चिलचिलाती गर्मी में एक किसान हाथों में फावड़ा लिए सड़क के पास काटी गई एक नाली को फिर से ठीक कर उसे अपने खेत में जोड़ रहे थे। तभी किसान ने देखा कि सड़क पर सामने से एक साइकिल सवार तेजी से आ रहा है। किसान ने सवार को तेज आवाज देकर रुकवाया और जमकर उसे खरीखोटी सुनाई। किसान राकां गांव (जिला बमेतरा, तहसील बेरला) के संतोष साहू हैं और वह अपने खेत से जुड़े 35 एकड़ में फैले एथेनाल संयंत्र से निकलने वाले दूषित जल को अपने खेत के दूसरी ओर मोड़ रहे थे। साइकिल सवार संयंत्र का कर्मचारी है और उसी ने संयंत्र के दूषित जल की नाली काट कर उनके खेतों की ओर मोड़ दी थी। इस पर साहू पास खड़े राकां गांव के सरपंच धनाराम निषाद से शिकायती स्वर में कह रहे हैं कि पहले तो इस संयंत्र से निकलने वाली असहनीय बदबू ने पूरे गांव के लोगों को परेशान कर रखा है और ऊपर से अब उनके कर्मचारी संयंत्र से निकलने वाले दूषित जल को हमारे खेतों से जोड़ रहे हैं ताकि पता ही न चले कि इस संयंत्र से किसी प्रकार दूषित जल की निकासी भी होती है कि नहीं।
पिछले कुछ महीने से छत्तीसगढ़ के बमेतरा जिले के चार गांवों में इसी प्रकार की झड़प आए दिन देखने को मिल जाती है। ग्रामीण संयंत्र का विरोध बीते चार सालों से करते आ रहे हैं लेकिन उनकी सुनवाई कहीं नहीं हो पा रही है बल्कि उनके अहिंसक आंदोलन के बावजूद ग्रामीणों पर आए दिन पुलिस द्वारा अशांति फैलाने के आरोप में उन पर एफआईआर दर्ज हो रही है। साथ ही कई बार ग्रामीणों को पुलिस पिछले माहों में गिरफ्तार कर जेल में भी डाल चुकी है। स्थानीय किसान शांति पूर्ण आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन पुलिस ने धारा 170 (पुरानी प्रतिबंधात्मक धारा 151) में ही दो लोगों (अजिताभ मिश्रा व सिद्दीक खान) पर 09 जनवरी 2025 एफआईआर दर्ज कर जेल भेज दिया।
बाद में जिला सत्र न्यायालय ने आंदोलनकारियों को जेल भेजने की कार्यवाही को पांच दिन बाद ही यानी 13 जनवरी 2025 को अवैध ठहराया। इसी प्रकार आंदोलन को कुचलने के इरादे से की गई एफआईआर भी गलत साबित हो चुकी है। तत्कालीन तहसीलदार ने दो आंदोलनकारी अजिताभ मिश्रा और सिद्दीक खान पर जिला कार्यालय बेमेतरा में लागू प्रतिबंधात्मक क्षेत्र घेराव का आरोप लगा कर एफआईआर दर्ज करा दी। इसके बाद जब पीड़ित पक्ष ने सूचना के अधिकार के तहत जानकारी निकाली तो उसमें तथ्य निकल कर आया कि एफआईआर तिथि 24 अक्टूबर 2024 के दिन धारा 163 (पुरानी धारा 144) लागू ही नहीं थी।
बमेतरा की बेरला तहसील में लगे इन दो संयंत्रों से लगभग 35 हजार की ग्रामीण आबादी प्रभावित हो रही है। इस संबंध में आंदोलन कर रहे सिद्दीक खान कहते हैं, “कहने के लिए तो यह संयंत्र केवल दो गांव में ही लगे हैं लेकिन वास्तविकता ये है कि इससे अकेले हमारे ये दो गांव ही प्रभावित नहीं हो रहे हैं बल्कि हमारे गांव के आसपास के 25 से 30 गांव भी प्रभावित हो रहे हैं।” वह बताते हैं कि हमारे आंदोलन में गांव के आसपास के इन 30 गांव के ग्रामीण भी हमेशा शामिल हो रहे हैं।
