आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में इस बात को स्वीकार किया गया है कि यदि आदिवासी समुदाय द्वारा सदियों से की जाने वाली प्राकृतिक खेती को अपनाया जाता है तो ग्लोबल साउथ के लिए इसे एक व्यावरिक हरित कृषि मॉडल के रूप में बड़े पैमाने पर लागू किया जा सकता है। यह व्यवस्था स्थानीय रूप से किसी भी प्रकार के हस्ताक्षेपों, कुशल संसाधनों का उपयोग और सामुदायिक स्वामित्व के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है।
सर्वें में कहा गया है कि आदिवासी समुदाय सैकड़ों सालों से पारंपरिक रूप से खेती करते चले आ रहे हैं। आदिवासी गांवों में एक ऐसी कृषि प्रणाली है जो प्राकृति के साथ तालमेल बिठाकर चलती है। इसके लिए आदिवासी वर्षों से चले आ रहे परिस्थितिकी ज्ञान को अपनाते हैं। इसके कारण मिट्टी और परिस्थितिकी तंत्र सदैव स्वास्थ्य बना रह पाता है।
इसके अलावा आदिवासी द्वारा आज भी मिश्रित खेती, फसल चक्र, जल प्रबंधन और स्थानीय संसाधनों का उपयोग किया जाता है। इससे आदिवासी समुदाय के भोजन और पोषण संबंधी तमाम जरूरतें पूरा होती हैं।
सर्वे में कहा गया है कि आदिवासी समुदायों की जीवनशैली में आत्मनिर्भरता सदियों से रही है। इसलिए जलवायु परिवर्तन और लगातार बदलते मौसम के समय पर्यावरण अनुकूलन व शून्य जीवाश्म ईंधन प्रणाली की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। सर्वे में यह स्वीकार किया गया है कि भारत की हरित अर्थव्यवस्था और आदिवासी खेती के तौर तरीके तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए भी एक सुनिश्चित भविष्य की नींव तैयार करने की क्षमता रखते हैं।
सर्वे में कहा गया है कि स्थानीय रूप से उपयुक्त हस्तक्षेपों, कुशल संसाधन उपयोग और सामुदायिक स्वामित्व आदिवासी किसानों द्वारा सामना की जाने वाली संरचनात्मक बाधाओं को दूर करता है। यह स्थिति कई राज्यों दिखाई भी पड़ती है। जैसे स्वदेशी ज्ञान का उपयोग, कम लागत वाली प्रौद्योगिकियों और संस्थागत समर्थन के साथ मिलकर आदिवाासी कृषि को देश के अन्य भागों में पुनर्जीवित किया जा सकता है।
इसके लिए ओडिशा का उदाहरण देना प्रर्याप्त होगा। ओडिशा में 2023 से ग्रामीण आदिवासी किसानों की आजीविका को मजबूत करने की पहल का नेतृत्व राज्य के गजपति जिले में मिट्टी संरक्षण और वाटरशेड विकास विभाग द्वारा किया जा रहा है।
इसके अंर्तगत 55 प्रमुख स्थानों में बारिश के पानी को एकत्रित करना और साल भर सिंचाई के लिए लगभग 200 तालाब निजी खेतों में खोदना शामिल है। इसके अलावा राज्य में एकीकृत खेती प्रणालियों के लिए जागरूकता अभियान चलाना भी शामिल है। इसके अलावा मध्य प्रदेश में गैर सरकारी संगठन और कृषि विज्ञान केंद्रों ने पारंपरिक कृषि जैव विविधता को पुनर्जीवित करने के लिए प्रमुख भूमिका निभाई है।