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अर्थव्यवस्था

आंकड़ों के मकड़जाल में गरीबी

विश्व बैंक की रिपोर्ट में 2011 से 2023 के बीच भारत में 49.6 करोड़ लोगों के गरीबी से बाहर निकलने के दावे के बाद गरीबी के आंकड़ों पर फिर बहस छिड़ गई है

Richard Mahapatra

  • भारत में गरीबी का कोई नया आधिकारिक अनुमान जारी नहीं हुआ है। इस बीच गरीबी के आंकड़ों को लेकर अर्थशास्त्रियों के बीच बहस जारी है।

  • विश्व बैंक का बड़ा दावा, 2011 से 2023 के बीच 49.6 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए। 4.20 डॉलर प्रतिदिन से कम आय वाली आबादी 57.7 फीसदी से घटकर 16.1 फीसदी रह गई।

  • गरीबी का मुद्दा वास्तविक स्थिति समझने के बजाय आंकड़ों के पक्ष और विपक्ष में दावों तक सिमट गया है। बहस इस बात पर भी है कि देश में गरीब कितने बचे हैं।

  • 2023 में सबसे अमीर 10 फीसदी श्रमिकों की कमाई सबसे गरीब 10 फीसदी श्रमिकों से 13 गुना थी। करीब 30 फीसदी आबादी स्वच्छता सुविधाओं से वंचित है।

  • उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक के राज्यों में देश की करीब 57 फीसदी गरीब आबादी रहती है। गरीबी कम करने के लिए इन राज्यों में उत्पादक रोजगार के अवसर बढ़ाना जरूरी है।

भारत कितना गरीब है? आधिकारिक तौर पर भारत ने 2011 के बाद से इस सवाल का जवाब देने की कोशिश नहीं की है। हालांकि, तब से इस मुद्दे पर लगातार बहस होती रही है। ये बहसें ज्यादातर तब शुरू होती हैं, जब कोई व्यक्ति या संस्था भारत में गरीबी के स्तर का कोई अनुमान पेश करती है।

ज्यादातर बार ये बहसें भारत में गरीबी की असली स्थिति पर नहीं, बल्कि गरीबी के आंकड़ों को लेकर एक-दूसरे के दावों और विरोधी दावों तक सिमट जाती हैं। आधिकारिक आंकड़े न होने के कारण भारत में गरीबी अब कुछ अर्थशास्त्रियों के अनुमानों और आंकड़ों का खेल बनकर रह गई है।

यह परंपरा सी बन गई है कि जब भी बहुआयामी गरीबी (मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी) पर कोई वैश्विक आकलन जारी होता है या विश्व बैंक वैश्विक गरीबी के अपने अनुमानों को अपडेट करता है तो भारत में गरीबी के स्तर पर फिर से चर्चा शुरू हो जाती है। कभी-कभार सार्वजनिक संस्थानों में महत्वपूर्ण पदों पर बैठे भारतीय अर्थशास्त्री भी गरीबी के अपने अनुमान जारी करते हैं। हालांकि, वे यह स्पष्ट करते हैं कि ये उनके निजी आकलन हैं।

हैरानी की बात यह है कि भारत ने अब बहुआयामी गरीबी को गरीबी मापने के अपने पसंदीदा पैमाने के रूप में अपना लिया है और इसमें तेजी से आई गिरावट का जश्न मनाता है। विश्व बैंक जब भी भारत के गरीबी संबंधी आंकड़ों को अपडेट करता है, तब भी सरकार का यही जश्न मनाने वाला अंदाज दिखाई देता है।

गरीबी को लेकर ताजा बहस, जैसा कि अपेक्षित था, तब शुरू हुई जब विश्व बैंक ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट "इंडिया पॉवर्टी एंड इक्विटी ब्रीफ: अक्टूबर 2026" जारी की। भारत में गरीबी के स्तर को लेकर विश्व बैंक का आकलन बेहद प्रभावशाली तस्वीर पेश करता है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत दुनिया में गरीबी में सबसे तेजी से कमी दर्ज करने वाले देशों में शामिल है।

विश्व बैंक के इस आकलन में दिए गए आंकड़े ऐसे हैं, जिन्हें ऐतिहासिक उपलब्धि के तौर पर मनाने का आधार बनाया जा सकता है।

विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक, “2011 से 2023 के बीच निम्न-मध्यम आय वाले देशों के लिए निर्धारित गरीबी रेखा (4.20 डॉलर प्रतिदिन, 2021 की क्रय शक्ति समता यानी पीपीपी के आधार पर) से नीचे जीवनयापन करने वाली आबादी का अनुपात 57.7 फीसदी से घटकर 16.1 फीसदी रह गया। इस दौरान अनुमानित 49.6 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले। वहीं, अत्यधिक गरीबी (3 डॉलर प्रतिदिन) का स्तर 27.1 फीसदी से घटकर 2.6 फीसदी रह गया। गरीबी में गिरावट का सिलसिला आगे भी जारी रहेगा, हालांकि इसकी रफ्तार धीमी हो सकती है। 4.20 डॉलर प्रतिदिन वाली गरीबी रेखा के आधार पर गरीबी की दर 2026 में 14.2 फीसदी से घटकर 2028 तक 12.1 फीसदी रहने का अनुमान है।”

इसके बाद बहस शुरू हो गई। इसमें वही दो पक्ष आमने-सामने थे, जिनके रुख पहले से तय हैं। एक पक्ष में वे अर्थशास्त्री हैं जो इन आंकड़ों का समर्थन करते हैं, जबकि दूसरे पक्ष में वे हैं जो इनका विरोध करते हैं। दोनों पक्षों ने अपने-अपने विश्वास और विचारों के अनुरूप आंकड़ों की ऐसी बाजीगरी विकसित कर ली है, जिससे वे अपने तर्कों को सही साबित कर सकें। इसके बाद यह बहस थम जाती है और अगले अनुमान के सामने आने पर फिर शुरू हो जाती है। गौरतलब है कि ये आंकड़े भारत सरकार के नहीं, बल्कि किसी दूसरी एजेंसी के होते हैं।

लेकिन ये आंकड़े भारत के गरीबों की वास्तविक तस्वीर पेश नहीं करते। दरअसल, भारत में गरीबी को लेकर बड़ी बहस अब इस सवाल पर नहीं रह गई है कि गरीबों की संख्या कितनी है, बल्कि सवाल यह बन गया है कि क्या देश में अब गरीब बचे भी हैं?

इसके बावजूद, विश्व बैंक की यह रिपोर्ट इस बात के कुछ संकेत जरूर देती है कि भारत में गरीब आबादी कहां केंद्रित है और किन परिस्थितियों में जीवन गुजार रही है। यह स्थिति तब है, जब भारत दुनिया में गरीबी घटाने की सबसे तेज दर वाले देशों में शामिल है।

विश्व बैंक के मुताबिक, गरीबी अब उन परिवारों में तेजी से केंद्रित हो रही है, जहां शिक्षा का स्तर कम है, संपत्ति सीमित है, स्थायी रोजगार के अवसर कम हैं और परिवार में आश्रित सदस्यों की संख्या अधिक है।

रिपोर्ट में देश में आय की असमानता की गंभीर और लगातार बनी हुई स्थिति की ओर भी इशारा करते हुए कहा गया है, “वेतन में असमानता अब भी काफी अधिक है। 2023 में सबसे अधिक वेतन पाने वाले 10 फीसदी श्रमिकों की औसत कमाई, सबसे कम वेतन पाने वाले 10 फीसदी श्रमिकों की कमाई से करीब 13 गुना थी।”

बहुआयामी गरीबी के संकेतक

बहुआयामी गरीबी के संकेतकों पर विश्व बैंक का कहना है कि देश की करीब 14 फीसदी वयस्क आबादी ने प्राथमिक शिक्षा भी पूरी नहीं की है। वहीं, 6.4 फीसदी आबादी को मानक पेयजल की सुविधा उपलब्ध नहीं है। करीब 30 फीसदी आबादी अब भी स्वच्छता सुविधाओं से वंचित है। यह स्थिति तब है, जब भारत को वर्षों से खुले में शौच से मुक्त और सार्वभौमिक स्वच्छता वाला देश बताया जा रहा है।

गरीबी का भूगोल

भारत में गरीबी अब कुछ खास राज्यों में अधिक केंद्रित होती जा रही है। विश्व बैंक के मुताबिक, उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक के राज्यों में देश की कुल गरीब आबादी का करीब 57 फीसदी हिस्सा रहता है। रिपोर्ट कहती है, “ऐसे में देश में गरीबी को और कम करने की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इन राज्यों में उत्पादक रोजगार के अवसर किस हद तक उपलब्ध कराए जाते हैं।”

गरीबी के अनुमानों में आंकड़ों की कितनी भी बाजीगरी क्यों न हो, लेकिन यह तथ्य अपने आप में कार्रवाई की मांग करता है कि देश में आज भी आय के स्तर पर गरीबी और विकास की बुनियादी सुविधाओं से वंचित आबादी इतनी बड़ी संख्या में मौजूद है। यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि आखिर उन परिस्थितियों और व्यवस्थागत कारणों को दूर करने के लिए क्या किया जा रहा है, जिनके बीच भारत में दुनिया में गरीबी घटने की सबसे तेज दर दर्ज की जा रही है।