अब्दुल्लापुर की एक घरेलू इकाई में शटलकॉक बना रहे कारीगर। फोटो: वर्षा सिंह 
ऊर्जा

बदलती जलवायु और वैश्विक कारोबार के बीच मेरठ के खेल उद्योग की ‘जस्ट ट्रांजिशन’ की राह

मेरठ का खेल उद्योग असंगठित खेल इकाइयों, पर्यावरणीय चुनौतियों और आधुनिकीकरण की आकांक्षाओं के बीच बदलाव का इंतजार कर रहा है। कारीगर कठिन और असुरक्षित परिस्थितियों में काम करने को मजबूर हैं। वैश्विक मानकों और प्रतिस्पर्धा में टिके रहने के लिए इस उद्योग को आधुनिक तकनीक और पर्यावरण के अनुकूल तरीकों को अपनाना जरूरी है। इस 'ट्रांजिशन' को सफल बनाने के लिए छोटे उद्यमियों को सरकारी सहायता, प्रशिक्षण के साथ बेहतर नीतिगत बदलावों की तत्काल आवश्यकता है।

Varsha Singh

मेरठ का अब्दुल्लापुर गांव खेल का साजोसामान बनाने के लिए मशहूर है। यहां घर-घर में बैडमिंटन की बुनाई, शटलकॉक, फुटबॉल और क्रिकेट बॉल जैसे खेल के सामान तैयार करने का काम होता है। गांव की तंग गलियों के भीतर ऐसे ही एक घर के दरवाजे पर बत्तख के कुछ पंख बिखरे हुए मिले। घर के भीतर कुछ कारीगर मोबाइल फोन पर तेज बजते गाने के बीच अपने-अपने काम में रमे हैं।

तीन कमरों के इस मकान का सबसे भीतरी कमरा पंखों की दुर्गंध से भरा है। यहां मटमैले पंखों के ढेर के बीच बैठा एक कारीगर इनकी छंटाई कर रहा है। इस्तेमाल करने योग्य पंख अलग जमा हैं।

दूसरे कमरे में दो कारीगर एक छोटी मशीन पर पंखों को बराबर आकार दे रहे है। ये पूरी तरह सफेद पंख हैं। इन्हें केमिकल से ब्लीच किया गया और फिर मशीनों में सुखाया गया।

तीसरे कमरे में पांच कारीगर इन पंखों को शटलकॉक की कॉर्क के छेदों में एक-एक कर फिट कर रहे हैं।

चालीस वर्षीय मोहम्मद सोनू पिछले 20-25 वर्षों से यही काम कर रहे हैं। “पंखों को धोना, सुखाना, कटिंग,सारे काम शामिल होते हैं। एक दर्जन शटलकॉक बनाने के 21 रुपए मिलते हैं। रोजाना कम से कम 20 दर्जन शटलकॉक बनाने पर तकरीबन 400 रुपए मिल पाते हैं।”

अब्दुल्लापुर में सोनू जैसे कारीगरों से जॉब वर्क पर बैडमिंटन रैकेट और शटलकॉक बनाने वाली ये एक जानी-मानी खेल कंपनी है, जो  थोक व्यापार करती है। इस ब्रांड की शटलकॉक एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर लगभग 28  रुपए  की दर से बिक रही हैं। सोनू को एक पीस बनाने पर करीब 1.75 रुपए मिलते हैं।  उसकी मजदूरी से करीब 16 गुना अधिक कीमत पर।

मई की गर्मी में पसीने से तर-बतर सोनू कहते हैं, “समय के साथ हमारे इस काम में कोई बदलाव नहीं आया। महंगाई बहुत बढ़ गई, लेकिन मज़दूरी वहीं की वहीं रह गई।” पत्नी के निधन के बाद वह अपनी एक बेटी की परवरिश अकेले कर रहे हैं।

घर से चल रही इस यूनिट में रोजाना कम से कम 2,000 शटलकॉक तैयार होती हैं। जो डीलर को सप्लाई कर दी जाती हैं। 

मेरठ का खेल उद्योग कारीगरों, खेल का सामान बनाने वाली सैंकड़ों छोटी-बड़ी इकाइयों और निर्यातकों के नेटवर्क पर टिका है। मेरठ के जिला उद्योग एवं उद्यम प्रोत्साहन केंद्र में सहायक आयुक्त दिनेश आर्य  जिले के कुछ बड़े खेल ब्रांड का उदाहरण देते हैं, "वे अपने ब्रांड के डिजाइन और वज़न जैसे मानकों की जानकारी छोटी इकाइयों को देते हैं। इस आधार पर वे उन्हें तैयार करती हैं। गुणवत्ता जांच कर उन पर ब्रांड का लोगो लगाया जाता है।”

