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अर्थव्यवस्था

दक्षिण भारत के राज्यों में पलायन करने वाले मजदूर बेहतर स्थिति में, कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंच बड़ी चुनौती

साउथ इंडिया इंटरस्टेट माइग्रेशन सर्वे के अनुसार,दक्षिण के तीन राज्यों में पलायन करने वाले 86.4 प्रतिशत श्रमिकों के पास कोई लिखित रोजगार अनुबंध नहीं

Bhagirath

दक्षिण भारत के कर्नाटक, तमिलनाडु और केरलम में काम के लिए पलायन करने वाले आधे से अधिक मजदूर इन राज्यों में ही रहना चाहते हैं। पलायन के बाद करीब 72 प्रतिशत प्रवासी मजदूर का जीवनस्तर बेहतर हुआ है। आज यानी 28 सितंबर 2026 को जारी हुए साउथ इंडिया इंटरस्टेट माइग्रेशन सर्वे (एसआईआईएमएस) 2026 में यह जानकारी सामने आई है। यह सर्वेक्षण भारत के आंतरिक पलायन की तस्वीर पेश करता है। साथ ही पहली बार उपलब्ध ऐसा आंकड़ा प्रस्तुत करता है कि दूसरे राज्यों (मुख्य रूप से उत्तर और पूर्वी राज्यों) से आने वाले प्रवासी श्रमिक कर्नाटक, केरलम और तमिलनाडु में किस तरह रहते और काम करते हैं। सर्वेक्षण बताता है कि श्रमिक किन क्षेत्रों में बेहतर स्थिति में हैं और किन क्षेत्रों में अब भी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर माइग्रेशन (आईएमएम) के सहयोग से इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ माइग्रेशन एंड डेवलपमेंट (आईआईएमएडी) द्वारा किए गए इस अध्ययन में पाया गया है कि केवल 19.4 प्रतिशत प्रवासी श्रमिक दूसरे राज्यों में जाने पर अपनी कल्याणकारी योजनाओं के लाभ आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। 35.3 प्रतिशत ऐसा आंशिक रूप से कर सकते हैं, जबकि 45.3 प्रतिशत के लिए ऐसा करना बेहद मुश्किल है।

सर्वेक्षण के निष्कर्षों के अनुसार, 73.3 प्रतिशत श्रमिकों को कल्याणकारी योजनाओं और सेवाओं तक पहुंच में समस्या का सामना करना पड़ता है, जबकि 69.2 प्रतिशत को स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने में दिक्कत होती है। दक्षिण के तीनों राज्यों में पलायन करने वाले 86.4 प्रतिशत श्रमिकों के पास कोई लिखित रोजगार अनुबंध नहीं है, 57.6 प्रतिशत को नकद भुगतान किया जाता है और अन्य कारकों को ध्यान में रखने के बाद भी महिला श्रमिकों की मासिक कमाई पुरुषों की तुलना में लगभग 3,313 रुपए कम है।

इन राज्यों में 88.2 प्रतिशत प्रवासी श्रमिक औपचारिक वित्तीय सेवाओं के दायरे में हैं। कर्नाटक में वित्तीय सेवाओं से बाहर रहने वालों की संख्या अधिक है (26.8 प्रतिशत), जबकि कबाड़ संग्रह करने वाले श्रमिकों में यह अनुपात 31.3 प्रतिशत है।

नतीजे बताते हैं कि तीनों राज्यों में तमिलनाडु में कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंच की स्थिति सबसे बेहतर है, जबकि कर्नाटक में यह सबसे कमजोर है। सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, प्रवास के फैसले मुख्य रूप से आजीविका की असुरक्षा और रोजगार के सीमित मौकों से तय होते थे।

जोखिम से निपटने का तरीका है पलायन

पलायन करने वालों ने अपने मूल स्थान पर कम वेतन, नौकरियों की कमी, बेहतर मौकों की तलाश, अनियमित रोजगार, गरीबी और कर्ज को पलायन के मुख्य कारणों में गिनाया। इन सभी बातों को मिलाकर देखें तो पता चलता है कि माइग्रेशन अक्सर सिर्फ आमदनी बढ़ाने के मकसद से नहीं, बल्कि परिवार की आजीविका और जोखिम से निपटने के एक तरीके के तौर पर किया जाता है।

इस अध्ययन में तीन राज्यों के 33 जिलों में 1,824 प्रवासी श्रमिकों का सर्वेक्षण किया गया। तीनों राज्यों में कृषि, मछली पकड़ने और समुद्री क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों तथा दिहाड़ी मजदूरों को सर्वेक्षण में शामिल किया गया। सर्वेक्षण में 43 प्रतिशत लोग 45 साल से कम उम्र के थे। श्रमिकों की मासिक औसत आय 17,640 रुपए थी।

आईओएम इंडिया और भूटान के प्रमुख संजय अवस्थी के अनुसार, “सुरक्षित प्रवासन केवल इस बात से तय नहीं होता कि लोग किस तरह एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं, बल्कि इससे भी तय होता है कि पूरी यात्रा के दौरान उन्हें कितना सहयोग मिलता है। प्रवास से पहले सही और पर्याप्त जानकारी के साथ निर्णय लेने से लेकर प्रवास के दौरान सुरक्षा और गंतव्य पर सहायता तक हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रवासियों को हर चरण में आवश्यक जानकारी, सेवाएं और अवसर उपलब्ध हों।”

नीतिगत सुझाव

अध्ययन में वन नेशन, वन राशन कार्ड की व्यवस्था को आगे बढ़ाने की सिफारिश की गई है, ताकि कल्याणकारी योजनाओं के लाभ श्रमिक के साथ एक राज्य से दूसरे राज्य तक पहुंच सके। इसके साथ ही बहुभाषी हेल्प डेस्क और हेल्पलाइन, औपचारिक वित्तीय सेवाओं तक व्यापक पहुंच, समय पर मजदूरी का भुगतान सुनिश्चित करने के लिए मजबूत श्रम निरीक्षण व्यवस्था, कार्यस्थल पर बेहतर सुरक्षा और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय की भी सिफारिश की गई है। अध्ययन में ऐसी नीतियां अपनाने की जरूरत बताई गई है, जो राज्य, क्षेत्र और लैंगिक आधार पर अलग-अलग जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार की जाएं।