फाइल फोटो: सीएसई 
चुनाव

महिला आरक्षण: पितृसत्ता और प्रतीकात्मक राजनीति पर सवाल अभी बाकी

1992 में पंचायतों व नगर निकायों में महिलाओं को आरक्षण मिलने के बावजूद राजनीतिक परिस्थितियां कितनी बदली हैं, इस पर भी बहस होनी चाहिए

Raju Sajwan

  • महिला आरक्षण पर चल रही बहस दिखाती है कि संसद और विधानसभाओं में एक-तिहाई आरक्षण का कानून पास होने के बावजूद पितृसत्तात्मक राजनीति और प्रतीकात्मक सम्मान की प्रवृत्ति बरकरार है।

  • पंचायतों में 50 प्रतिशत तक आरक्षण और 14 लाख से अधिक निर्वाचित महिलाएं होने के बाद भी अधिकतर प्रतिनिधियों को स्वतंत्र नेता नहीं, किसी पुरुष की मां, बेटी या पत्नी के रूप में पेश किया जाता है।

  • अध्ययनों से स्पष्ट है कि महिला आरक्षण का लाभ असमान रूप से संपन्न और ऊंचे वर्ग की महिलाओं को अधिक मिल रहा है, जबकि अशिक्षित और वंचित समुदायों की महिलाएं पीछे छूट जाती हैं।

  • 2010 से 2024 के बीच महिलाओं का विधायी प्रतिनिधित्व 15.2 से घटकर 13.7 प्रतिशत पर आ जाना, और दलों द्वारा सीमित महिला उम्मीदवार उतारना, पितृसत्ता और प्रतीकात्मक राजनीति की गहरी जड़ें उजागर करता है।

लैंगिक समानता व प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक बार फिर महिलाओं को लोकसभा व राज्य विधानसभाओं में आरक्षण देने के मुद्दे पर बहस चल रही है। हालांकि यह बहस लगभग देश की आजादी के बाद से ही पूरे देश में जारी है। जहां एक ओर इसके कई फायदे गिनाए जाते हैं, वहीं कुछ गंभीर चिंताएं भी जताई जा रही हैं। जैसे कि क्या यह आरक्षण वास्तव में सभी वर्गों की महिलाओं तक समान रूप से पहुंच पाएगा, या फिर इसका लाभ मुख्यतः संपन्न और सामाजिक रूप से सशक्त वर्गों तक ही सीमित रह जाएगा। 

भारत में मजबूत पित्तृसत्तात्मक राजनीतिक संस्कृति को लेकर विशेषज्ञ बहुत अधिक आश्वास्त नहीं दिखते। पंचायत चुनावों में यह साफ देखने को मिलता है। भारत में पंचायत चुनावों में महिलाओं को आरक्षण 1993 में 73वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के माध्यम से मिला, जिसके तहत सभी स्तरों पर कम से कम 33 प्रतिशत (एक-तिहाई) सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गईं। 

वर्तमान में 20 से अधिक राज्यों में यह आरक्षण बढ़कर 50 प्रतिशत हो चुका है, जिसकी शुरुआत बिहार ने 2006 में की थी। इस भारत अकेला ऐसा देश है, जहां 14 लाख से अधिक निर्वाचित महिलाएं स्थानीय स्वशासन संस्थाओं (पंचायतों और नगर निकायों) में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। इससे धीरे-धीरे ही सही, लेकिन महिलाओं की स्थिति में काफी हद तक बदलाव देखने को मिला है। 

हालांकि 42 साल बाद भी देश में अधिकतर महिला प्रतिनिधियों को स्वतंत्र नागरिक के रूप में पहचान नहीं मिल पाई है। ज्यदातर चुनाव प्रचार के दौरान महिला उम्मीदवारों को मां, बेटी या पत्नी के रूप में प्रचारित किया जाता है। बीते साल डाउन टू अर्थ ने हरियाणा पंचायत चुनाव के दौरान यह साफ तौर पर देखा। महिला उम्मीदवारों के पोस्टर बैनरों में महिला उम्मीदवार के साथ उनके पति, पिता या बेटे की तस्वीर अवश्य लगाई गई थी। यहां तक कि हरियाणा के मेवात जिले में पोस्टरों में महिलाओं की तस्वीरें तक नहीं थी, केवल उम्मीदवार का नाम और पति या पिता की तस्वीरें लगाई गई थी। 