वह कहते हैं, “क्लस्टर के तौर पर काम कर रहा ये उद्योग बेहद अव्यवस्थित और असंगठित है। खेल इकाइयां पुश्तैनी तरीके से काम कर रही हैं, जैसे इनके दादा-परदादा किया करते थे। तकनीक का इस्तेमाल और जानकारी नहीं है।"

देश में खेल सामाग्री सप्लाई करने वाली एक कंपनी में शटलकॉक पर स्टिकर लगाकर पैकिंग करती कारीगर।  फोटो : फोटो: वर्षा सिंह

अब्दुल्लापुर में तैयार खेल का सामान पैकेजिंग और ब्रांडिंग के बाद व्यापारियों और सप्लाई नेटवर्क के ज़रिये देश-विदेश के बाजारों तक पहुंचता है।

वैश्विक बाज़ार में खेल सामाग्री को गुणवत्ता के आधार पर तो परखा जाता है, इसके साथ ही, उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली ऊर्जा, कचरा प्रबंधन और श्रमिकों की कामकाजी स्थितियां भी देखी जाती हैं। इसकी तुलना में घरेलू बाज़ार में ऐसे मानकों का दबाव अभी नहीं है। विशेषज्ञों के मुताबिक वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए मेरठ के खेल उद्योग को बदलना होगा। 

मेरठ देश के सबसे बड़े खेल सामग्री क्लस्टरों में से एक है और उत्तर प्रदेश की ‘एक जिला, एक उत्पाद’ (ओडीओपी) योजना के तहत इसकी पहचान खेल सामग्री के लिए है। इस क्लस्टर से 3 लाख से अधिक कारीगर, महिला श्रमिक और छोटे उद्यमी जुड़े हैं। जो  क्रिकेट बैट, बॉल, ग्लब्ज, क्रिकेट पैड्स, टेनिस बॉल, फुटबॉल, शटलकॉक, रैकेट, कैरम, टेबल टेनिस, फिजिकल फिटनेस और जिम इक्यूपमेंट, एथलेटिक्स जैसे खेल उत्पाद बनाती हैं। 

वायु प्रदूषण के चलते ही दिसंबर-2025 में भारत की खेल नगरी ने प्रतिष्ठित राष्ट्रीय फुटबॉल चैंपियनशिप संतोष ट्रॉफी के मैचों की मेज़बानी का पहला अवसर गंवा दिया था। जब उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में 31 दिसंबर तक सभी खेल गतिविधियों पर रोक लगा दी थी।

जस्ट ट्रांजिशन यानी बदलाव की इस प्रक्रिया को न्यायपूर्ण बनाने की शुरुआत अब्दुल्लापुर जैसे गांवों में चल रही खेल इकाइयों से करनी होगी। जो मेरठ के खेल उद्योग की एक तस्वीर दिखाती है।

क्रिकेट बैट बना रहे कारीगर लकड़ी की धूल के बीच बिना किसी सुरक्षा उपाय के काम करते हुए। फोटो: वर्षा सिंह
अपनी उंगलियों से कैरम के फ्रेम पर पॉलिश चढ़ाता युवा कारीगर। फोटो: वर्षा सिंह

अब्दुल्लापुर की खेल फैक्टरी

बाहर से छोटी दिखने वाली एक स्पोर्ट्स फैक्टरी के भीतर प्रवेश करते ही एक अलग दुनिया खुल जाती है। 

टिन शेड से ढके ज्यादातर हिस्से में दिन में भी बल्ब की रोशनी जरूरी है। मई की 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक गर्मी और मशीनों के शोर के बीच दो दर्जन से अधिक लोग खेल सामग्री बनाने में जुटे हैं। यहाँ क्रिकेट बैट, कैरम बोर्ड और टेनिस बॉल बनाई जाती हैं।

मशीन पर घिसकर क्रिकेट बैट तैयार कर रहे रहे कारीगरों के कपड़े, चेहरे और सांसों तक लकड़ी की धूल पहुंच रही हैं। कैरम बोर्ड की फ्रेम पर उंगलियों से किशोर काली पॉलिश चढ़ा रहे दो किशोरों के चेहरे, कपड़े, और दीवारों पर भी, ये पॉलिश चढ़ी है।

