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अर्थव्यवस्था

एक साल में राज्य सरकारों ने बिजली कंपनियों व उपभोक्ताओं को दी 1.90 लाख रुपए की सब्सिडी: कैग रिपोर्ट

कैग की स्टेट फाइनेंस रिपोर्ट में खुलासा, राज्यों का 43% से ज्यादा सब्सिडी बजट ऊर्जा क्षेत्र में, लेकिन कर्ज पर ब्याज भुगतान सब्सिडी से भी 1.3 लाख करोड़ रुपये अधिक

Raju Sajwan

  • कैग की स्टेट फाइनेंस 2024-25 रिपोर्ट के अनुसार राज्यों ने अपने कुल व्यय का लगभग 9% सब्सिडी पर खर्च किया, जिसमें 43.4% यानी 1.89 लाख करोड़ रुपए ऊर्जा क्षेत्र के लिए रहे।

  • यह राशि मुख्य रूप से बिजली वितरण कंपनियों को सहायता, घरेलू व कृषि उपभोक्ताओं को रियायती दरों पर बिजली और राजस्व घाटे की भरपाई पर खर्च हुई, जबकि कुल सब्सिडी 4.37 लाख करोड़ रुपए रही।

  • राज्यों का कुल सार्वजनिक कर्ज 2015-16 के 23.92 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 2024-25 में 75.52 लाख करोड़ रुपए हो गया। यानी दस वर्षों में इसमें 216 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

  • कर्ज पर 5.67 लाख करोड़ रुपए के ब्याज भुगतान ने राज्यों की विकास योजनाओं और पूंजीगत निवेश की क्षमता को सीमित कर दिया।

वित्त वर्ष 2024-25 में राज्य सरकारों ने अपने कुल व्यय का लगभग 9 प्रतिशत केवल सब्सिडी पर खर्च किया। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा ऊर्जा सब्सिडी का रहा। राज्य सरकारों ने लगभग 44 फीसदी राशि केवल ऊर्जा क्षेत्र के लिए जारी की। इसके बाद कृषि एवं कृषि से जुड़ी गतिविधियों पर सब्सिडी की राशि खर्च की गई।

हालांकि राज्य सरकारें किसानों, उपभोक्ताओं और अन्य क्षेत्रों को जितनी सब्सिडी देती हैं, उससे भी अधिक पैसा पुराने कर्जों का ब्याज चुकाने में खर्च कर रही हैं। 2024-25 में सब्सिडी पर 4.37 लाख करोड़ रुपए खर्च हुए, जबकि कर्ज के ब्याज का भुगतान लगभग 5.7 लाख करोड़ रुपए रहा।

भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) द्वारा जारी स्टेट फाइनेंस 2024-25 रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य सरकारों द्वारा एक दशक में सब्सिडी पर किए जाने खर्च में 214 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। 2015-16 में राज्याें का सब्सिडी व्यय 1.39 लाख करोड़ रुपए था, जो 2024-25 में बढ़कर 4.37 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया।

वित्त वर्ष 2024-25 में राज्यों द्वारा वितरित कुल सब्सिडी का लगभग 73 प्रतिशत हिस्सा ऊर्जा तथा कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों पर खर्च किया गया, जबकि अन्य क्षेत्रों जैसे खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति, परिवहन, उद्योग, शिक्षा और सामाजिक कल्याण के लिए कुल सब्सिडी का 26.76 प्रतिशत दिया गया।

ऊर्जा सब्सिडी पर सबसे अधिक खर्च

वित्त वर्ष 2024-25 में राज्यों द्वारा दी गई कुल सब्सिडी में ऊर्जा क्षेत्र सबसे बड़ा घटक रहा। इस क्षेत्र पर 1,89,802 करोड़ रुपए खर्च किए गए, जो कुल सब्सिडी का 43.4 प्रतिशत है।

यह राशि मुख्य रूप से बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) को वित्तीय सहायता, घरेलू और कृषि उपभोक्ताओं को रियायती दरों पर बिजली उपलब्ध कराने तथा बिजली क्षेत्र के राजस्व घाटे की भरपाई के लिए खर्च की गई।

ऊर्जा सब्सिडी पर सबसे अधिक खर्च राजस्थान ने किया, जहां इस मद में 32,572 करोड़ रुपए खर्च हुए। इसके बाद कर्नाटक (26,701 करोड़ रुपए), मध्य प्रदेश (18,790 करोड़ रुपए), उत्तर प्रदेश (17,392 करोड़ रुपए) और महाराष्ट्र (16,094 करोड़ रुपए) का स्थान रहा।

दूसरे स्थान पर कृषि सब्सिडी

वित्त वर्ष 2024-25 में राज्यों द्वारा कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों पर कुल 1,30,484 करोड़ रुपए की सब्सिडी खर्च की गई। इस राशि में किसानों को दी जाने वाली विभिन्न प्रकार की सहायता शामिल है, जैसे उर्वरक, बीज, सिंचाई, कृषि उपकरणों पर अनुदान तथा फसल और कृषि क्षेत्र से जुड़ी विशेष प्रोत्साहन योजनाएं।