इस संबंध में रायुपर स्थित “नदी घाटी मोर्चा” के संयोजक गौतम बंदोपाध्याय ने डाउन टू अर्थ से कहा, “छत्तीसगढ़ में स्थापित किए जाने वाले 29 एथेनाल संयंत्रों में से 21 गांव के बीचोबीच या गांव के आसपास ही लगाए जा रहे हैं, ऐसे हालात में ग्रामीणों की खेती की जमीन और गांव का वातावरण दूषित हो रहा है और पिछले चार सालों का ग्रामीणों का विरोध प्रदर्शन पूरी तरह से जायज है।” वह कहते हैं कि इन संयंत्रों के लिए अधिग्रहीत की गई अधिकांश जमीनें चारागाह, श्मशान घाट और गौशालाएं जैसे गांव के निस्तार की जमीनें हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंच रहा है और सबसे बड़ी कमी यह है कि पिछले चार सालों से चल रहे विरोध प्रदर्शन के बावजूद सरकार ने अब तक इसकी समीक्षा करना उचित नहीं समझा है। विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य को “धान के कटोरे” की संज्ञा मिली हुई है। यही नहीं जिस बमेतरा जिले में राज्य सरकार 11 एथेनाल प्लांट लगाने की तैयारी में है, यहां धान का रकबा राज्य में सबसे अधिक है। इस संबंध में बंदोपाध्याय कहते हैं, “धान और पराली पर आधारित कई एथेनाल प्लांट स्थापित होने से खाद्य सुरक्षा को भी खतरा हो सकता है।”
यह स्थिति अकेले छत्तीसगढ़ के इस गांव की नहीं है बल्कि देश के आधा दर्जन से अधिक राज्यों में एथेनाल संयंत्रों का विरोध हो रहा है। छत्तीसगढ़ के अलावा राजस्थान, हरियाणा और बिहार में भी उग्र विरोध प्रदर्शन हो रहा है। सभी ग्रामीणों का विरोध तीन बातों पर विशेष रूप से केंद्रित है। पहला, जहां संयंत्र स्थापित हो रहे हैं, वहां के भूजल को प्रदूषित होने की आशंका है। दूसरा, चूंकि अधिकांश संयंत्र गांव के बीचोंबीच या आसपास ही स्थापित किए जा रहे हैं, इससे उन इलाके में वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है और तीसरी, जिस इलाके में ये संयंत्र स्थापित किए जा रहे हैं, उस इलाके में भविष्य में जल संकट खड़ा होने जा रहा है। निषाद बताते हैं कि अकेले बमेतरा में 11 एथेनाल संयंत्र को मंजूरी मिली है। इनमें से दो पूरे हो चुके हैं और दो निर्माणाधीन हैं। वह कहते हैं कि इसमें सबसे खतरनाक बात यह है कि ये सभी संयंत्र शिवनाथ नदी के किनारे ही स्थापित किए जा रहे हैं। ध्यान रहे कि छत्तीसगढ़ सरकार ने 2024 में विधान सभा में जानकारी दी थी कि राज्य में कुल 34 एथेनाल संयंत्रों के निर्माण के लिए समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए हैं। जबकि केंद्र सरकार ने राज्य में कुल 42 संयंत्रों की मंजूरी दी है। वहीं दूसरी ओर देश के 22 राज्यों में केंद्र सरकार ने 499 एथेनाल संयंत्रों के निर्माण को मंजूर किया है। यहां ध्यान देने की बात यह है कि इनमें अधिकांश अनाज आधारित संयंत्र स्थापित किए जाने हैं।