यहां सबसे अधिक कारीगर टेनिस बॉल बनाने का काम कर रहे हैं। रबर की कटाई, घिसाई और जोड़ाई मशीनों से होती है। जबकि इन पर कपड़ा चढ़ाने, सिलाई और अंतिम रूप देने में हाथों का हुनर है।

टेनिस कोर्ट में जिस गेंद पर खिलाड़ियों और दर्शकों की निगाहें टिकी रहती हैं, उसे बनाने वाले इन कारीगरों के लिए उसे करीब से देखना अपनी आँखों को जोखिम में डालना है। 

टेनिस बॉल के लिए रबर की कटोरियों को मशीन पर घिस कर साफ़ करती रोशन और उनकी साथी तरन्नुम। 

फैक्टरी के अंतिम छोर पर एक महिला श्रमिक रोशन जहां मशीन पर घिसकर रबर की कटोरियों को साफ़ कर रही हैं। घिसाई के दौरान इसकी काली धूल बौछार की तरह चेहरे पर पड़ती है। इससे बचने के लिए उन्होंने आँखों के अलावा पूरा चेहरा दुपट्टे से ढका है।

खेतों में मजदूरी करने वाली रोशन फैक्टरी में मिलने वाले तय वेतन से ज्यादा संतुष्ट हैं। वह कहती हैं, “मुझे यहां काम करते हुए 6-7 साल हो चुके हैं। महीने के सात हज़ार रुपये मिलते हैं। हम मेहनत करेंगे तभी खाएँगे।” 

उनके साथ काम कर रही तरन्नुम जहां ने आंख, नाक और कान समेत पूरा चेहरा ही दुपट्टे से लपेटा हुआ है।  

प्रदूषण और गर्मी के इन हालात में श्रमिक 7-8 घंटे बंद घरों और फैक्ट्रियों में एक पंखे के सहारे काम करते हैं। मेरठ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के सबसे प्रदूषित शहरों में शुमार होता है। उत्तर प्रदेश आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार बढ़ते तापमान के चलते मेरठ हीटवेव जोखिम के लिहाज से ‘हाई रिस्क’ यानी अत्यधिक संवेदनशील श्रेणी मे आता है।

तीस वर्षों से अधिक समय से फैक्टरी चला रहे पूर्व पार्षद नदीम मेवाती कहते हैं, “इस पारंपरिक कारोबार को बेहतर बनाने के लिए सरकार की तरफ़ से कभी कोई विशेष प्रशिक्षण, तकनीक से जुड़ी जानकारी नहीं मिली। सुरक्षा के लिए ध्यान से काम करना पर्याप्त है”।

मेरठ शहर से अब्दुल्लापुर गांव की ओर जाती सड़क के दोनों किनारों पर सामान्य कचरे के साथ खेल सामाग्री के जले-अधजले कचरे के ढेर मिले।

पर्यावरण पर असर?

नदीम समेत खेल उद्योग से जुड़े ज्यादातर लोग और मेरठ प्रशासन के मुताबिक इस उद्यम में पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचता। 

जबकि अब्दुल्लापुर गांव से मेरठ शहर की ओर जाती सड़क के दोनों किनारे करीब दो-तीन किलोमीटर तक फोम, टेनिस बॉल फैबरिक, शटलकॉक के पंख, रबर की कटी-फटी शीट, मोल्डिंग के टुकड़े जैसी खेल सामाग्री के अधजले कचरे से पटे हुए दिखे।

मेरठ में उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी राजेंद्र प्रसाद कहते हैं, “खेल इकाइयां "ग्रीन कैटेगरी" में आती हैं। इनकी स्थापना और संचालन के लिए बोर्ड से सहमति लेनी होती है। हालांकि इनमें बड़े स्तर का वायु प्रदूषण या औद्योगिक अपशिष्ट या ऐसा कोई बाहरी प्रदूषण नहीं है जिसे हम नियंत्रित करें।” वह मानते हैं कि फैक्टरी के भीतर रख-रखाव, श्रमिकों की सुरक्षा, स्वच्छता भी प्रदूषण मानकों से जुड़ा मामला है।

