यह एक ऐसा पड़ाव था, जिसका लंबे समय से इंतजार किया जा रहा था। लेकिन इसे दुनिया की तरक्की का पैमाना नहीं, बल्कि बढ़ती हुई आर्थिक खाई की याद दिलाने वाली घटना के रूप में देखा जा रहा है। 12 जून को एलन मस्क दुनिया के पहले ट्रिलियनेयर यानी खरबपति बन गए। वह कई वर्षों से इस मुकाम की ओर तेजी से बढ़ रहे थे। जनवरी 2020 में उनकी कुल संपत्ति करीब 28 अरब अमेरिकी डॉलर थी और वह दुनिया के 35वें सबसे अमीर व्यक्ति थे। लेकिन फोर्ब्स पत्रिका के अनुसार महज पांच साल से कुछ अधिक समय में ही वह 1.11 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की कुल संपत्ति के साथ दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति बन गए। पिछले वर्ष उनकी संपत्ति में हर मिनट लगभग 10 लाख अमेरिकी डॉलर की बढ़ोतरी हुई।
दुनिया इस समय अभूतपूर्व गति से संपत्ति सृजन के दौर से गुजर रही है। अरबपतियों की संख्या रिकॉर्ड रफ्तार से बढ़ रही है। वर्ष 2025 में यह आंकड़ा 3,000 के पार पहुंच गया। गैर-लाभकारी संस्था ऑक्सफैम के अनुसार पिछले एक दशक (2015-2025) में “दुनिया के सबसे अमीर एक प्रतिशत लोगों की संपत्ति वास्तविक मूल्य (रियल टर्म्स) में 33.9 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक बढ़ी है।” दूसरी तरफ अत्यधिक संपत्ति के इस सृजन के साथ-साथ गरीबी भी तेजी से बढ़ रही है। आज दुनिया में हर 10 में से एक व्यक्ति अत्यधिक गरीबी में जीवन बिता रहा है। हालांकि, अत्यधिक गरीबी में रहने वाले लोगों की कुल संख्या 1990 के बाद से लगभग स्थिर बनी हुई है। यूनाइटेड नेशंस ट्रेड एंड डेवलपमेंट (यूएनसीटीएडी) के अनुसार दुनिया में 3.4 अरब लोग ऐसे देशों में रहते हैं, जहां सरकारें स्वास्थ्य या शिक्षा पर जितना खर्च करती हैं उससे अधिक उन्हें कर्ज का ब्याज चुकाने पर खर्च करना पड़ता है।
मस्क की एक ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की संपत्ति का अंदाजा ऑक्सफैम की इसी बात से लगाया जा सकता है, “एलन मस्क अकेले दुनिया की सबसे गरीब 46 प्रतिशत आबादी यानी 3.8 अरब लोगों की कुल संपत्ति से भी अधिक धनी हैं।”
कई विशेषज्ञों का मानना है कि आज दुनिया में असमानता का स्तर औपनिवेशिक काल से भी अधिक हो चुका है। ऑक्सफैम अमेरिका में आर्थिक न्याय के वरिष्ठ निदेशक नबील अहमद कहते हैं, “यह एक ट्रिलियन डॉलर की चेतावनी है, जो सरकारों को जगाने के लिए काफी होनी चाहिए। अब पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है कि अत्यधिक संपत्ति के लगातार बढ़ते केंद्रीकरण पर रोक लगाई जाए। इसके लिए उन आर्थिक नीतियों में बुनियादी बदलाव करना होगा, जिसने केवल ट्रिलियनेयर ही नहीं, बल्कि अरबपतियों की बढ़ती हुई संख्या और आज दिखाई देने वाली भयावह असमानता को भी जन्म दिया है।” एक ओर दुनिया एलन मस्क के ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति तक पहुंचने को आर्थिक विकास मॉडल की सफलता के प्रतीक के रूप में देख रही है। वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी उतनी ही मजबूती से सामने आता है कि आखिर गरीबी लगातार और गहराई से क्यों बनी हुई है?
