंग की मांग घटने से जुड़ी थी, फिर भी यह पिछले दशक के औसत से अधिक बनी रही।

सौर ऊर्जा: बदलती तस्वीर का सबसे चमकदार चेहरा

रिपोर्ट में सामने आया है कि यह पहली बार है जब सौर ऊर्जा ने दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति में हो रही वृद्धि में सबसे ज्यादा 25 फीसदी का योगदान दिया है, जो स्पष्ट तौर पर दर्शाता है कि सूरज अब विकल्प नहीं, भविष्य बन चुका है।

वहीं प्राकृतिक गैस अभी भी अहम भूमिका में है और 17 फीसदी के योगदान के साथ दूसरे स्थान पर रही। आंकड़े दर्शाते हैं कि 2025 में अक्षय और परमाणु ऊर्जा ने मिलकर कुल ऊर्जा मांग में हुई वृद्धि में करीब 60 फीसदी का योगदान दिया। यह स्पष्ट संकेत है कि दुनिया अब धीरे-धीरे स्वच्छ ऊर्जा की ओर रुख कर रही है।

दूसरी तरफ तेल की मांग की बढ़ती रफ्तार धीमी पड़कर 0.7 फीसदी पर आ गई और इसकी सबसे बड़ी वजह है इलेक्ट्रिक वाहनों की तेज रफ्तार।

2025 में दो करोड़ से ज्यादा इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री इस बात का सबूत है कि दुनिया पेट्रोल-डीजल से आगे बढ़ रही है। जानकारी मिली है कि इस दौरान इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री में 20 फीसदी की वृद्धि हुई। रुझानों से पता चला है कि 2025 में जितनी भी नई कारें बिकी थी, उनमें से करीब एक-चौथाई इलेक्ट्रिक थी।

कोयले की भूमिका भी अब पहले जैसी मजबूत नहीं रही। चीन में अक्षय ऊर्जा के बढ़ते उपयोग के कारण कोयले की मांग घटी है। हालांकि अमेरिका में महंगी गैस के चलते कुछ हद तक कोयले की वापसी हुई। इसी तरह कुछ देशों में इसमें हल्की बढ़ोतरी भी देखी गई। लेकिन कुल मिलाकर यह साफ है कि कोयले का दौर अब ढलान पर है।

बिजली क्षेत्र में सौर ऊर्जा ने 600 टेरावाट-घंटे की ऐतिहासिक छलांग लगाई है। इतनी बड़ी बढ़ोतरी पहले कभी नहीं देखी गई। यह किसी भी तकनीक द्वारा एक साल में हुई सबसे बड़ी वृद्धि है। इससे दुनिया भर में कोयला आधारित बिजली उत्पादन में कमी आई।

इस साल बैटरी स्टोरेज सबसे तेजी से बढ़ने वाली तकनीक बनकर उभरी। करीब 110 गीगावाट नई बैटरी क्षमता जोड़ी गई, जो प्राकृतिक गैस की अब तक की सबसे बड़ी सालाना वृद्धि से भी ज्यादा है। वहीं, कई देशों में परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं को नई गति मिली और 2025 में 12 गीगावाट से ज्यादा क्षमता वाले न्यूक्लियर रिएक्टरों का निर्माण शुरू हुआ।

उत्सर्जन पर ब्रेक, लेकिन पूरी तरह नहीं

इस सबके बीच एक राहत भरी यह खबर भी है कि ऊर्जा क्षेत्र से हो रहे कार्बन उत्सर्जन की रफ्तार धीमी पड़कर महज 0.4 फीसदी रह गई है।

इस दौरान जहां चीन में उत्सर्जन घटा है। वहीं कोरोना को छोड़ दें तो भारत में 1970 के दशक के बाद पहली बार ऊर्जा क्षेत्र से हो रहा उत्सर्जन करीब स्थिर रहा है। यह संकेत है कि बदलाव सिर्फ इरादों में नहीं, जमीन पर भी दिखने लगा है।

इसमें असामान्य रूप से मजबूत मानसून ने बड़ी भूमिका निभाई, जिससे उत्सर्जन को सीमित रखने में मदद मिली।

इसके उलट, विकसित देशों में कड़ाके की सर्दी के कारण जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल बढ़ा और उत्सर्जन भी ज्यादा हुआ। नतीजतन, 1990 के दशक के बाद पहली बार विकसित देशों में ऊर्जा क्षेत्र से हो रहे उत्सर्जन में 0.5 फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई। वहीं उभरती-विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के मामले में वृद्धि का यह आंकड़ा 0.3 फीसदी दर्ज किया गया।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी प्रमुख फातिह बिरोल का इस बारे में कहना है, “जटिल आर्थिक और भू-राजनीतिक हालात के बावजूद 2025 में वैश्विक स्तर पर ऊर्जा की मांग बढ़ी है। यह स्पष्ट है कि दुनिया तेजी से बिजली पर निर्भर होती जा रही है।

बिजली की खपत कुल ऊर्जा मांग से कहीं तेजी से बढ़ रही है, और इसमें सबसे तेज बढ़त सौर ऊर्जा की रही। पहली बार सौर ऊर्जा ने वैश्विक ऊर्जा में हो रही बढ़ोतरी में एक-चौथाई से ज्यादा का योगदान दिया, इसके बाद प्राकृतिक गैस का स्थान रहा।"

उनके मुताबिक आज के तेजी से बदलते माहौल में वही देश आगे रहेंगे, जो अपनी ऊर्जा व्यवस्था को मजबूत और विविध बनाएंगे, ताकि भविष्य में सस्ती और सुरक्षित ऊर्जा सुनिश्चित की जा सके।

2025 ने यह साफ कर दिया है कि दुनिया की ऊर्जा व्यवस्था एक नए युग में प्रवेश कर चुकी है, जहां सोलर महज एक विकल्प नहीं, बल्कि जरुरत बनता जा रहा है। अब सवाल यह नहीं कि ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव होगा या नहीं…सवाल यह है कि दुनिया इस बदलाव के साथ कितनी तेजी से खुद को ढाल पाती है।