ऑक्सफैम की रिपोर्ट के अनुसार, अरबपतियों की दौलत में तेजी से वृद्धि हुई है, जबकि दुनिया की आधी आबादी गरीबी में जी रही है।
ट्रंप प्रशासन की नीतियों ने अमीरों को फायदा पहुंचाया है, जिससे उनकी संपत्ति में रिकॉर्ड उछाल आया है। इस असमानता ने लोकतंत्र और आम लोगों के अधिकारों पर खतरा पैदा कर दिया है।
डोनाल्ड ट्रंप के नवंबर 2024 में सत्ता के गलियारों में कदम रखने के बाद से अरबपतियों की दौलत पिछले पांच वर्षों की तुलना में तीन गुणा तेजी से बढ़ी है।
रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में दुनिया के अरबपतियों की कुल संपत्ति 16 फीसदी से ज्यादा बढ़कर 18.3 लाख करोड़ डॉलर पर पहुंच गई। इतिहास में यह पहली बार है जब दुनिया में अरबपतियों की संख्या 3,000 के पार पहुंच गई है और उनकी कुल संपत्ति इतिहास के सबसे ऊंचे स्तर पर है।
विडम्बना देखिए जहां एक तरफ दुनिया के अरबपति दौलत के नए रिकॉर्ड बना रहे हैं, तो दूसरी तरफ हर चौथा इंसान खाने की कमी से जूझ रहा है। ऑक्सफैम ने अपनी नई रिपोर्ट में खुलासा किया है कि डोनाल्ड ट्रंप के नवंबर 2024 में सत्ता के गलियारों में कदम रखने के बाद से अरबपतियों की दौलत पिछले पांच वर्षों की तुलना में तीन गुणा तेजी से बढ़ी है।
इस दौरान अमेरिका अरबपतियों की संपत्ति में सबसे ज्यादा उछाल आया है, हालांकि दुनिया के बाकी हिस्सों में भी अरबपतियों की दौलत दहाई की दर से बढ़ी है। इसके साथ ही एलन मस्क आधा ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा संपत्ति वाले पहले इंसान बन गए।
दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान जारी इस रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में दुनिया के अरबपतियों की कुल संपत्ति 16 फीसदी से ज्यादा बढ़कर 18.3 लाख करोड़ डॉलर पर पहुंच गई। इतिहास में यह पहली बार है जब दुनिया में अरबपतियों की संख्या 3,000 के पार पहुंच गई है और उनकी कुल संपत्ति इतिहास के सबसे ऊंचे स्तर पर है।
ऑक्सफैम की नई रिपोर्ट बताती है कि 2020 से अब तक अरबपतियों की दौलत 81 फीसदी बढ़ चुकी है। दूसरी ओर, दुनिया की करीब आधी आबादी (383 करोड़ लोग) गरीबी में जी रही है।
आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले साल इन सुपर रिच लोगों की कुल दौलत में ढाई लाख करोड़ डॉलर का इजाफा हुआ है। हैरानी की बात है कि यह दुनिया की आधी सबसे कमजोर आबादी की कुल संपत्ति से भी ज्यादा है। संपत्ति में आया यह उछाल इतना बड़ा है कि यह दुनिया में व्याप्त चरम गरीबी को 26 बार पूरी तरह खत्म करने के लिए काफी है।
अमीरों की सत्ता, आम लोगों की बेबसी
गौरतलब है कि यह उछाल ऐसे समय में आया है, जब अमेरिका में ट्रंप प्रशासन ने अमीरों के पक्ष में नीतियां अपनाई हैं। सुपर-रिच पर टैक्स घटाए गए हैं। बड़ी कंपनियों पर कर लगाने की कोशिशें कमजोर पड़ी हैं, एकाधिकार पर रोक के प्रयास कमजोर किए गए हैं और एआई शेयरों को बढ़ावा दिया गया है।
इन नीतियों का फायदा सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के अरबपतियों को मिला है।
“रेसिस्टिंग द रूल ऑफ द रिच: प्रोटेक्टिंग फ्रीडम फ्रॉम बिलेनियर पावर” नामक इस रिपोर्ट में सामने आया है कि सुपर-रिच लोग राजनैतिक ताकत हासिल कर अर्थव्यवस्था और समाज के नियम अपने फायदे के मुताबिक गढ़ रहे हैं। इसका सीधा असर आम लोगों के अधिकारों और आजादी पर पड़ रहा है।
