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ऊर्जा

संतुलित शीतलन, सुदृढ़ ग्रिड: भारत की संकटग्रस्त विद्युत प्रणाली के लिए सुधार का मार्ग

भारत की शीतलन मांग (कूलिंग डिमांड) में तेजी से उछाल देखा जा रहा है, और वर्ष 2050 तक इसके पंद्रह गुना तक बढ़ जाने की संभावना है

Sarada Prasana Das, Anna Agarwal, Shubhranshu Suman

भारत की ऊर्जा चुनौती तेज गति से एक 'कूलिंग' चुनौती बनती  जा रही है। पिछले कुछ समय से ग्रीष्मकाल में तेज गर्मी के कारण एयर कंडीशनिंग (एसी) एवं अन्य शीतलन सेवाओं के लिए बिजली की मांग में अप्रत्याशित तेजी देखी जा रही है, जो पावर ग्रिड को गंभीर तनाव की स्थिति में धकेल रही है। 21 मई 2026 को देश की 'पीक डिमांड' ने केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण द्वारा वर्ष 2026 के लिए अनुमानित 270 गीगावॉट के पूर्वानुमानित आंकड़े को पार कर लिया, जिसके चलते देश के कई  हिस्सों को विद्युत कटौती देखने को मिली। विभिन्न प्रामाणिक अध्ययनों से यह साबित होता है कि भारत के महानगरों में ग्रीष्मकालीन 'पीक लोड' का 40 से 60 फीसदी हिस्सा अकेले एसी के कारण पैदा होता है।

पीक डिमांड में आ रही इस निरंतर वृद्धि ने हमारी बिजली प्रणाली (पावर सिस्टम) की ढांचागत कमजोरियों को उजागर किया; जैसा कि निरंतर बिजली कटौती, उपकरणों की खराबी, ब्लैकआउट, तथा ट्रांसफार्मरों के जलने की घटनाओं से हमें ज्ञात होता है। इसी संकट के आलोक में ओडिशा में 'आवश्यक सेवा (रखरखाव) अधिनियम' को लागू किया गया, जो निर्बाध विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए बिजली प्रतिष्ठानों में हड़तालों पर प्रतिबंध लगाता है। प्रकृति के व्यवधान और ये प्रशासनिक हस्तक्षेप यह रेखांकित करते हैं कि भारत के ऊर्जा संक्रमण (एनर्जी ट्रांजीशन) की चुनौती अब मात्र नवीकरणीय ऊर्जा की क्षमता संवर्धन तक सीमित नहीं रह गई है| यह बढ़ती मांग को न्यायसंगत ढंग से पूरा करने में सक्षम एक सुदृढ़ विद्युत प्रणाली के निर्माण का विषय भी है।

तनावग्रस्त पावर नेटवर्क

अत्यधिक तेज गर्मी केवल बिजली की मांग को ही नहीं बढ़ाती, बल्कि उस मांग को पूरा करने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे को भी कमजोर करती है। ओवरलोडिंग एवं दोषपूर्ण रखरखाव जैसे कारणों के चलते भारत में प्रतिवर्ष लगभग 13 लाख डिस्ट्रीब्यूशन ट्रांसफार्मर समय से पूर्व खराब हो जाते हैं। इस भीषण हीटवेव का प्रतिकूल प्रभाव हमारे ट्रांसमिशन ढांचे पर भी पड़ता है, क्योंकि बढ़ते वायुमंडलीय तापमान के कारण ओवरहेड (उपरिगामी) लाइनें शिथिल होकर लटक जाती हैं और ट्रिपिंग का शिकार हो जाती हैं। इन कारणों के संयुक्त प्रभावस्वरूप ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन हानियों में भारी वृद्धि होती है और देश में बिजली की कमी का संकट गहरा जाता है।

भारत की शीतलन मांग (कूलिंग डिमांड) में तेजी से उछाल देखा जा रहा है, और वर्ष 2050 तक इसके पंद्रह गुना तक बढ़ जाने की संभावना है। इस तीव्र वृद्धि के मूल में बढ़ती हुई घरेलू आय, लगातार बढ़ता शहरीकरण और बार-बार आने वाली विनाशकारी हीटवेव हैं, जिनके कारण एसी के उपयोग में अभूतपूर्व वृद्धि देखी जा रही है। 'इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान' (आईसीएपी) के प्राक्कलन के अनुसार, वर्ष 2038 तक आवासीय एसी का स्वामित्व 8% पैठ दर से पांच गुना बढ़कर 40% हो जाएगा। यह तीव्र उछाल एक सुदृढ़ पावर ग्रिड के लिए चिंताजनक है, जो बार-बार विद्युत कटौती के माध्यम से आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की समस्याओं को बढ़ा सकता है।

