केंद्रीय नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) एक बार फिर लघु जलविद्युत (स्माल हाइड्रोपावर) योजना को वापस लाने की प्रक्रिया में है। इस योजना को आगामी केंद्रीय बजट 2026 में नए सिरे से आवंटन मिलने की संभावना है। इस घटनाक्रम से जुड़े दो अधिकारियों ने इसकी जानकारी दी है।
भारत में एक विशेष लघु जलविद्युत नीति नवंबर 2009 में शुरू की गई थी। इस नीति को जुलाई 2014 में संशोधित किया गया, जिसमें परियोजनाओं के लिए केंद्रीय वित्तीय सहायता (सीएफए) का प्रावधान किया गया। इसका उद्देश्य प्रोत्साहनों के जरिए निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देना था। हालांकि, यह योजना वर्ष 2017 में बंद कर दी गई।
इस योजना को बंद किए जाने के पीछे कई कारण बताए गए, जिनमें बजटीय सीमाएं, परियोजनाओं में भारी देरी और सरकार की प्राथमिकताओं का सौर एवं पवन ऊर्जा जैसी सस्ती और अपेक्षाकृत सरल परियोजनाओं की ओर स्थानांतरण शामिल था।
फिलहाल नई लघु जलविद्युत परियोजनाओं को समर्थन देने के लिए कोई केंद्रीय योजना मौजूद नहीं है। आधिकारिक मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार, जल संसाधन राज्य का विषय होने के कारण इन परियोजनाओं का आवंटन राज्य की नीतियों के तहत किया जाता है।
प्रस्तावित कार्यक्रम के तहत पहाड़ी और सीमावर्ती क्षेत्रों में लघु जलविद्युत (एसएचपी) परियोजनाओं को पुनर्जीवित करने के लिए एक नई केंद्रीय नीति लाई जा सकती है। सूत्रों के मुताबिक, आने वाले वर्षों में इसका लक्ष्य लगभग 1.5 गीगावाट (जीडब्ल्यू) क्षमता जोड़ने का है और अगले एक दशक में भारत की स्थापित लघु जलविद्युत क्षमता को दोगुना कर 10 गीगावाट तक पहुंचाने की योजना है।
अधिकारियों के अनुसार, इस प्रस्ताव को व्यय वित्त समिति (एक्सपेंडिचर फाइनेंस कमेटी) की मंजूरी मिल चुकी है। हालांकि, इसे अभी कैबिनेट सहित अन्य आवश्यक स्वीकृतियों का इंतजार है। इसके बाद ही यह आगामी बजट में विचार के योग्य हो सकेगा।
इन अधिकारियों में से एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने पिछले महीने डाउन टू अर्थ से कहा, “यह एक ऐसी योजना है जिसे पहले बंद कर दिया गया था, लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। अब दूरदराज और सीमावर्ती इलाकों में क्षेत्र-विशेष समाधान और भरोसेमंद नवीकरणीय ऊर्जा पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है।”
भारत में लघु जलविद्युत परियोजनाओं को आमतौर पर 25 मेगावाट तक की स्थापित क्षमता वाली परियोजनाओं के रूप में परिभाषित किया जाता है। ये प्रायः ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ प्रणाली पर आधारित होती हैं, जिनमें बड़े बांध या जलाशयों की जरूरत नहीं होती। नदियों और धाराओं के प्राकृतिक प्रवाह का उपयोग करने के कारण इनका पर्यावरणीय प्रभाव अपेक्षाकृत कम होता है और ये पहाड़ी व पर्वतीय क्षेत्रों के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं, जहां जल प्रवणता अधिक होती है।