छत्तीसगढ़ के बमेतरा जिले के राकां गांव में निर्माणाधीन एथेनाल संयंत्र अपने अंतिम चरण में जा पहुंचा है। यह 2022 में शुरू हुआ था, तभी से स्थानीय ग्रामीणों द्वारा इसका विरोध किया जा रहा है। राकां गांव के सरपंच धनाराम निषाद कहते हैं कि प्रशासन ने इस संयंत्र की स्थापना गांव की उपजाऊ खेतों के बीचोंबीच कर दी है। इसके कारण इससे निकलने वाला दूषित जल गांव के खेतों में जा रहा है। वह कहते हैं कि यही नहीं यह संयंत्र ठीक शिवनाथ नदी के किनारे निर्माण किया गया है, इससे प्रशासन नदी का अधिकांश जल संयंत्र को दे रहा है और किसानों के लिए वह नए-नए कानून बनाकर रुकावटें पैदा कर रहा है। गांव के ही प्रभावित किसान अवध साहू ने बताया कि हालात ये हैं कि जब हम नदी में अपनी पानी की मोटर खेतों की सिंचाई के लिए लगाते हैं तो प्रशासन उसे जब्त कर लेता और जुर्माना अलग से लगा देता है। वह बताते हैं यह स्थिति पिछले चार सालों से लगातार जारी है। ध्यान रहे कि छत्तीसगढ़ राज्य को “धान का कटोरा” कहा जाता है और राकां गांव में बन रहे संयंत्र को बड़ी मात्रा में जल की आवश्यकता है। गांव के सरपंच निषाद ने बताया कि परियोजना की जल उपयोग योजना के अनुसार 935.5 घन मीटर पानी प्रतिदिन शिवनाथ नदी पर स्थित रांका- बूढ़ाजोंग एनीकट से लिया जाना प्रस्तावित है। वह बताते हैं कि भारी मात्रा में जल दोहन इसलिए गंभीर खतरा पैदा करता है क्योंकि बेरला तहसील पहले से ही “संकटग्रस्त” श्रेणी में दर्ज है।
ध्यान रहे कि केंद्रीय भूजल बोर्ड, उत्तर-मध्य छत्तीसगढ़ क्षेत्र, जल संसाधन विभाग, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण और केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट “छत्तीसगढ़ के गतिशील भूजल संसाधन, 2024” के परिशिष्ट-9 में बेरला तहसील को बमेतरा जिले के अंतर्गत “संकटग्रस्त” के रूप में दिखाया गया है। ग्रामीणों को भय है कि संयंत्र को दिया गया भारी मात्रा में जल कृषि उद्देश्यों के लिए पानी की कमी को जन्म देगा, जिससे उन किसानों की आजीविका प्रभावित होगी जो सिंचाई के लिए इसी जलस्रोत पर निर्भर हैं। ध्यान रहे कि रांका गांव एक कृषि-प्रधान गांव के रूप में जाना जाता है। इसके अलावा यह भी आशंका है कि संयंत्र को यदि अधिक मात्रा में पानी दिया गया तो इलाके में जल संकट उत्पन्न हो सकता है। किसान संतोष साहू कहते हैं, “यदि ऐसा होता है तो यह हमारे स्वच्छ जल के मौलिक अधिकार पर सीधे-सीधे आघात होगा।” वह कहते हैं कि जब जल स्तर घटेता तो बूढ़ाजोंग एनीकट ही पीने के लिए पानी, घरेलू उपयोग, सिंचाई और अन्य आवश्यकताओं के लिए एकमात्र स्रोत रह जाएगा।
छत्तीसगढ़ को “धान का कटोरा” कहा जाता है और बमेतरा में 11 एथेनाल संयंत्र स्थापित किए जा रहे हैं। इस जिले में धान का रकबा सबसे अधिक है। धान आधारित संयंत्र स्थापित होने से खाद्य सुरक्षा भी खतरे में