अमीरी और गरीबी की इस बहस के बीच 10 जून को अर्थशास्त्रियों, नागरिक समाज संगठनों और संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियों के एक समूह ने “द रोडमैप फॉर इरैडिकेटिंग पॉवर्टी बियॉन्ड ग्रोथ” नाम से एक रोडमैप जारी किया है। यह दस्तावेज यूएन के एक्सट्रीम पॉवर्टी एंड ह्यूमन राइट्स मामलों के विशेष प्रतिवेदक (रेपोर्टियर) ओलिवियर डी शुटर की पहल पर तैयार किया गया है। 25 जून को इसे यूएन ह्यूमन राइट्स काउंसिल के 62वें सत्र में पेश किया गया। इस रोडमैप पर 18 महीने से अधिक समय तक चर्चा चली। इसे तैयार करने में 400 से ज्यादा लोगों के सुझाव शामिल किए गए, जो विभिन्न संस्थानों, सामाजिक आंदोलनों, संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों और समुदायों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह दस्तावेज इस बुनियादी सवाल का जवाब खोजने की कोशिश करता है कि क्या सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि को प्रगति की मुख्य शर्त माने बिना गरीबी खत्म की जा सकती है और असमानता घटाई जा सकती है?
इस रोडमैप पर लिखे एक लेख में अर्थशास्त्री ओलिवियर डी शुटर, जोसेफ स्टिग्लिट्ज, जयति घोष, थॉमस पिकेटी, केट रावर्थ और जेसन हिकल लिखते हैं कि आज दुनिया “मैन्युफैक्चर्ड स्कारसिटी” यानी कृत्रिम अभाव के दौर में जी रही है। इन अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि दशकों तक यही नुस्खा अपनाया गया कि अर्थव्यवस्था का विस्तार होगा तो गरीबी अपने आप कम हो जाएगी। लेकिन यह वादा कभी पूरा नहीं हुआ कि आर्थिक विकास का लाभ सभी तक समान रूप से पहुंचेगा। राष्ट्रीय आय तो लगातार बढ़ी, हालांकि मजदूरी ठहरी रही। रोजगार पहले से अधिक असुरक्षित होता गया और सार्वजनिक सेवाओं में कटौती होती रही। समाज के ऊपरी तबके की संपत्ति तेजी से बढ़ती गई, जबकि निचले तबके के परिवारों को भोजन के लिए भी राहत केंद्रों का सहारा लेना पड़ा। यानी आर्थिक वृद्धि और साझा समृद्धि का रिश्ता अब टूट चुका है।
यह रोडमैप मूल रूप से उस विकास मॉडल को चुनौती देता है, जो आर्थिक वृद्धि को ही विकास का आधार मानता है। इस रोडमैप में कहा गया है कि अर्थव्यवस्था और विकास से जुडे संसाधनों, अवसरों और लाभों का न्यायसंगत तरीके से बराबर बंटवारा ही समानता स्थापित करने का रास्ता है। दस्तावेज कहता है, “आय, संपत्ति, शक्ति, सामाजिक हैसियत और निर्णय लेने की आवाज में मौजूद असमानताओं को कम किए बिना गरीबी का उन्मूलन संभव नहीं है। संपत्ति और कॉरपोरेट ताकत का अत्यधिक केंद्रीकरण लोकतांत्रिक निर्णय प्रक्रिया को विकृत करता है और लोगों के अधिकारों के समान उपभोग को कमजोर करता है।” यह रोडमैप आगे कहता है कि सरकारों को राजकोषीय, मौद्रिक, वित्तीय, प्रतिस्पर्धा और नियामक नीतियों का इस्तेमाल करके संसाधनों का पुनर्वितरण करना चाहिए और आर्थिक शक्ति के अत्यधिक केंद्रीकरण पर रोक लगानी चाहिए।
असमानता और वैश्विक विकास मॉडल पर पुनर्विचार की जरूरत को लेकर यह अब तक का सबसे व्यापक समर्थन पाने वाला दस्तावेज माना जा रहा है। इसका मूल संदेश साफ है कि दुनिया का विकास मॉडल ऐसा होना चाहिए, जिसमें कोई भी पीछे न छूटे।