दुनिया के ऑटोमोबाइल बाजार में बड़ा बदलाव धीमे-धीमे आकार ले रहा है। पेट्रोल और डीजल से चलने वाली पारंपरिक गाड़ियां जो पिछले सौ वर्षों से आधुनिक परिवहन व्यवस्था की पहचान रही हैं, अब धीरे-धीरे अपनी पकड़ खो रही हैं। उनकी जगह इलेक्ट्रिक वाहन ले रहे हैं। हाल में प्रकाशित एक अध्ययन ने यह दावा किया है कि यूरोप और चीन में इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है, बाजार स्वयं इलेक्ट्रिक वाहनों की दिशा में आगे बढ़ रहा है और पारंपरिक ईंधन आधारित वाहनों की वापसी मुश्किल होती जा रही है। यह केवल तकनीकी परिवर्तन नहीं, बल्कि ऊर्जा, अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और वैश्विक राजनीति तक असर डालने वाला बदलाव है। सवाल यह है कि इस वैश्विक परिवर्तन के बीच भारत कहां खड़ा है?
यूरोप और चीन के संदर्भ में किए गए अध्ययन का सार है कि इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री तेजी से कई गुना बढ़ रही है, यानी हर कुछ वर्षों में इनकी संख्या लगभग दोगुनी हो रही है और इन देशों में यह बाजार अब अपने बल पर आगे बढ़ने लगा है। शोधकर्ताओं के अनुसार इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती बिक्री, पेट्रोल-डीजल कारों की घटती मांग, बाजार में इलेक्ट्रिक वाहन के बढ़ते विकल्प और कीमतों में कम होता अंतर इस बात के संकेत हैं कि अब बाजार तेजी से बदलाव की दिशा में बढ़ चुका है, जहां से पुराने ढर्रे पर लौटना आसान नहीं होगा। चीन और यूरोप में यह परिवर्तन केवल बाजार की ताकत से नहीं आया, बल्कि वर्षों की नीति, सब्सिडी, सरकारी निवेश और उद्योग की तैयारी ने मिलकर इसे संभव बनाया है।
आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल बाजार है और तेजी से शहरीकरण, बढ़ती आय, ऊर्जा आयात और प्रदूषण जैसी चुनौतियों के बीच परिवहन का भविष्य तय करने की स्थिति में है। भारत की सड़कों पर आज भी पेट्रोल और डीजल वाहन हावी हैं, लेकिन इलेक्ट्रिक वाहनों की उपस्थिति अब केवल प्रयोगात्मक नहीं रही। दोपहिया और तिपहिया वाहनों में इलेक्ट्रिक वाहन की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ रही है। शहरी परिवहन में इलेक्ट्रिक बसें भी धीरे-धीरे जगह बना रही हैं। लेकिन चारपहिया निजी वाहनों के मामले में भारत अभी शुरुआती चरण में है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भारत भी उसी “निर्णायक मोड़” की ओर बढ़ रहा है, जिसकी चर्चा यूरोप और चीन के संदर्भ में हो रही है?
भारत के सामने इलेक्ट्रिक वाहनों की दिशा में बढ़ने का सबसे बड़ा तर्क आर्थिक है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के रूप में आयात करता है। तेल की कीमतों में वैश्विक उतार-चढ़ाव सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर डालते हैं। पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ने पर महंगाई बढ़ती है, परिवहन लागत बढ़ती है और विदेशी मुद्रा पर दबाव पड़ता है। ऐसे में अगर परिवहन का बड़ा हिस्सा बिजली आधारित हो जाए, तो तेल आयात पर निर्भरता कम की जा सकती है। अध्ययन भी बताता है कि तेल आयात करने वाले देशों को इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर संक्रमण से आर्थिक लाभ हो सकता है, क्योंकि इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और व्यापार संतुलन बेहतर हो सकता है।
पर्यावरणीय नजरिये से भी भारत के लिए इलेक्ट्रिक वाहन बदलाव केवल विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बनता जा रहा है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता जैसे बड़े शहरों में वायु प्रदूषण एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है। परिवहन क्षेत्र इसका बड़ा कारण है। पेट्रोल और डीजल वाहनों से निकलने वाला धुआं कार्बन उत्सर्जन के साथ-साथ नाइट्रोजन ऑक्साइड और सूक्ष्म कणों के रूप में स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है। भारत ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबद्धताएं जताई हैं। ऐसे में अगर परिवहन क्षेत्र में इलेक्ट्रिक वाहनों का विस्तार होता है, तो कार्बन उत्सर्जन कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि यह भी सच है कि इलेक्ट्रिक वाहन तभी वास्तव में हरित विकल्प होंगे, जब बिजली उत्पादन में भी स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़े।