राकां गांव में पिछले चार सालों से एथेनाल संयंत्र के खिलाफ आंदोलन कर रहे सिद्दीक खान कहते हैं कि पिछले कुछ सालों से छत्तीसगढ़ में किसानों को धान उगाने के लिए बढ़ावा मिल रहा है। ध्यान रहे कि धान का उत्पादन 2009-10 में 4.11 मिलियन टन था, जो 2022-23 में 10.5 मिलियन टन हो गया। खान बताते हैं, “हमारे यहां धान रोपी जाती है, ऐसे में बहुत अधिक पानी की जरूरत पड़ती है और हम सभी यह जानते हैं कि एक किलो धान के लिए लगभग 2,500 से 3,000 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है, ऐसे में एथेनाल संयंत्र लगने से हमारे खेतों में पानी कहां से आएगा? अधिकांश पानी तो यह संयंत्र ही गटक जाएगा।”
खान ने बताया कि यहां के जिला कलेक्टर ने तो हमारे साथ शोषण की सभी हदें पार कर दीं हैं, गत वर्ष जिला कलेक्टर ने 29 अक्टूबर 2025 को हमारे इलाके में हम किसानों को संबोधित करता हुआ एक सर्कुलर जारी किया। इसमें कहा गया था कि जिले में 80 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या कृषि पर आधारित है। जिले का कुल रकबा 2.25 लाख हेक्टेयर है और इसमें 2.05 लाख हेक्टेयर में धान की फसल ली जाती है।
सर्कुलर में आगे बताया गया है कि धान की फसल में पानी की अत्यधिक मात्रा का उपयोग किया जाता है। एक किलो धान के लिए 2,500 से 3,000 लीटर पानी खर्च होता है। इसके उपयोग से जिले में जल संकट की स्थिति पैदा हो गई है। ऐसे में जिले की चार विकास खंड की 425 ग्राम पंचायतों ने स्वत: निर्णय लिया है कि आगामी ग्रीष्कालीन धान की फसल वे नहीं लगाएंगे। जबकि सिद्दीक खान कहते हैं कि इस प्रकार का निर्णय हमारे यहां किसी भी ग्राम पंचायत ने नहीं लिया था। ग्रामीणों का कहना है कि हमारे द्वारा बचाए गए पानी को प्रशासन संयंत्र को देना चाहता था।
बंधोपाध्याय सवाल उठाते हुए कहते हैं कि हमारे देश में आज भी करोड़ों लोगों को दो वक्त की रोटी नसीब नहीं हो रही है, ऐसे में क्या एथेनाल जरूरी है? वह कहते हैं, “जब हम ग्लोबल हंगर इंडेक्स में नीचे के पायदान पर हैं तो ऐेसे में खाने की चीज को तेल में बदलना कहां का न्याय है?” इस संबंध में सरपंच निषाद कहते हैं कि तेल के लिए हमारे धान का उपयोग से कभी सतत विकास नहीं होने वाला।
पिछले चार सालों से ग्रामीण “पर्यावरण बचाओ-प्रदूषण भगाओ” बैनर तले आंदोलन कर रहे हैं लेकिन अब तक इसमें किसी प्रकार के पदाधिकारी नियुक्ति नहीं किए गए हैं। इसके पीछे कारण बताते हुए पूर्व जनपद सदस्य सिद्दीक खान ने डाउन टू अर्थ को बताया कि हम ग्रामीणों ने यह निर्णय इसलिए लिया कि आए दिन हमारे द्वारा संयंत्र के खिलाफ किए जाने वाले विरोध-प्रदर्शन के दौरान प्रशासन हमें गिरफ्तार कर लेता है और कई हफ्तों बाद ही हमें जमानत मिल पाती है, ऐसे में यदि कोई पदाधिकारी नियुक्त होगा तो आंदोलन के संचालन में बाधा आ जाएगी, इसलिए हम सभी आंदोलनकारी बिना पदाधिकारी के ही यह आंदोलन पिछले चार सालों से अनवरत रूप से चला रहे हैं।