एक एक्सपोर्ट यूनिट के बाहर लगा जनरेटर

वहीं, नदीम की फैक्टरी, कारीगर सोनू की इकाई समेत गांव की ज्यादातर छोटी-बड़ी इकाइयां सौर ऊर्जा से दूर हैं। बड़ी इकाइयां बिजली जाने पर डीज़ल से संचालित होती हैं।

जिला उद्योग केंद्र में सहायक आयुक्त दिनेश आर्य मानते हैं कि छोटे उद्यमियों और कारीगरों के पास इतना सामर्थ्य नहीं कि वे सोलर प्लांट लगा सकें। 

निर्यातक कंपनी में कारीगरों के लिए कार्यस्थल का माहौल अपेक्षाकृत बेहतर मिला। 

खेल उद्योग के अंतर्राष्ट्रीय कारोबारी

मेरठ के मवाना क्षेत्र में क्रिकेट बैट, बॉल और सॉफ्ट लेदर उत्पाद बनाने वाले अब्बास भाई के पास लगभग ढाई करोड़ रुपये के निर्यात ऑर्डर हैं। अंतर्राष्ट्रीय खरीदार कंपनियां अब्बास भाई जैसे व्यापारियों को अंतर्राष्ट्रीय मानकों को पूरा करने की शर्त रखती हैं। वह बताते हैं, “वैश्विक बाजार में प्रवेश और निर्यात ऑर्डर हासिल करने के लिए सर्टिफिकेशन अनिवार्य है। इस पर मैंने लगभग सात लाख रुपये खर्च किए हैं। इसके लिए कई मानक पूरे करने होते हैं। इनमें सुरक्षित रसायनों का इस्तेमाल, बाल श्रम पर रोक, श्रमिकों के लिए बेहतर कार्य परिस्थितियां और पर्यावरणीय मानकों का पालन जैसी शर्तें शामिल है।”

ये कंपनियां मानती हैं कि जलवायु परिवर्तन आज दुनिया के सामने सबसे बड़ी पर्यावरणीय चिंता है। जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा करने, इकोसिस्टम को बचाने, आर्थिक स्थिरता बनाए रखने और स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों को कम करने के लिए हमारे व्यापार से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करना बहुत ज़रूरी है।

मेरठ के खेल कारोबार में तकरीबन 50 वर्षों से काम कर रही एक कंपनी के निदेशक अक्षय महाजन कहते हैं, “हमारा माल यूरोप, दक्षिण अफ्रीका, यूएई और ऑस्ट्रेलिया सहित कई देशों में जाता है। यूरोपीय बाजारों में निर्यात के लिए  रीच जैसे रसायन सुरक्षा मानकों का पालन करना आवश्यक होता है। ऐसे कृत्रिम रंगों (एजेडओ डाइस) का इस्तेमाल प्रतिबंधित है, जिनके टूटने से खतरनाक केमिकल बनने की आशंका होती हो”। अक्षय के मुताबिक घरेलू बाजार के लिए ऐसे मानक नहीं हैं।

अब्दुल्लापुर के घरों में चल रही इकाइयों की तुलना में महाजन की इकाई में हालात बेहतर हैं। साफ-सुथरे, हवादार और रोशन कमरों में कारीगर काम कर रहे हैं। ये इकाई 15 किलोवाट के सोलर प्लांट से चलती है।

नेट जीरो का लक्ष्य और एमएसएमई

शून्य कार्बन उत्सर्जन यानी नेट जीरो का लक्ष्य हासिल करने में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों यानी एमएसएमई की बड़ी भूमिका है। 

मार्च 2026 में देश के खेल उद्योग में एक्सपोर्ट की संभावनाओं पर जारी नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत का खेल उद्योग एमएसएमई आधारित है। मेरठ और जालंधर खेल सामग्री निर्माण के बड़े केंद्र हैं। इन दोनों क्लस्टर में कुल 25,000 से अधिक इकाइयां हैं। इनमें हर 100 में लगभग 79 घरेलू, 16 सूक्ष्म, चार घरेलू बाजार पर केंद्रित और सिर्फ एक इकाई निर्यात से जुड़ी है।

वहीं, मेरठ जिला उद्योग केंद्र से मिले आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2025–26 में कुल 9,720 खेल से जुड़ी एमएसएमई इकाइयों ने लगभग 1,852 करोड़ रुपये का कारोबार किया। जबकि सालाना निर्यात लगभग 975 करोड़ रुपए का है।