लेकिन भारत की चुनौतियां यूरोप और चीन से अलग हैं। चीन ने इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग को बड़े पैमाने पर सरकारी सब्सिडी, बैटरी उत्पादन, सार्वजनिक खरीद और विनिर्माण क्षमता के सहारे विकसित किया। यूरोप ने भी कठोर उत्सर्जन नियमों और प्रोत्साहनों के जरिए बाजार को दिशा दी। भारत में नीति-स्तर पर फेम जैसी योजनाएं और राज्य सरकारों की इलेक्ट्रिक वाहन नीतियां आई हैं, लेकिन अभी भी बुनियादी ढांचे की कमी बड़ी बाधा है। चार्जिंग स्टेशन सीमित हैं, बैटरियों की लागत अधिक है और उपभोक्ताओं के मन में अब भी यह आशंका बनी हुई है कि लंबी दूरी की यात्रा के दौरान बैटरी खत्म होने पर चार्जिंग सुविधा समय पर मिलेगी या नहीं। ग्रामीण और छोटे शहरों में यह चुनौती और अधिक जटिल है। इसलिए भारत में इलेक्ट्रिक वाहन परिवर्तन केवल बाजार के भरोसे नहीं हो सकता, इसके लिए नीति और निवेश दोनों की निरंतर जरूरत होगी।
अध्ययन में यह भी कहा गया है कि इलेक्ट्रिक वाहनों की सफलता केवल सब्सिडी से नहीं आती, बल्कि सब्सिडी, अनिवार्य नीतियां, सार्वजनिक खरीद और बाजार उपलब्धता के संयुक्त प्रभाव से इलेक्ट्रिक वाहनों की स्वीकार्यता अपने आप तेजी से बढ़ने लगती है। यह बात भारत के संदर्भ में बहुत प्रासंगिक है। अगर केवल उपभोक्ताओं से अपेक्षा की जाए कि वे महंगे इलेक्ट्रिक वाहन खरीद लें, तो बदलाव धीमा रहेगा। लेकिन अगर सरकार सार्वजनिक परिवहन, टैक्सी सेवाओं, डिलीवरी नेटवर्क और सरकारी वाहनों में इलेक्ट्रिक वाहनों को अनिवार्य रूप से बढ़ाए, तो मांग और बाजार दोनों तेजी से बदल सकते हैं। भारत में दोपहिया और तिपहिया क्षेत्र में यही शुरुआती संकेत दिखाई भी दे रहे हैं।
यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या भारत इलेक्ट्रिक वाहन केवल आयातित तकनीक का बाजार बनेगा या इस परिवर्तन को औद्योगिक अवसर में बदल पाएगा? बैटरी निर्माण, लीथियम आपूर्ति, सेमीकंडक्टर, चार्जिंग तकनीक और स्थानीय विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में भारत के पास असीमित अवसर है। अगर भारत ने समय रहते उत्पादन क्षमता विकसित की तो वह न केवल घरेलू मांग पूरी कर सकता है, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा भी बन सकता है। लेकिन अगर नीति में स्पष्टता और निवेश में निरंतरता नहीं रही, तो भारत केवल उपभोक्ता बाजार बनकर रह जाएगा।
यह भी गौरतलब है कि इलेक्ट्रिक वाहनों का परिवर्तन केवल तकनीकी बदलाव नहीं, सामाजिक बदलाव भी है। लाखों लोग ऑटोमोबाइल सर्विसिंग, ईंधन आपूर्ति, इंजन पार्ट्स और पारंपरिक वाहन उद्योग से जुड़े हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों में इंजन की जटिलता कम होती है, रखरखाव की प्रकृति बदलती है और रोजगार का ढांचा भी बदल सकता है। इसलिए यह संक्रमण केवल पर्यावरण नीति नहीं, रोजगार और कौशल विकास की नीति भी है। भारत को इस बदलाव के लिए कार्यबल को तैयार करना होगा।
अध्ययन के अनुसार अगर दुनिया में इलेक्ट्रिक वाहनों का विस्तार इसी गति से जारी रहा तो 2030 के आसपास तेल की मांग अपने चरम पर पहुंच सकती है। भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए यह अवसर हो सकता है, लेकिन तेल निर्यातक देशों की वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजार में इससे अस्थिरता भी पैदा हो सकती है। इसलिए भारत को ऊर्जा सुरक्षा की नई रणनीति बनानी होगी।
असल प्रश्न यह है कि भारत इस बदलाव में क्या अग्रणी बनेगा। दुनिया के बड़े बाजारों ने संकेत दे दिए हैं कि भविष्य इलेक्ट्रिक परिवहन की दिशा में बढ़ रहा है। भारत के पास भी अवसर है कि वह इसे केवल पर्यावरणीय मजबूरी के रूप में न देखे, बल्कि आर्थिक, औद्योगिक और ऊर्जा सुरक्षा की रणनीति के रूप में अपनाएं।
(कुमार सिद्धार्थ पिछले चार दशक से पत्रकारिता और सामाजिक विकास के क्षेत्र में सक्रिय है। आप शिक्षा, पर्यावरण, सामाजिक आयामों पर देशभर के विभिन्न अखबारों में लिखते रहते हैं)