गांव के एक अन्य प्रभावित किसान अजिताभ मिश्रा ने बताया कि राज्य सरकार की पर्यावरण स्वीकृति रिपोर्ट में निकटवर्ती संरक्षित क्षेत्रों की अनुपस्थिति का उल्लेख किया गया है परंतु यह नहीं बताया गया कि राकां गांव में स्थित संयंत्र स्थल कृषि भूमि, एक स्कूल, एक मदरसा और एक नदी से घिरा हुआ है। वह बताते हैं कि इस निकटता के कारण औद्योगिक, वायु, जल और ध्वनि प्रदूषण से छात्रों, शिक्षकों, किसानों और स्थानीय समुदाय के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा और कृषि उत्पादकता घटने के पूरे आसार हैं। ग्रामीणों को विशेष रूप से चिंता है कि संयंत्र का दूषित पानी गांव के आसपास की भूमि को बंजर बना देगा। राकां गांव के एक अन्य निवासी ओंकारनाथ कहते हैं, “सबसे महत्वपूर्ण बात है कि एथेनाल की अत्यंत ज्वलनशील प्रकृति को देखते हुए यह संयंत्र आसपास की आबादी, विशेषकर बच्चों और छात्रों के लिए विस्फोट का गंभीर खतरा पैदा करता है, संयंत्र के कारण बढ़ने वाला वाहन यातायात भी किसानों की भूमि तक पहुंच को बाधित करेगा।”
राकां गांव के ग्रामीणों का कहना है कि हमारे गांव में स्थापित हो रहे एथेनाल संयंत्र के लिए भूमि धोखे से प्रशासन के साथ मिलीभगत करके हस्तांतरित की गई। इस संबंध में गांव के संरपंच निषाद ने बताया, “प्रारंभ में जानकारी के अभाव में ग्राम पंचायत रांका ने 22 दिसंबर 2021 को प्रस्ताव पारित कर सुयश बायोफ्यूल्स प्रायवेट लिमिटेड को एथेनाल प्लांट लगाने के संबंध में “अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी)” दिया था परंतु बाद में परिस्थितियों की गंभीरता की जानकारी होने पर ग्राम पंचायत ने अपने प्रस्ताव क्रमांक नौ के तहत 21 जुलाई 2022 द्वारा पूर्व एनओसी को निरस्त कर दिया और साथ ही 22 जुलाई 2022 को इसकी जानकारी तत्कालीन अनुविभागीय अधिकारी (एसडीएम) को दी।” लेकिन ग्राम पंचायत द्वारा रद्द किए गए एनओसी के बावजूद एसडीएम बेरला ने 26 अगस्त 2022 को परियोजना के लिए भूमि परिवर्तन (डाइवर्शन) की अनुमति दे दी। आदेश में यह स्वीकार किया गया कि ग्राम पंचायत ने एनओसी वापस ले ली है, फिर भी आपत्ति को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (जेडएलडी) इकाई “गैर-प्रदूषण इकाई” होती है। यह तर्क न सिर्फ ग्राम पंचायत की आपत्तियों की प्रकृति की गलत समझ प्रदर्शित करता है बल्कि तकनीकी रूप से भी त्रुटिपूर्ण है क्योंकि जेडएलडी केवल अपशिष्ट जल निकासी से संबंधित है। यह एक प्रवाह प्रबंधन की शर्त है, न कि “गैर-प्रदूषणकारी” होने का प्रमाण पत्र।
प्रशासन द्वारा राकां गांव के साथ की जा रही धोखाधड़ी यहीं नहीं रुकी। अब प्रशासन ने एक और गलती की और जिले के जल संसाधन विभाग के कार्यपालन अभियंता ने 15 मई 2024 को कंपनी को शिवनाथ नदी के बूढ़ाजोंग एनीकट से सतही जल उपयोग की अनुमति दे दी, बिना ग्राम पंचायत रांका से परामर्श किए। निषाद कहते हैं, “संयंत्र ने रद्द किए गए पुराने एनओसी को आधार बनाकर जल संसाधन विभाग के समक्ष जल संबंधी अनुमति के लिए प्रस्तुत किया था, यह पूरी तरह से धोखाधड़ी है।”