ऑक्सफैम के अनुमान के मुताबिक, अरबपतियों के राजनीतिक पद पर पहुंचने की संभावना आम नागरिकों की तुलना में 4,000 गुणा अधिक है। वहीं, 66 देशों में किए गए वर्ल्ड वैल्यूज सर्वे में करीब आधे लोगों का कहना था कि उनके देश में अमीर लोग अक्सर चुनाव खरीद लेते हैं। ऑक्सफैम इंटरनेशनल के कार्यकारी निदेशक अमिताभ बेहर का इस बारे में प्रेस विज्ञप्ति में कहना है, “अमीरों और आम लोगों के बीच बढ़ती खाई एक गंभीर राजनीतिक संकट भी पैदा कर रही है, जो बेहद खतरनाक है।”
लोकतंत्र पर मंडराता खतरा
दुनिया में हर चौथा व्यक्ति खाद्य असुरक्षा झेल रहा है। गरीबी घटने की रफ्तार 2019 के स्तर पर ठहर गई है और अफ्रीका में भीषण गरीबी का कहर फिर बढ़ रहा है। पिछले साल कई सरकारों ने सहायता बजट में कटौती की, जिससे 2030 तक 1.4 करोड़ अतिरिक्त मौतों का खतरा है।
नागरिक आजादी और राजनीतिक अधिकारों को लगातार कमजोर किया जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक 2024 लगातार उन्नीसवां साल था जब दुनिया में आम लोगों की आजादी घटी है। एक चौथाई देशों ने अभिव्यक्ति की आजादी पर किसी न किसी रूप में रोक लगाई। चिंता की बात है कि असमानता से जूझ रहे देशों में लोकतंत्र के कमजोर पड़ने की आशंका सात गुणा अधिक है। पिछले साल 68 देशों में सरकार के खिलाफ 142 से अधिक बड़े विरोध प्रदर्शन हुए, जिन्हें अक्सर हिंसा के जरिए कुचलने की कोशिश की गई।
मीडिया पर अमीरों का कब्जा
सरकारें सुपर-रिच को मीडिया और सोशल मीडिया कंपनियों पर हावी होने दे रही हैं। यही वजह है कि दुनिया की आधी से ज्यादा बड़ी मीडिया कंपनियां अरबपतियों के हाथ में हैं। सभी प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भी उन्हीं के स्वामित्व में हैं। उदाहरण के लिए जेफ बेजोस ने वॉशिंगटन पोस्ट को खरीद लिया है।
एलन मस्क ने ट्विटर/एक्स, पैट्रिक सून-शियोंग ने लॉस एंजिलिस टाइम्स, और अरबपतियों के एक समूह ने द इकोनॉमिस्ट में बड़ी हिस्सेदारी खरीद ली है।
इसी तरह फ्रांस में दक्षिणपंथी अरबपति विंसेंट बोलोरे ने सी न्यूज को ‘फ्रांस का फॉक्स न्यूज’ बना दिया है। ब्रिटेन में अखबारों का तीन-चौथाई प्रसार सिर्फ चार अमीर परिवारों के कब्जे में है। रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में शीर्ष संपादकों में महज 27 फीसदी महिलाएं हैं।
नफरत और दमन का दौर
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि केन्या में अधिकारियों ने सोशल मीडिया साइट एक्स का इस्तेमाल आलोचकों को ट्रैक करने और उनके दमन के लिए किया है।
वहीं कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में पाया गया कि एलन मस्क द्वारा एक्स को खरीदने के बाद से नफरत भरे भाषण (हेट स्पीच) करीब 50 फीसदी बढ़ गए हैं।
ऐसे में ऑक्सफैम ने असमानता घटाने के लिए ठोस और समयबद्ध राष्ट्रीय योजनाएं बनाने की मांग की है। साथ ही सुपर-रिच पर प्रभावी टैक्स, राजनीति और दौलत के बीच सख्त दीवार, मीडिया की स्वतंत्रता और आम नागरिकों के अधिकारों की मजबूत सुरक्षा की भी वकालत की है।
अमिताभ बेहर कहते हैं, “आर्थिक गरीबी भूख पैदा करती है और राजनैतिक गरीबी गुस्सा।" उनके मुताबिक अगर सरकारें लोगों की जरूरतों जैसे स्वास्थ्य, जलवायु कार्रवाई और न्याय संगत टैक्स जैसे मुद्दों को नहीं सुनेंगी, तो दुनिया पहले से कहीं ज्यादा अस्थिर हो जाएगी।