एक अधिकारी ने बताया कि इस योजना के पुनरुद्धार में लगभग 2,500 करोड़ रुपये की व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (वीजीएफ) की जरूरत पड़ सकती है। इसके तहत परियोजना लागत का 25 से 30 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता दी जाएगी। प्रत्येक मेगावाट की लागत 10 से 12 करोड़ रुपये के बीच आंकी गई है। पहाड़ी राज्यों, पूर्वोत्तर राज्यों और सीमावर्ती जिलों में स्थित परियोजनाओं के लिए अधिक वीजीएफ सहायता का प्रावधान किया जाएगा। अधिकारी ने कहा, “इसका मकसद कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले इलाकों में परियोजनाओं को व्यावहारिक बनाना है, जहां लागत अधिक होती है और निजी निवेशक आमतौर पर हिचकिचाते हैं।”
इस योजना का फोकस अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, लद्दाख और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों जैसे क्षेत्रों पर रहने की संभावना है। अधिकारियों के अनुसार, सौर ऊर्जा की तुलना में लघु जलविद्युत अपेक्षाकृत अधिक स्थिर बिजली उत्पादन प्रदान करती है। इन परियोजनाओं का प्लांट लोड फैक्टर औसतन 35–40 प्रतिशत रहता है और अनुकूल स्थानों पर यह 60 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। एक अधिकारी ने कहा, “यह भरोसेमंद उत्पादन खास तौर पर उन इलाकों में महत्वपूर्ण है, जहां ग्रिड कनेक्टिविटी कमजोर है।”
हालांकि, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि लघु जलविद्युत लंबे समय से संरचनात्मक बाधाओं का सामना करती रही है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की नवीकरणीय ऊर्जा इकाई के कार्यक्रम अधिकारी अरविंद पोसवाल ने कहा, “लंबे निर्माण काल, पर्यावरणीय मंजूरियों और जल उपलब्धता से जुड़ी समस्याओं के कारण बड़े जलविद्युत प्रोजेक्ट्स में भी सीमित बढ़ोतरी हो पाई है और इनमें से कई चुनौतियां लघु जलविद्युत पर भी लागू होती हैं।”
पोसवाल के अनुसार, जल प्रवाह में मौसमी बदलाव और पानी के मोड़ (डायवर्जन) से जुड़े मुद्दे परियोजनाओं की समयसीमा और लागत दोनों को काफी बढ़ा देते हैं। इससे सौर और पवन ऊर्जा जैसी तेज और सस्ती परियोजनाओं की तुलना में लघु जलविद्युत को उचित ठहराना मुश्किल हो जाता है।
उन्होंने कहा कि समय से जुड़ी लागतें अक्सर अन्य नवीकरणीय स्रोतों की तुलना में लघु जलविद्युत की आर्थिक व्यवहार्यता को कमजोर कर देती हैं।
पोसवाल ने यह भी रेखांकित किया कि लघु जलविद्युत के कुछ रणनीतिक फायदे जरूर हैं, लेकिन इसकी भूमिका स्वभावतः सीमित है। उन्होंने कहा, “लघु जलविद्युत से कुछ अतिरिक्त लाभ मिल सकते हैं, जैसे पम्प्ड स्टोरेज परियोजनाओं में संभावित उपयोग, लेकिन यह भारत के ऊर्जा लक्ष्यों को उसी तरह आगे नहीं बढ़ा सकती, जैसा सौर और पवन ऊर्जा कर रही हैं। इसका योगदान सहायक और दीर्घकालिक ही रहेगा।”
राष्ट्रीय योजना दस्तावेजों में भी यह स्थिति दिखाई देती है। 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012–2017) के तहत एमएनआरई ने 7,000 मेगावाट लघु जलविद्युत क्षमता का लक्ष्य रखा था, लेकिन प्रगति धीमी रही। मार्च 2014 तक कुल स्थापित क्षमता 3,803.68 मेगावाट थी और योजना के पहले दो वर्षों में केवल 408 मेगावाट ही जोड़ी जा सकी।
