नाबार्ड के जुलाई 2026 सर्वे के अनुसार ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है।
52 फीसदी से अधिक ग्रामीणों ने माना कि पिछले एक साल में उनकी आय नहीं बढ़ी, जबकि करीब 20 फीसदी की आय घटी।
भविष्य को लेकर भरोसा भी कमजोर है, क्योंकि अगले एक वर्ष में आय बढ़ने की उम्मीद रखने वालों का अनुपात सर्वे शुरू होने के बाद सबसे निचले स्तर पर आ गया है।
केवल 27.7 फीसदी ने आय बढ़ने की बात कही, जबकि बचत बढ़ने वालों का अनुपात 17.8 फीसदी पर सिमट गया।
रोजगार की उम्मीदें घटी हैं, महंगाई को लेकर चिंता बढ़ी है और अनौपचारिक कर्ज पर निर्भरता 23.6 फीसदी तक पहुंच गई, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नाजुक स्थिति उजागर होती है।
18 प्रतिशत ब्याज दर पर कर्ज ले रहे हैं ग्रामीण, औपचारिक संस्थाओं से लोन लेने वालों की संख्या में भी कमी आई
ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने के संकेत हैं। नाबार्ड के ताजा सर्वेक्षण के अनुसार, पिछले एक वर्ष में आय बढ़ने की बात कहने वाले ग्रामीण परिवारों का अनुपात सर्वे शुरू होने के बाद के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। इतना ही नहीं, अगले एक वर्ष में आय बढ़ने को लेकर ग्रामीणों का भरोसा भी कमजोर पड़ा है। साथ ही बचत, निवेश और रोजगार को लेकर भी लोगों का विश्वास घटा है, जबकि महंगाई बढ़ने की आशंका पहले से अधिक हो गई है।
राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की जुलाई 2026 की 'रूरल इकोनॉमिक कंडीशंस एंड सेंटिमेंट्स सर्वे' के अनुसार, पिछले एक वर्ष में लगभग 20 (19.8) फीसदी ग्रामीणों ने उनकी आय बढ़ने की बजाय घट गई है, जबकि 52.6 प्रतिशत ग्रामीणों ने कहा कि उनकी आय में कोई बदलाव नहीं हुआ।
खास बात यह है कि आय बढ़ने की बात कहने वाले ग्रामीण परिवारों का अनुपात में रिकॉर्ड कमी आई है। सर्वे के मुताबिक मात्र 27.7 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उनकी आय में वृद्धि हुई है, जो सितंबर 2024 से शुरु हुए इस द्विमासिक सर्वेक्षण में अब तक का यह सबसे निचला स्तर है। इससे पहले मई 2026 में यह 29.6 प्रतिशत और नवंबर 2025 में सर्वाधिक 42.2 प्रतिशत था।
भविष्य को लेकर भी ग्रामीण परिवारों का आर्थिक भरोसा कमजोर पड़ता दिख रहा है। नाबार्ड के सर्वे के अनुसार, अगले एक वर्ष में आय बढ़ने की उम्मीद रखने वाले परिवारों का अनुपात घटकर 69.6 प्रतिशत रह गया है, जो सितंबर 2024 में सर्वे शुरू होने के बाद सबसे कम है।
अगले एक वर्ष में आय बढ़ने की उम्मीद रखने वाले परिवारों का अनुपात घटकर 69.6 प्रतिशत रह गया है, जो सितंबर 2024 में सर्वे शुरू होने के बाद सबसे कम है।
वहीं, 23.5 प्रतिशत परिवारों का मानना है कि अगले एक वर्ष में उनकी आय में कोई बदलाव नहीं होगा, जबकि 6.9 प्रतिशत परिवारों को आय घटने की आशंका है। यह संकेत देता है कि ग्रामीण परिवारों का भविष्य की आय को लेकर आशावाद पहले की तुलना में कम हुआ है।
न बचत, न निवेश
रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुस्ती केवल आय तक सीमित नहीं है। पिछले एक वर्ष में वित्तीय बचत बढ़ने की बात कहने वाले परिवारों का अनुपात घटकर 17.8 प्रतिशत रह गया, जो सर्वे शुरू होने के बाद सबसे कम है। इसी तरह पूंजीगत निवेश जैसे कृषि उपकरण, मशीनरी, पशुधन या अन्य परिसंपत्तियों में निवेश में वृद्धि नहीं होने की बात कहने वाले परिवारों का अनुपात बढ़ा है।
