पिछले एक साल में दुनिया ने घंटों से अधिक मिसाइलों और बमों को गिना है। इस अवधि में ईंटें जुड़ने यानी निर्माण में इस्तेमाल होने की बजाय धूल में अधिक मिली हैं यानी अधिक नष्ट हुई हैं। इस वक्त लगभग 35 देश किसी न किसी संघर्ष में उलझे हुए हैं।
रुझान के उलट अब युद्ध और संघर्ष प्राकृतिक आपदाओं की तुलना में अधिक लोगों को विस्थापित कर रहे हैं और उनकी जान ले रहे हैं। विश्व युद्ध अब गूगल पर एक प्रमुख खोज बनकर उभरा है। बड़े संघर्षों का स्तर द्वितीय विश्व युद्ध के खात्मे के बाद सबसे अधिक है। “पॉलीक्राइसिस” (बहु-संकट) की स्थिति अब “भू-राजनीतिक संकट” में तब्दील हो चुकी है। युद्धरत देशों के प्रमुख अपने भाषणों की शुरुआत दुश्मन देशों पर लक्षित हमलों की संख्या से करते हैं।
दुनिया की परिस्थितियां इस समय कतई साधारण नहीं है। विश्व की भलाई के लिए शांति को जरूरी मानने वाला सिडनी स्थित गैर-लाभकारी थिंक टैंक इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस (आईईपी) इस दौर को “द ग्रेट फ्रैगमेंटेशन” (महान विखंडन) कहता है।
वैश्विक भू-राजनीति के अपने हालिया आकलन में आईईपी कहता है, “वैश्विक हिंसा में वृद्धि 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट की शुरुआत के साथ हुई और यह पिछले 50 वर्षों का तीसरा बड़ा भू-राजनीतिक चरण है।
इस चरण को “द ग्रेट फ्रैगमेंटेशन” के रूप में वर्णित किया जा सकता है।” आईईपी के आकलन के अनुसार, पिछले 17 वर्षों में से 13 वर्षों में वैश्विक “शांति” में गिरावट आई है।
1991 में शीत युद्ध समाप्त होने और उसके बाद तेजी से बढ़ी वैश्वीकरण और उदारीकरण की प्रक्रिया के बाद 2008 के वित्तीय संकट ने एक ऐसे नए चरण को जन्म दिया जिसका इससे पहले कोई स्पष्ट उदाहरण नहीं मिलता।
कई सर्वेक्षण बताते हैं कि भू-राजनीतिक खतरे शीत युद्ध के समय से भी अधिक हो गए हैं।
वैश्वीकरण अब सीमित व्यापार नियमों और समझौतों के दौर में सिमट गया है। इस नई व्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए बहुपक्षीय संस्थाओं को लगभग किनारे कर दिया गया है। इसके स्थान पर कई देशों के बीच छोटे समूहों में “मिनीलैटरल” व्यवस्थाएं विकसित की जा रही हैं।
आईईपी की रिपोर्ट के अनुसार, “विखंडन का यह नया चरण अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अचानक ढहने से नहीं, बल्कि पिछले 15 वर्षों में धीरे-धीरे बढ़ते तनावों के कारण उत्पन्न हुआ है। इनमें टैरिफ, निर्यात प्रतिबंध और निवेश प्रतिबंधों का बढ़ता उपयोग, साथ ही नए प्रवासन और पूंजी नियंत्रण शामिल हैं।”
आईईपी की रिपोर्ट यह भी बताती है कि उपरोक्त परिवर्तनों के साथ-साथ दो महाशक्तियां-अमेरिका और चीन 2015 के बाद से अपने-अपने राजनीतिक प्रभाव को खो रही हैं। वहीं “मध्यम स्तर की शक्तियों” का उदय हो रहा है, जिनका महाशक्तियों के साथ तालमेल नहीं हैं। इसका परिणाम बढ़ते भू-राजनीतिक जोखिमों और संघर्षों के रूप में दिखाई देता है।
आईईपी रिपोर्ट कहती है, “इस बदलाव ने वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) में प्रतिस्पर्धा को तेज कर दिया है, जहां मध्यम शक्तियां महाशक्तियों के साथ मिलकर सहायता, निवेश और सुरक्षा साझेदारी के माध्यम से प्रभाव के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही हैं। यह प्रवृत्ति प्रॉक्सी हस्तक्षेप को बढ़ावा देती है और 2010 के बाद से अंतरराष्ट्रीयकृत आंतरिक संघर्षों (जिन्हें इस प्रकार परिभाषित किया गया है कि किसी आंतरिक संघर्ष में बाहरी राज्य किसी एक पक्ष को सैनिक उपलब्ध कराए) में 175 प्रतिशत की वृद्धि का कारण बनी है।”
शांति प्राप्त करने की प्रवृत्ति भी कम होती दिख रही है। आईईपी के अनुसार, “1970 के दशक में जहां 23 प्रतिशत संघर्ष शांति समझौते के साथ समाप्त होते थे, वहीं 2010 के दशक में यह संख्या घटकर मात्र चार प्रतिशत रह गई।” इसके साथ ही 1991 के बाद से सैन्य व्यय लगातार बढ़ रहा है। 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण के बाद यूरोप के कई देशों ने सैन्य खर्च में भारी वृद्धि की है।
इसका अर्थ यह भी है कि संसाधनों को विकास और जलवायु आपातकाल से जुड़ी गतिविधियों से हटाकर रक्षा पर खर्च किया जा रहा है। यूरोप की कई विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने शिक्षा और स्वास्थ्य के बजट में कटौती शुरू कर दी है। सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के प्रदर्शन से स्पष्ट है कि जो देश संघर्ष में हैं या संघर्ष से प्रभावित हैं, वे इन्हें हासिल नहीं कर पाएंगे।
अध्ययन बताते हैं कि संघर्षों की सबसे अधिक कीमत गरीब और विकासशील देशों को चुकानी पड़ती है और इसका प्रभाव दशकों तक बना रहता है। इसका मतलब है कि विकास की घड़ी कई वर्षों पीछे चली जाती है। विखंडन का यह नया युग ठीक इसी तरह आगे बढ़ेगा।