हालांकि 2014–15 के लिए वार्षिक लक्ष्य मोटे तौर पर हासिल कर लिया गया था, लेकिन कुल मिलाकर अपेक्षाओं के मुकाबले यह योजना कम लक्ष्य हासिल कर पाई। उस समय चिन्हित संभावित क्षमता का केवल लगभग 19 प्रतिशत ही उपयोग हो पाया था। यह संभावित क्षमता करीब 6,474 स्थलों पर लगभग 19,749 मेगावाट आंकी गई थी, जिसे बाद में 21 गीगावाट से अधिक के रूप में पुनर्मूल्यांकित किया गया। संभावित क्षमता और वास्तविक हासिल के बीच यह अंतर आज भी बना हुआ है।
वर्तमान में भारत की स्थापित लघु जलविद्युत क्षमता लगभग 5 गीगावाट है, जो कुल स्थापित बिजली क्षमता का लगभग 1-1.5 प्रतिशत है। बिजली उत्पादन में इसका योगदान और भी कम है। कुल वार्षिक उत्पादन का करीब 1 प्रतिशत या उससे भी कम। इसका कारण इन परियोजनाओं का बिखरा हुआ स्वरूप और मौसमी नदियों के प्रवाह पर निर्भरता है। राष्ट्रीय स्तर पर सीमित भूमिका के बावजूद, दूरदराज और पहाड़ी क्षेत्रों में विकेंद्रीकृत बिजली आपूर्ति के लिए लघु जलविद्युत अब भी एक विशिष्ट भूमिका निभा रही है।
नीति को फिर से आगे बढ़ाने का एक कारण पम्प्ड स्टोरेज परियोजनाओं की बढ़ती प्रासंगिकता भी है। महाराष्ट्र और ओडिशा जैसे राज्यों में लघु जलविद्युत स्थलों को पम्प्ड स्टोरेज के साथ एकीकृत करने के संभावित विकल्प के रूप में देखा जा रहा है, खासकर वहां जहां पहले से जलाशय, सिंचाई बांध या उपयुक्त ऊंचाई का अंतर मौजूद है। ऐसी व्यवस्थाओं में अतिरिक्त सौर और पवन ऊर्जा का उपयोग ऑफ-पीक समय में पानी को ऊपर पम्प करने के लिए किया जा सकता है और पीक मांग के समय उसे छोड़कर बिजली बनाई जा सकती है। इससे बड़े नए बांध बनाए बिना ग्रिड की क्षमता बढ़ाई जा सकती है।
पोसवाल ने कहा, “आज लघु जलविद्युत की प्रासंगिकता बड़े पैमाने पर उत्पादन से ज्यादा सिस्टम सपोर्ट में है। पहाड़ी इलाकों में सौर और पवन ऊर्जा की तैनाती भी महंगी और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण होती है, इसलिए वहां जलविद्युत को अब भी एक व्यवहारिक स्थानीय विकल्प माना जाता है।”
इस पुनरुद्धार के पीछे राज्यों का भी मजबूत दबाव है। उत्तराखंड जैसे राज्य जलविद्युत को एक स्थानीय संसाधन के रूप में देखते हैं, जो केवल बिजली ही नहीं बल्कि रोजगार और बुनियादी ढांचे के विकास जैसे आर्थिक सह-लाभ भी दे सकता है। परियोजनाओं के पाइपलाइन में होने में राज्यों की गहरी भागीदारी है, जबकि केंद्र स्तर पर एमएनआरई लघु जलविद्युत कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहा है।
हाल के केंद्रीय बजटों में एमएनआरई का आवंटन मुख्य रूप से सौर और पवन ऊर्जा की ओर झुका रहा है। पीएम-कुसुम, ग्रिड से जुड़े सौर पार्क, रूफटॉप सोलर और ट्रांसमिशन अवसंरचना जैसी प्रमुख योजनाओं पर अधिकांश खर्च हुआ है। इसके मुकाबले, लघु जलविद्युत को 2017 के बाद से सीमित बजटीय समर्थन ही मिला है। एक अन्य अधिकारी ने कहा, “यह असंतुलन को ठीक करने की कोशिश है। हर क्षेत्र को बड़े सौर या पवन प्रोजेक्ट्स से प्रभावी ढंग से नहीं जोड़ा जा सकता।”
एमएनआरई ने यह भी संकेत दिया है कि कुछ क्षमता जल्दी ऑनलाइन आ सकती है। पहले चिन्हित की गई 13 लघु जलविद्युत परियोजनाओं में से 11 पूरी हो चुकी हैं और योजना को औपचारिक मंजूरी मिलते ही लंबित सब्सिडी जारी की जा सकती है। एक अधिकारी ने कहा, “ऐसी ‘लो-हैंगिंग’ क्षमता मौजूद है, जिसे योजना अधिसूचित होते ही सक्रिय किया जा सकता है।”