विद्युत प्रणाली की विफलताएँ अत्यधिक तापमान से प्रभावित संवेदनशील और वंचित आबादी पर सबसे अधिक असर डालती हैं| अनेक निम्न-आय वाले परिवार अपनी शीतलन आवश्यकताओं के लिए पंखों पर निर्भर हैं और वे अत्यधिक गर्मी वाले व्यवसायों में काम करते हैं। वे घनी और अनौपचारिक बस्तियों में रहते हैं, जहां न्यूनतम ग्रीन कवर इन आवासों को 'हीट ट्रैप' (ऊष्मा जाल) में बदल देते हैं। अत्यधिक गर्म दिनों में यह 'हीट स्ट्रेस' (ताप जनित तनाव) और अधिक घातक हो जाता है, जब संपन्न इलाकों में एसी के लगातार उपयोग से बिजली की मांग अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच जाती है। इसके परिणामस्वरूप, अक्सर निम्न-आय वाले इलाकों को सबसे पहले बिजली कटौती झेलनी पड़ती है, जो समाज में ऊर्जा असमानता को बढ़ा देता है।

पीक डिमांड का प्रबंधन स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के राष्ट्रीय प्रयासों के साथ अपरिहार्य रूप से जुड़ता जा रहा है। नवीकरणीय ऊर्जा के तेज विस्तार के कारण हमने दिन की पीक डिमांड के दौरान बिजली की उपलब्धता में एनर्जी ट्रांजीशन उल्लेखनीय सुधार किया है। वर्तमान में नवीकरणीय ऊर्जा दिन के समय की इस चरम मांग का लगभग एक-तिहाई हिस्सा पूरा कर रही है। लेकिन, शाम और रात  की पीक डिमांड का कुशल प्रबंधन आज भी हमारे नीति-नियंताओं के समक्ष एक चुनौती बना हुआ है।

बढ़ते हीट स्ट्रेस ने पारंपरिक डिमांड पूर्वानुमान की अपर्याप्तता को उजागर किया है। इसके फलस्वरूप, बिजली वितरण कंपनियों को तात्कालिक पीक डिमांड की पूर्ति हेतु 'स्पॉट मार्केट' से ऊँची दरों पर बिजली खरीदने के लिए विवश होना पड़ता है। यह विवशता उनकी पहले से ही नाज़ुक वित्तीय स्थिति पर और दबाव डाल रही है।

आपूर्ति विस्तार से परे: सुदृढ़ बुनियादी ढांचे का निर्माण

बढ़ता हीट स्ट्रेस मात्र एक आपदा नहीं है; बल्कि यह पीक डिमांड, न्यायसंगत ऊर्जा संक्रमण, और लचीले बुनियादी ढांचे बनाने का अवसर भी है। केवल अल्पकालिक आपूर्ति संवर्धन के माध्यम से प्रतिक्रिया व्यक्त करने के स्थान पर यह उभरती हुई चुनौती एक ऐसे व्यापक दृष्टिकोण की मांग करती है जो तकनीकी नवाचार, नीतिगत सुधार, और सामाजिक रूप से समावेशी अनुकूलन (अडॉप्टेशन) रणनीतियों का जोड़ती हो।