नाबार्ड का कहना है कि ये संकेत ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों के धीमे पड़ने और निवेश संबंधी निर्णयों में बढ़ती सतर्कता को दर्शाते हैं।
रोजगार की उम्मीदें भी कम हुई
सर्वे में ग्रामीण परिवारों से अगले तीन महीने और अगले एक वर्ष के रोजगार एवं आय संबंधी अनुमान भी पूछे गए। अगले तीन महीनों में रोजगार की स्थिति बेहतर होने की उम्मीद रखने वाले परिवारों का अनुपात घटकर 39.3 प्रतिशत रह गया है। इसी अवधि में आय बढ़ने की उम्मीद रखने वालों का अनुपात 41.2 प्रतिशत है, जो सर्वे का सबसे निचला स्तर है।
यह संकेत देता है कि ग्रामीण परिवारों को निकट भविष्य में रोजगार और आय दोनों मोर्चों पर बहुत अधिक सुधार की उम्मीद नहीं है।
भोजन पर सबसे अधिक खर्च
दिलचस्प बात यह है कि आय वृद्धि की रफ्तार कमजोर होने के बावजूद 74.1 प्रतिशत परिवारों ने बताया कि पिछले एक वर्ष में उनका उपभोग (खर्च) बढ़ा है। हालांकि यह अनुपात भी पहले की तुलना में कुछ कम हुआ है।
ग्रामीण परिवार अपनी मासिक आय का औसतन 66.5 प्रतिशत हिस्सा उपभोग पर खर्च करते हैं। आय का 13.6 प्रतिशत बचत में और 12.5 प्रतिशत ऋण चुकाने में जाता है। उपभोग व्यय के भीतर सबसे बड़ा हिस्सा भोजन का है। ग्रामीण परिवार अपने मासिक उपभोग व्यय का 54.6 प्रतिशत भोजन पर खर्च करते हैं, जबकि 24.1 प्रतिशत शिक्षा और स्वास्थ्य तथा 16.4 प्रतिशत ईंधन एवं परिवहन पर खर्च होता है।
महंगाई पर चिंता बढ़ी
नाबार्ड के सर्वे से यह भी पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में महंगाई को लेकर चिंता बढ़ी है। उत्तरदाताओं ने अगले एक वर्ष के लिए औसत महंगाई 5.8 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। मार्च 2026 के सर्वे में यह अनुमान 4.4 प्रतिशत था। हालांकि अधिकांश ग्रामीण परिवार अब भी मानते हैं कि महंगाई 5 प्रतिशत के आसपास नियंत्रित रहेगी, लेकिन भविष्य में कीमतें बढ़ने की आशंका पहले की तुलना में अधिक दिखाई देती है।
अनौपचारिक कर्ज पर निर्भरता बढ़ी
रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष ग्रामीण ऋण व्यवस्था से जुड़ा है। जुलाई 2026 में 51 प्रतिशत परिवारों ने बताया कि वे केवल औपचारिक संस्थानों जैसे बैंक, सहकारी बैंक और अन्य वित्तीय संस्थानों से कर्ज लेते हैं। हालांकि यह हिस्सा नवंबर 2025 के 58.3 प्रतिशत से कम है।
दूसरी ओर, केवल अनौपचारिक स्रोतों जैसे रिश्तेदारों, दोस्तों और साहूकारों पर निर्भर परिवारों का अनुपात बढ़कर 23.6 प्रतिशत हो गया, जो सर्वे शुरू होने के बाद सबसे अधिक है। ऐसे परिवारों में लगभग दो-तिहाई ने बताया कि उन्होंने दोस्तों और रिश्तेदारों से उधार लिया।
रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण अनौपचारिक स्रोतों से 18 प्रतिशत प्रति वर्ष की ब्याज दर पर कर्ज ले रहे हैं।
सब्सिडी घटी
सर्वे के अनुसार, ग्रामीण परिवारों की मासिक आय में सरकारी सब्सिडी और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) का औसत योगदान 8.11 प्रतिशत है। जनवरी 2025 में यह हिस्सा 10.28 प्रतिशत था। साथ ही 16.2 प्रतिशत परिवारों ने बताया कि उन्हें सरकार से कोई नकद हस्तांतरण या सब्सिडी नहीं मिलती, जबकि 31.5 प्रतिशत परिवारों की आय में सरकारी सहायता की हिस्सेदारी 5 प्रतिशत से भी कम है।
रिपोर्ट का आकलन है कि यह प्रवृत्ति लाभार्थियों की बेहतर पहचान और योजनाओं में लीकेज कम होने का संकेत हो सकती है।