आप्रावसन (इमिग्रेशन) दुनिया भर में राजनीतिक संघर्ष का एक प्रभावशाली हथियार बन चुका है। पिछले एक दशक से अधिक समय से यूरोप से लेकर उत्तरी अमेरिका तक और एशिया से लेकर अफ्रीका तक, देशों की आंतरिक चुनावी राजनीति ने प्रवासी-विरोधी भावनाओं को बढ़ावा दिया है। अब यह स्पष्ट रूप से एक राजनीतिक एजेंडा बन गया है और लगातार अप्रवासी-विरोधी विजिलेंटिज्म (कानून अपने हाथ में लेने की प्रवृत्ति) को भी उकसा रहा है।
वर्ष 2015-2016 के दौरान, जब शरणार्थी संकट चरम पर था, तब यूरोप में इस तरह की कानून अपने हाथ में लेने की घटनाएं व्यापक रूप से देखने को मिली थीं। वर्तमान में यह प्रवृत्ति आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना अनेक देशों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है।
21वीं सदी की शुरुआत में दुनिया में आप्रवासन को लेकर भारी आक्रोश देखा गया, विशेष रूप से उन समृद्ध देशों में जिन्होंने वैश्विक संपदा के बड़े हिस्से पर कब्जा कर रखा है। लोगों के एक देश से दूसरे देश में जाने पर रोक लगाने के लिए प्रतिबंध लगाए गए, नीतियां बनाई गईं और यह सब स्थानीय अर्थव्यवस्था तथा स्थानीय हितों की रक्षा के नाम पर किया गया।
आज के इस बंटे हुए और अलग-थलग पड़ते वैश्विक परिदृश्य में एक अंतरराष्ट्रीय आप्रवासी होना ऐसी पहचान बन गया है, जो किसी भी समय राजनीतिक हमलों और उथल-पुथल का निशाना बन सकता है।
हालांकि आप्रवासियों के खिलाफ गढ़ी जा रही धारणाओं के विपरीत सांख्यिकीय रूप से अंतरराष्ट्रीय आप्रवासी अब भी अल्पसंख्यक हैं। 2024 के मध्य तक उनकी संख्या लगभग 30.4 करोड़ थी, जो दुनिया की कुल आबादी का केवल 3.7 प्रतिशत है, हालांकि इसमें लगातार वृद्धि हो रही है।
फिर भी दुनिया में अंतरराष्ट्रीय आप्रवासी अपवाद ही हैं, क्योंकि अधिकांश लोग अपने-अपने देशों के भीतर ही पलायन करते हैं (आंतरिक प्रवासी)। अंतरराष्ट्रीय प्रवासियों की आबादी का एक बड़ा हिस्सा प्रवासी श्रमिकों का है, जो मेजबान देशों की श्रमशक्ति का महत्वपूर्ण आधार हैं।
संयुक्त राष्ट्र की संस्था इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर माइग्रेशन (आईओएम) की नवीनतम “वर्ल्ड माइग्रेशन रिपोर्ट 2026” में स्थानीय और व्यापक विकास में अंतरराष्ट्रीय प्रवासियों की महत्वपूर्ण भूमिका का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट में उन्हें “वैश्विक रणनीतिक संपदा” बताया गया है।
रिपोर्ट में कहा गया है, “इक्कीसवीं सदी में प्रवासन मानव विकास को आकार देने वाली एक शक्तिशाली शक्ति के रूप में उभरा है।”
इसे दुनिया के बदलते जनसांख्यिकीय परिदृश्य के संदर्भ में समझना चाहिए। कुछ देशों की आबादी अन्य देशों की तुलना में कहीं अधिक है; कुछ देशों में जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार तेज है, जबकि कुछ देश अब उस जीवन प्रत्याशा स्तर तक पहुंच रहे हैं जिसे आधुनिक दुनिया में स्वस्थ माना जाता है। इसलिए देशों की जरूरतों के अनुसार मानव संसाधनों अथवा जनशक्ति के संतुलित वितरण की आवश्यकता होती है।
मानव इतिहास में प्रवासन हमेशा एक महत्वपूर्ण रणनीति रहा है, जिसने मानव समाज को आज के स्वरूप तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई है।
इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर माइग्रेशन (आईओएम) का कहना है कि प्रवासन वैश्विक स्तर पर मानव विकास को आगे बढ़ाने वाली एक प्रमुख शक्ति है। अपनी रिपोर्ट में संस्था ने प्रवासियों के सामाजिक और आर्थिक योगदान का विस्तृत विश्लेषण किया है।
अंतरराष्ट्रीय आप्रवासियों द्वारा भेजी जाने वाली धनराशि (रेमिटेंस) वर्ष 2025 में 913 अरब डॉलर तक पहुंच गई है और इसमें लगातार वृद्धि हो रही है। निम्न और मध्यम आय वाले देशों को इस विदेशी धन प्रवाह का सबसे बड़ा हिस्सा प्राप्त होता है।
इसका महत्व इस तथ्य से समझा जा सकता है कि इन देशों के लिए रेमिटेंस की राशि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और आधिकारिक विकास सहायता (ओडीए) की संयुक्त राशि से भी अधिक है। वर्ष 2023 में भारत सहित निम्न और मध्यम आय वाले देशों को 656 अरब डॉलर का रेमिटेंस प्राप्त हुआ, जबकि एफडीआई और ओडीए की संयुक्त राशि 638 अरब डॉलर थी।
कुछ देशों के लिए तो रेमिटेंस उनकी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
अपने देश लौटने वाले प्रवासियों द्वारा भेजी गई धनराशि (रेमिटेंस) से आर्थिक स्थिति, स्वास्थ्य और शिक्षा के स्तर में सुधार होता है, जो कई बार संबंधित देशों के राष्ट्रीय औसत से भी बेहतर होता है।
इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर माइग्रेशन (आईओएम) की रिपोर्ट एक उदाहरण देते हुए कहती है, “लैटिन अमेरिका में बाहर काम कर रहे लोगों द्वारा भेजे गए पैसे से वहां की आर्थिक व्यवस्था मजबूत हुई है।”
रिपोर्ट में एक अन्य अध्ययन का हवाला देते हुए कहा गया है कि 71 विकासशील देशों पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि प्रति व्यक्ति आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय रेमिटेंस में 10 प्रतिशत की वृद्धि से गरीबी में जीवनयापन करने वाली आबादी के हिस्से में 3.5 प्रतिशत की कमी आई। एक अन्य अध्ययन में यह भी सामने आया कि निम्न आय वाले देशों में रेमिटेंस ने शिक्षा तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित कर शिक्षा पर सकारात्मक प्रभाव डाला।
इसके अलावा, आप्रवासी-विरोधी भावनाओं के बावजूद जिन देशों में अंतरराष्ट्रीय प्रवासियों की संख्या सबसे अधिक है, उन्हें उनकी आवश्यकता भी सबसे ज्यादा है। हाल के वर्षों में कई देशों ने श्रमिकों और कौशल की कमी के कारण प्रवासियों पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी है।
इसलिए यह कहना उचित होगा कि आप्रवासन केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था की जरूरत ही नहीं, बल्कि व्यापक विकास के लिए भी अनिवार्य बन चुका है।