तकनीकी स्तर पर हमें केवल ऊर्जा उत्पादन क्षमता बढ़ाने की संकीर्ण मानसिकता से आगे निकलना होगा। ऊर्जा-कुशल शीतलन प्रौद्योगिकियों में गुणात्मक सुधार करना, उपकरणों के दक्षता मानकों को और कड़ा करना, तथा पैसिव कूलिंग (कृत्रिम ऊर्जा के बिना भवन को ठंडा रखने की पद्धति) को बढ़ावा देना पीक डिमांड को नियंत्रित कर सकता है। चूँकि भारत के भविष्य के शहरी आवासों का एक बहुत बड़ा हिस्सा अभी निर्मित होना बाकी है, इसलिए 'जलवायु-अनुकूल भवन डिजाइन' पर अनिवार्य रूप से बल देना चाहिए। ये उपाय शहरी क्षेत्रों में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं जहां घने निर्मित वातावरण गर्मी को ज्यादा वक़्त रोके रखते हैं| यह ‘शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव’ हीट स्ट्रेस को कई गुना बढ़ा देते है। शाम और रात की पीक डिमांड को प्रबंधित करने में 'बैटरी स्टोरेज' प्रणालियों से युक्त सोलर रूफटॉप सहायक सिद्ध हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त, 'डिमांड साइड मैनेजमेंट' (डीसीएम) जैसी तकनीकों पर विशेष बल देने से पीक ऑवर्स के दौरान ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क पर पड़ने वाले दबाव को न्यूनतम किया जा सकता है| इससे विद्युत आपूर्ति की विश्वसनीयता और सुदृढ़ता में वृद्धि होगी।

नीतिगत स्तर पर बढ़ता हुआ हीट स्ट्रेस एक 'क्लाइमेट-रेसिलिएंट' पावर सिस्टम की तात्कालिक आवश्यकता को रेखांकित करता है। हीटवेव, निरंतर बढ़ती शीतलन मांग और पीक लोड के इस उतार-चढ़ाव को अब दीर्घकालिक विद्युत नियोजन, शहरी शासन संरचना, और अनुकूलन नीतियों के मूल ढांचे में अनिवार्य रूप से अंतर्निहित किया जाना चाहिए। इसके लिए 'टाइम-ऑफ-डे टैरिफ' (दिन के समय के अनुसार भिन्न दरें), स्मार्ट मीटरिंग, और ऊर्जा भंडारण (स्टोरेज) से संबंधित प्रोत्साहनों को नीतिगत स्तर पर सुदृढ़ करना होगा। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि ग्रिड की समग्र सुदृढ़ता को सुनिश्चित करने के लिए ऊर्जा संक्रमण की पुनर्कल्पना की जाए।

समान और सर्वसुलभ शीतलन

सामाजिक स्तर पर, शीतलन की बढ़ती मांग सामाजिक न्याय, समता, और ऊर्जा तक समान पहुंच पर गहरे नैतिक और व्यावहारिक प्रश्न खड़े करती है। जनवायु परिवर्तन के इस दौर में शीतलन कोई विलासिता (लक्ज़री) नहीं, बल्कि जीवित रहने और जीविका निर्वहनहेतु एक मूलभूत आवश्यकता बनती जा रही है। इसके बावजूद, विद्युत प्रणालियों का यह दुर्बल बुनियादी ढांचा सबसे अधिक निम्न-आय वाले परिवारों को प्रताड़ित करता है, जिनकी किफायती शीतलन विकल्पों तक पहुंच अत्यंत सीमित है। अतः समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के लिए भी किफायती और विश्वसनीय 'थर्मल कम्फर्ट' (तापमान अनुकूलता) सुनिश्चित करने हेतु सामाजिक रूप से समावेशी दृष्टिकोणों की महती आवश्यकता है| के दृष्टिकोण ऊर्जा पहुंच, आवास डिजाइन, सार्वजनिक बुनियादी ढांचे, और विकेंद्रीकृत ऊर्जा प्रणालियों को एक सूत्र में पिरोते हैं।

हीटवेव अब भारत की बिजली प्रणाली के मार्ग में आने वाली कोई अस्थायी बाधा मात्र नहीं हैं; बल्कि ये इसके दैनिक परिचालन को परिभाषित करने वाली एक स्थायी शर्त बन चुकी हैं। देश के सम्मुख चुनौती अब केवल बढ़ती हुई बिजली मांग के साथ कदमताल मिलाने तक सीमित नहीं है| यह एक ऐसी बिजली प्रणाली का निर्माण करने की है जो पूर्णतः विश्वसनीय, जलवायु-अनुकूल, सामाजिक रूप से न्यायसंगत, और भारत के दीर्घकालिक ऊर्जा संक्रमण के लक्ष्यों को संबल प्रदान करने में पूर्णतः समर्थ हो।

(सारदा, ऐना, तथा शुभ्रांशु नई दिल्ली स्थित सस्टेनेबल फ्यूचर्स कॉलाबोरिटिव में शोधकर्ता  के तौर पर कार्यरत हैं)