मेरठ पीपीडीसी कैंपस में स्पोर्ट्स वियर बनाने का प्रशिक्षण ले रहा लकड़ियों का एक समूह।

संसाधनों की दरकार

एमएसएमई मंत्रालय के तहत संचालित प्रोसेस-कम-प्रोडक्ट डेवलपमेंट सेंटर यानी पीपीडीसी उद्योगों को तकनीकी प्रशिक्षण, गुणवत्ता की जांच और बेहतर उत्पाद विकसित करने में मदद करता है।

मेरठ पीपीडीसी का कार्यभार संभाल रहे प्रधान निदेशक आदित्य प्रकाश शर्मा व्यापरियों के बीच जागरुकता की कमी और प्रशिक्षण के लिए सीमित संसाधनों की बात कहते हैं। “अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार खुद को तैयार करना जरूरी है। हमें शोध और नवाचार पर काम करने की जरूरत है। उद्यमी अब भी पारंपरिक तरीके से खेल का सामान बना रहे हैं। जबकि पाकिस्तान और चीन जैसे प्रतिस्पर्धी देश तकनीक के मामले में हमसे आगे हैं। निर्यात बढ़ाने के लिए भी हमें कुशल कार्यबल, प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता की आवश्यकता है।”

वहीं, इस वर्ष केंद्रीय बजट में देश का खेल इकोसिस्टम मजबूत करने के लिए 500 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। ताकि देश को खेल का सामान बनाने के एक वैश्विक केंद्र के तौर पर स्थापित किया जा सके। इसके लिए निर्माण, अनुसंधान, उपकरण डिजाइन और सामग्री विज्ञान में नवाचार को बढ़ावा देने की विशेष पहल प्रस्तावित की गई।

शर्मा उम्मीद जताते हैं कि केंद्र की इस पहल से मेरठ के खेल जगत की आकांक्षाएं पूरी होंगी।

छोटी और घरेलू खेल इकाइयों को शून्य कार्बन उत्सर्जन के लिए प्रशिक्षण, तकनीक और वित्तीय मदद की जरूरत है।

साझेदारी से हासिल होगा लक्ष्य

अमित कुमार डबल्यूआरआई इंडिया के क्लाइमेट प्रोग्राम में सीनियर फेलो हैं। वह जलवायु और सतत विकास से जुड़े मुद्दों पर काम करते हैं। वह खेल उद्योग में जस्ट ट्रांजिशन की शुरुआत छोटी इकाइयों से करने पर ज़ोर देते हैं, “स्वच्छ ऊर्जा, पर्यावरण और श्रमिकों से जुड़े लक्ष्य हासिल करना एक साझा जिम्मेदारी है। सप्लाई चेन में मौजूद छोटी एमएसएमई इकाइयाँ अकेले अपने दम पर आगे नहीं बढ़ सकतीं। खासतौर पर तकनीकी मामले में। जब तक पूरी सप्लाई चेन में बदलाव नहीं आएगा, तब तक बड़े उद्यमियों के लक्ष्य भी पूरे नहीं हो पाएंगे।” 

वह कहते हैं, “धरातल पर बदलाव के लिए नियम और मानक बनाने के साथ इन्हें लागू करने से जुड़ी नीतियां जरूरी हैं। इसमें क्षमता निर्माण, तकनीकी  शिक्षा, प्रशिक्षण के साथ ही वित्तीय मदद के लिए सब्सिडी, प्रोत्साहन और मुद्रा जैसी योजना के तहत आसान कर्ज भी शामिल हैं। यहां बैंक और वित्तीय संस्थानों की भूमिका अहम है”।

भारत वर्ष 2030 में कॉमनवेल्थ खेलों की मेज़बानी करने जा रहा है। वर्ष 2036 में ओलंपिक मेज़बानी की दौड़ में भी है। मेरठ के उद्योग जगत के सामने बदलते अंतर्राष्ट्रीय नियमों के अनुसार खुद को ढालने की चुनौती है। इस बदलाव के लिए सोनू जैसे कारीगर और अब्दुल्लापुर की फैक्टरी जैसी छोटी और घरेलू इकाइयों को तैयार करना होगा, जो देश के खेल उद्योग की रीढ़ हैं।

यह रिपोर्ट भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर के जस्ट ट्रांजिशन रिसर्च सेंटर (JTRC) फेलोशिप, क्लाइमेट ट्रेंड्स और अर्थ जर्नलिज्म नेटवर्क के सहयोग से तैयार की गई है।