इलस्ट्रेशन: योगेन्द्र आनंद / सीएसई
ऊर्जा

टिप्पणी: बदलती ऊर्जा की दुनिया

क्या यूएई जीवाश्म ईंधन से दूरी बनाती दुनिया में तेल उत्पादक देशों के लिए अपना अस्तित्व बनाए रखने की एक मिसाल पेश करता है?

DTE Staff

यह एक अवसरवादी व्यावसायिक कदम न होकर एक रणनीतिक कदम है। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने 1 मई को ‘‘ऑर्गनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज’’ (ओपेक) की सदस्यता छोड़ दी है। 1960 में गठित ओपेक जिसके सदस्यों की संख्या अब 11 है, एक ऐसा उत्पादक (कार्टेल) संघ है जो आधुनिक दुनिया की एक अनिवार्य वस्तु (कमोडिटी) कच्चे तेल के उत्पादन और मूल्य निर्धारण को नियंत्रित करता है। यह वही कार्टेल है जिसने 1970 के दशक के तेल संकट को हवा दी थी, जिसके फलस्वरूप वैश्विक ऊर्जा नीति में बड़े फेरबदल हुए थे।

ओपेक अब दुनिया के कुल कच्चे तेल के उत्पादन का 30 प्रतिशत हिस्सा संभालता है। यह कोई संयोग नहीं है कि इसके चौथे सबसे बड़े तेल उत्पादक देश ने ऐसे समय में सदस्यता छोड़ दी जब दुनिया ईरान पर अमेरिका-इजरायल के युद्ध के कारण पैदा हुए एक और अभूतपूर्व तेल संकट की चपेट में है।

यूएई का यह अचानक लिया गया फैसला केवल 72 घंटे की नोटिस के साथ आया और तब से इस पर अटकलों का बाजार गर्म है। यूएई द्वारा आधिकारिक तौर पर दिया गया तर्क यह है कि वह “दीर्घकालिक रणनीतिक और आर्थिक दृष्टिकोण और उभरते ऊर्जा प्रोफाइल पर ध्यान केंद्रित करेगा, जिसमें घरेलू ऊर्जा उत्पादन में त्वरित निवेश शामिल है और वैश्विक ऊर्जा बाजारों में एक जिम्मेदार, विश्वसनीय और भविष्योन्मुखी भूमिका के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को मजबूत करेगा।” दूसरे शब्दों में कहें तो यूएई का लक्ष्य अपने तेल उत्पादन को बढ़ाना है और इसलिए उसने ओपेक के नियंत्रण से बाहर निकलने का फैसला किया है, जिसके तहत उत्पादन कोटा तय किया जाता है।

यूएई के लिए यह कोटा 34 लाख बैरल प्रति दिन था जिसे उसने अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध से पहले तक कायम रखा था। हाल के वर्षों में इसकी तेल उत्पादन क्षमता में वृद्धि हुई है जिसके 2027 तक 50 लाख बैरल तक पहुंचने का अनुमान है। यह विस्तार 150 अरब अमेरिकी डॉलर के निवेश कार्यक्रम के तहत किया गया है। अपने बाहर निकलने से पहले भी यूएई अपनी क्षमता में हुए विस्तार से मेल खाती उत्पादन कोटे में बढ़ोतरी की मांग करता आया है और इस मुद्दे पर ओपेक के सर्वाधिक प्रभावशाली देश सऊदी अरब के साथ उसका टकराव चल रहा था।

इस घटनाक्रम का एक दूसरा पहलू भी है। अरब ओपेक सदस्यों की बनिस्पत यूएई की अर्थव्यवस्था अधिक विविधतापूर्ण है और पिछले कुछ वर्षों में तेल पर इसकी निर्भरता कम हो रही है। हालांकि, यूएई के विविधीकरण को वित्तपोषित करने के लिए तेल से मिलने वाला राजस्व अभी भी महत्वपूर्ण है और वह जितना अधिक अपना ‘‘सरप्लस’’ तेल बेचेगा, कम-तेल-निर्भर अर्थव्यवस्था की ओर उसकी उतनी ही आसान होगी। इसके साथ ही ऊर्जा की दुनिया भी बदल रही है और इसका झुकाव निश्चित रूप से गैर-जीवाश्म ईंधन की ओर है। विकास और तेल के बीच का मजबूत संबंध अब कमजोर पड़ रहा है। उदाहरण के लिए चीन ने यह दिखाया है कि उसका गैर-जीवाश्म संक्रमण न केवल तेज है बल्कि इसका उसकी आर्थिक वृद्धि पर भी कोई प्रभाव नहीं पड़ा है।

दुनिया तेल आधारित अर्थव्यवस्था से आगे बढ़ रही है। इस प्रकार यूएई इस बात का एक केस स्टडी है कि कैसे एक प्रमुख तेल उत्पादक देश इस वैश्विक बदलाव के सामने खुद को विकसित कर रहा है। यह देश अपने विविधीकृत पोर्टफोलियो को बनाए रखने वाले फंड के लिए बस अपना तेल बेचने की जल्दी में है, जिसे अन्य देशों द्वारा अपनाए जाने की संभावना है। इसके अलावा यूएई स्वच्छ ऊर्जा में एक महत्वपूर्ण निवेशक है जो भविष्य में एक स्वच्छ ऊर्जा महाशक्ति के रूप में उसकी स्थिति को रेखांकित करता है। यूएई ने कहा है कि तेल, गैस, नवीकरणीय और न्यून कार्बन क्षेत्रों में उसका निवेश उसकी दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति के अनुसार जारी रहेगा। यदि अन्य देश इस रूपरेखा को अपनाते हैं तो ओपेक के साथ-साथ अन्य गैर-ओपेक तेल उत्पादक देशों को भी एक ऐसे बदलाव का अनुभव होगा जो पहले कभी नहीं हुआ।

यूएई की इस घोषणा के समय कोलंबिया के सांता मार्टा में “ट्रांजिशनिंग अवे फ्रॉम फॉसिल फ्यूल्स” पर पहला सम्मेलन चल रहा था। कोयला, तेल और गैस का प्रयोग खत्म करने के व्यावहारिक तरीकों पर चर्चा करने के लिए लगभग 57 देश एकत्र हुए थे। प्रतिभागियों ने यूएई के इस फैसले पर सतर्क प्रतिक्रियाएं दीं। जहां कुछ ने तेल के बढ़ते उत्पादन का हवाला देते हुए इसे जलवायु के लिए एक खतरे के रूप में देखा तो वहीं अन्य लोगों ने इसे तेल और गैस आधारित अर्थव्यवस्था से बाहर निकलने की यूएई की अपनी योजना माना, जिससे उन्हें यह संकेत मिला कि जीवाश्म मुक्त भविष्य जिसके सपने संजोए जा रहे थे, वह अब और करीब आ रहा है। दो दशकों से अधिक समय तक सऊदी अरब के तेल मंत्री और ओपेक के पूर्व मंत्री रहे शेख यमानी ने एक बार कहा था, “पाषाण युग इसलिए समाप्त नहीं हुआ था कि दुनिया में पत्थर खत्म हो गए थे। इसी तरह तेल का युग इसलिए समाप्त नहीं होगा कि दुनिया में तेल खत्म हो जाएगा।” लेकिन ऐसे युग के बारे में क्या, जहां दुनिया खुद ही तेल से दूर रहने का फैसला कर ले ?

यह टिप्पणी डाउन टू अर्थ, हिंदी मासिक पत्रिका के जुलाई 2026 अंक में प्रकाशित हुई है