हिमालय की किसी बहुत ही दुर्गम जगह पर एक गुफा के सामने वह ध्यान में लीन थे। अचानक खटर-पटर की आवाज से उनका ध्यान भंग हो गया। यह कैसी आवाज थी? कोई चोर तो नहीं आ गया गुफा में? सोचते हुए उन्होंने अपने स्मार्टफोन पर नजरें गाड़ दीं जहां उनके सीसीटीवी के ऐप पर उनकी गुफा और आसपास लगे कैमरों से चप्पे-चप्पे का दृश्य दिखता था। नहीं, कहीं कोई नहीं था। चारों ओर शांति थी। अचानक उनकी नजर गुफा के नीचे उगी झाड़ियों पर पड़ी। यह क्या? कोई उनकी गुफा की ओर आने की कोशिश कर रहा था। उन्होंने एक बार फिर से अपने स्मार्ट फोन के ऐप को चेक किया। कोई ओटीपी नहीं आया था अर्थात् आने वाला व्यक्ति कोई डिलेवरी एजेंट भी नहीं था। “कौन है वह आखिर?”
जब तक वह इसके आगे सोचते उनके सामने वह आकर नतमस्तक हो गया। उसके चेहरे पर छाई हताशा से लेकर उसके कपड़े चीख चीखकर कह रहे थे कि वह मिडिल-क्लास इंसान है।
“प्रभु! मुझे रास्ता दिखाओ!” वह बोला “मैं बहुत परेशान हूं! देश से लेकर दुनिया तक, जहां देखिए वहीं परेशानी ही परेशानी है! मेरे मुहल्ले में एक भी इंसान ठीक नहीं है। घर से ऑफिस जाना एक युद्ध है, सड़कें टूटी हुईं हैं, सड़कों पर कूड़ा फैला है। मकान मालिक किराया बढ़ाता ही जा रहा है। ऑफिस में हर दूसरा बंदा चापलूस और कामचोर है। देश के नेता देश को लूट रहे हैं। महंगाई आसमान छू रही है। फल-सब्जी-आटा-दवा में मिलावट है। उधर ट्रम्प अपनी जिद पर अड़ा है। चीन-ईरान की जिद अलग। गैस के लिए मारामारी मची है! पेट्रोल के दाम अब बढ़े कि तब बढ़े। मैं करूं तो आखिर क्या करूं?” इतना कहकर वह रुक गया।
उन्होंने धीरे-धीरे अपनी आंखों को खोला। इशारे से उसे अपने पास बुलाया और कानों में फुसफुसा कर कहा, “शहर के पॉश इलाके में एक फ्लैट खरीदो। अपनी जरूरत से काफी बड़ा। उसके बाद एक बड़ी-सी गाड़ी खरीदो। हाई एंड वर्जन। लाख-दो लाखी मोबाइल खरीदो। फोरेन टूर पर जाओ। खूब जमकर शॉपिंग करो। हर वीकेंड में किसी अच्छे से रेस्तरां में खाना खाओ।”
“मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं।
“ क्रेडिट कार्ड्स लो। पर्सनल लोन लो।”
फिर तेज आवाज में “तुम्हारा मंगल हो!” कहते हुए गुफा के अंदर चले गए।
कुछ वर्षों के बाद...
हिमालय की किसी बहुत ही दुर्गम जगह पर एक गुफा के सामने वह ध्यान में लीन थे। अचानक खटर-पटर की आवाज से उनका ध्यान भंग हो गया। यह कैसी आवाज थी? कोई चोर तो नहीं आ गया गुफा में? सोचते हुए उन्होंने अपने स्मार्टफोन पर नजरें गाड़ दीं। अचानक उनकी नजर गुफा के नीचे उगी झाड़ियों पर पड़ी। यह क्या? कोई शख्स उनकी गुफा की ओर आने की कोशिश कर रहा था। हां यह तो वही आदमी था जो कुछ दिनों पहले दुख और हताशा से पीड़ित था। पर आज उसका हुलिया बदल हुआ था। घड़ी से लेकर चश्मे और सूट से लेकर बूट तक सब ब्रांडेड।
उन्होंने पूछा, “कहो बच्चा कैसे हो? मुहल्ले वाले कैसे हैं? ऑफिस कैसा चल रहा है? रूस-चीन-ईरान कैसे हैं?”
“गुरुदेव आपके सुझावों पर चलते हुए पहले मैंने एक बड़ा-सा फ्लैट खरीदा। एक बड़ी-सी गाड़ी खरीदी। लाखों का फोन खरीदा, खूब शॉपिंग कर रहा हूं और ऐसा करने से भारी लोन और ईएमआई के बोझ के तले आ गया हूं। अब सड़कों के गड्ढे, मुहल्ले के लोग, ऑफिस के कलीग और मेरा बॉस मुझे अब बेहद अच्छे लगने लगा है। कैसा रूस और काहे का अमरीका? जगत मिथ्या है। लोन सत्य है। मुझे अब अपने जीवन का असली मकसद मिल गया है। मैं अब पुराने लोन को चुकाऊंगा और फिर नया लोन लूंगा।”
“तुम्हारा मंगल हो!” कहते हुए गुरुजी गुफा के अंदर चले गए।