राकां ग्राम पंचायत इस एकतरफा अनुमति को चुनौती दे रही है। पंचायत ने यह भी रेखांकित किया कि छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल द्वारा संयंत्र को जारी स्थापना हेतु सहमति (09 जनवरी 2023) एवं संचालन हेतु सहमति (29 अगस्त 2025) में स्पष्ट शर्त है कि उद्योग को रांका-बूढ़ाजोंग एनीकट से सतही जल के उपयोग हेतु संबंधित नियामक प्राधिकरण से अनुमति प्राप्त करनी होगी। ध्यान रहे कि छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 की धारा 49-क (xiii) एवं भारत के संविधान के 73वें संशोधन, ग्यारहवीं अनुसूची (मद-3) के अनुसार ग्राम पंचायत को नदी जल हेतु नियामक प्राधिकरण की शक्ति प्राप्त है।
इस संबंध में सिद्दीक खान कहते है, “जल संसाधन विभाग ने ग्राम पंचायत रांका से कोई परामर्श लिए बिना संयंत्र को बूढ़ाजोंग एनीकट से जल उपयोग की अनुमति प्रदान कर दी, जो कि संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों का सीधा उल्लंघन है।” वह बताते हैं कि छत्तीसगढ़ भूमि परिवर्तन नियम 14 के अंतर्गत किसी औद्योगिक इकाई या औद्योगिक प्रयोजन के लिए किसी ग्राम की आबादी के बाहरी सीमा से 1.5 किलोमीटर अंतर्गत आने वाली भूमि को परिवर्तन की अनुमति नहीं दी जाएगी और इस नियम का उल्लंघन करके एथेनाल प्लांट की भूमि परिवर्तन की अनुमति दी गई।
राकां गांव के अवध साहू कहते हैं कि एथेनाल संयंत्र से बदबू, जल संकट या जल प्रदूषण ही नहीं हो रहा बल्कि इस संयंत्र के कारण हमारे गांव की प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत बनाई गई सड़कें भी आए दिन संयंत्र में आने वाले भारी वाहनों के कारण टूट जाती हैं। वह बताते हैं कि इन सड़कों पर शासन का 12 टन से ऊपर की गाड़ी चलाने की मनाही का शासन बोर्ड लगा हुआ है लेकिन सड़क पर प्रतिदिन पर 50 से 60 वाहन इससे अधिक वजन का माल लेकर धड़ल्ले से आ-जा रहे हैं। इसके कारण गांव का रास्ता पूरी तरह से खराब हो चुका है।
निषाद कहते हैं कि जिस प्रकार की धोखाधड़ी हमारे साथ की गई लगभग इसी प्रकार से हमारे पड़ोसी गांव पथर्रा में भी की गई थी। ध्यान रहे कि पथर्रा स्थित प्लांट के लिए भूमि परिवर्तन का आदेश 18 अप्रैल 2022 को दिया गया और आदेश में लिखा गया कि इसके लिए विज्ञापन समाचार पत्र में दिया गया था लेकिन किसी प्रकार की आपत्ति नहीं आई है जबकि आदेश में जिस विज्ञापन की बात की जा रही है, वह 19 अप्रैल 2022 को प्रकाशित हुआ और साथ ही यह विज्ञापन एक ऐसे समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ जो कि इस इलाके में आता ही नहीं है। निषाद कहते हैं, “चार साल से अधिक हो गए हैं लड़ते हुए लेकिन हम सभी ग्रामीण जीवन के अंत तक यह लड़ाई जारी रखेंगे।”
(साथ में अमरपाल सिंह वर्मा)