वूमेंस स्टडीज इंटरनेशनल फोरम के जर्नल में प्रकाशित अध्ययन जेंडर्ड पाथवे ऑफ पावर: वूमेंस पॉलिटिकल रिप्रेंजटेंशन एमिड डेमोक्रेटिक बैकस्लाइडिंग इन इंडिया, हंगरी एंड टर्की में कहा गया है कि कहा गया है कि तीनों देशों के नेताओं ने सत्ता को मजबूत करने के लिए लैंगिक विमर्श का उपयोग किया है। भारत के संदर्भ में अध्ययन बताता है कि वर्तमान  सरकार एक हिंदू राष्ट्रवादी दृष्टिकोण को अपनाती है, जिसमें महिलाओं को राष्ट्र की “मां” और “बेटी” के रूप में सम्मानित किया जाता है, लेकिन वास्तविक राजनीति में महिला नेताओं को अक्सर हाशिए पर रखा जाता है।

इस अध्ययन के मुताबिक भारत में 2010 से 2024 के बीच महिलाओं के विधायी प्रतिनिधित्व में धीरे-धीरे वृद्धि  देखने को मिली। हालांकि यह वृद्धि क्रमिक रही और एक समय पर लगभग 15.2 प्रतिशत के स्तर पर जाकर स्थिर हो गई, लेकिन इसके बाद इसमें गिरावट आई और 2024 तक यह घटकर लगभग 13.7  प्रतिशत  रह गई।

अध्ययन के अनुसार, “2023 में महिलाओं के लिए संसद और विधानसभाओं में भी एक-तिहाई आरक्षण का कानून पास हुआ, लेकिन जो अभी लागू नहीं हुआ है। इसके बावजूद 2024 में महिलाओं की हिस्सेदारी 15.2 प्रतिशत से घटकर 13.7 प्रतिशत हो गई। हालांकि सतारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने इस कानून का समर्थन किया, लेकिन चुनाव में सिर्फ 16 प्रतिशत महिला उम्मीदवार उतारीं, जिससे पता चलता है कि पार्टियों के अंदर अभी भी महिलाओं को कम मौका मिलता है।” 

अशिक्षा व वंचित समुदायों की महिलाएं आरक्षण का पूरा लाभ नहीं उठा पाती हैं। एक अन्य अध्ययन पॉलिटिक्स इन नेम ऑफ वूमेंस रिर्जवेशन में कहा गया है कि एक प्रमुख चिंता यह है कि इन आरक्षणों का लाभ असमान रूप से धनवान और उच्च वर्ग की महिलाओं को अधिक मिल सकता है। इसके पीछे कई कारण हैं।

संपन्न परिवारों से आने वाली महिलाओं के पास अक्सर बेहतर शिक्षा, संसाधनों तक अधिक पहुंच और कौशल विकास के बेहतर अवसर होते हैं। इसके अलावा, वे पहले से ही राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव के मामले में अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में होती हैं, जिससे वे आरक्षित पदों का अधिक लाभ उठा पाती हैं।

जुलाई 2025 में डाउन टू अर्थ ने मध्य प्रदेश के सिहौर जिले की तहसील इछावर की गांव गाजीखेड़ी में पाया कि वहां सरपंच का पद अनुसूचित जाति की महिला के लिए आरक्षित है और सुमित्रा बाई को निर्विरोध सरपंच चुना गया। जो अनुसूचित जनजाति से हैं, लेकिन उन्हें सरपंच बनवाने में गांव के पूर्व सरपंच की अहम भूमिका रही, जिन्होंने अपनी पत्नी को उप सरपंच इसलिए बनवाया, ताकि सत्ता उनके हाथ में ही रहे। 

ऐसी परिस्थितियों में आने वाले समय में यह देखना होगा कि लोकसभा व विधानसभा में महिलाओं को आरक्षण मिलने के बाद हालात कितने बदलते हैं?