कृषि सब्सिडी खर्च के मामले में महाराष्ट्र सबसे आगे रहा, जहां इस मद पर 21,815 करोड़ रुपए खर्च किए गए। इसके बाद मध्य प्रदेश (16,600 करोड़ रुपए), पश्चिम बंगाल (16,518 करोड़ रुपए), कर्नाटक (12,902 करोड़ रुपए) और गुजरात (11,807 करोड़ रुपए) का स्थान रहा।

कर्ज

पिछले एक दशक में राज्यों की उधारी पर निर्भरता तेजी से बढ़ी है। कैग की स्टेट फाइनेंसेज 2024-25 रिपोर्ट के अनुसार, राज्यों का कुल सार्वजनिक कर्ज 2015-16 के 23.92 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 2024-25 में 75.52 लाख करोड़ रुपए हो गया। यानी दस वर्षों में इसमें 216 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

राज्यों पर बकाया कर्ज उनकी सालाना राजस्व प्राप्तियों का 186 प्रतिशत तक पहुंच गया है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि कई राज्य पूंजीगत परिसंपत्तियां बनाने के बजाय राजस्व घाटे की भरपाई के लिए भी उधार का सहारा ले रहे हैं, जिससे वित्तीय दबाव बढ़ रहा है।

मार्च 2025 तक तमिलनाडु पर सबसे अधिक 7.98 लाख करोड़ रुपए का सार्वजनिक कर्ज था, इसके बाद पश्चिम बंगाल (6.12 लाख करोड़ रुपए), राजस्थान (5.02 लाख करोड़ रुपए) और आंध्र प्रदेश (4.95 लाख करोड़ रुपए) का स्थान रहा।

हालांकि अर्थव्यवस्था के आकार (जीएसडीपी) के अनुपात में देखें तो नागालैंड (41.5 प्रतिशत), पंजाब (39.9 प्रतिशत), अरुणाचल प्रदेश (38.8 प्रतिशत) और मेघालय (36.6 प्रतिशत) सबसे अधिक कर्जग्रस्त राज्यों में शामिल हैं।

रिपोर्ट के अनुसार 10 राज्यों का सार्वजनिक कर्ज उनके जीएसडीपी के 30 प्रतिशत से अधिक है, जबकि 13 राज्यों की कुल देनदारियां वित्त आयोग द्वारा सुझाई गई 32.8 प्रतिशत की सीमा से ऊपर हैं।

रिपोर्ट बताती है कि राज्यों पर बढ़ते कर्ज का असर अब उनके बजट पर साफ दिखाई देने लगा है। वित्त वर्ष 2024-25 में राज्यों ने लगभग 5.67 लाख करोड़ रुपए केवल ब्याज भुगतान पर खर्च किए, जो उनके कुल व्यय का करीब 11 प्रतिशत था।

ब्याज भुगतान, वेतन और पेंशन की तरह एक प्रतिबद्ध व्यय है, जिसे टालना संभव नहीं होता। इस कारण विकास योजनाओं और पूंजीगत निवेश के लिए उपलब्ध संसाधनों पर दबाव बढ़ता है।

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2024-25 में राज्यों ने सब्सिडी पर 4,37,326 करोड़ रुप खर्च किए, जबकि ब्याज भुगतान लगभग 5,67,000 करोड़ रुपये रहा। यानी राज्यों का ब्याज भुगतान सब्सिडी व्यय से करीब 1,30,000 करोड़ रुपये अधिक था। बढ़ते कर्ज और उस पर चुकाए जाने वाले ब्याज ने राज्यों के बजट में वित्तीय कठोरता बढ़ा दी है, जिससे नई विकास परियोजनाओं और बुनियादी ढांचे पर खर्च के लिए वित्तीय गुंजाइश सीमित होती जा रही है।

वेतन और पेंशन का बढ़ता बोझ राज्यों की वित्तीय स्थिति पर लगातार दबाव बना रहा है। वित्त वर्ष 2024-25 में राज्यों ने कर्मचारियों के वेतन पर 7,71,483 करोड़ रुपये और पेंशन पर लगभग 5.12 लाख करोड़ रुपये खर्च किए। कुल मिलाकर इन दोनों मदों पर खर्च करीब 12.84 लाख करोड़ रुपये रहा, जो राज्यों के कुल व्यय का लगभग 25 प्रतिशत है।

यदि स्वायत्त संस्थाओं, विश्वविद्यालयों और स्थानीय निकायों के कर्मचारियों के वेतन के लिए दिए गए 3,35,620 करोड़ रुपये के अनुदान-सहायता (ग्रांट इन ऐड सेलरी को भी जोड़ लिया जाए, तो वेतन संबंधी कुल खर्च बढ़कर 11,07,103 करोड़ रुपये हो जाता है। ऐसे में वेतन और पेंशन पर कुल व्यय लगभग 16.2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है। इससे स्पष्ट है कि राज्यों के बजट का बड़ा हिस्सा कर्मचारियों और पेंशनभोगियों से जुड़े दायित्वों को पूरा करने में खर्च हो रहा है, जिससे विकास और पूंजीगत निवेश के लिए उपलब्ध संसाधनों पर दबाव पड़ता है।