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अर्थव्यवस्था

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26: पंचायत राज संस्थानों की वित्तीय स्वतंत्रता पर जोर

आर्थिक सर्वेक्षण में पंचायतों के अपने राजस्व स्रोतों को बढ़ाने की सलाह दी गई है

Anil Ashwani Sharma

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में यह स्वीकार कया गया है कि केंद्रीय वित्त आयोग और राज्य वित्त आयोगों से अनुदान प्राप्त करने के बावजूद पंचायत राज संस्थान (पीआरआई) पर्याप्त संसाधनों की कमी के कारण अपनी क्षमता और जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने में असमर्थ रहे हैं।

राजस्व के अपने स्रोतों (ओएसआर) के माध्यम से अधिक वित्तीय स्वतंत्रता पंचायती राज संस्थानों को उनके द्वारा किए जाने वाले खर्च पर अच्छा निर्णय लेने में सक्षम बनाती है, जिससे दक्षता और जवाबदेही में सुधार होता है।

सर्वे में कहा गया है कि ओएसआर में सुधार राजस्व पैदा करने व खर्च के निर्णयों के बीच संबंधों को और मजबूत बनाता है। इससे सेवा वितरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय रूप से दक्षता और जवाबदेही को सुनिश्चित करने को बढ़ावा मिलता है।

कई राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों ने ऐसे नियम स्थापित किए हैं जो पंचायतों को कर, शुल्क और फीस लगाने और वसूलने में सक्षम बनाते हैं। हालांकि अरुणाचल प्रदेश, बिहार, झारखंड, मणिपुर, नागालैंड, सिक्किम, उत्तर प्रदेश, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, दादरा और नगर हवेली व दमन और दीव, लद्दाख और लक्षद्वीप जैसे कई राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में ऐसे प्रावधान नहीं हैं, जो देश भर में स्थानीय शासन को बढ़ाने के लिए नियमों की आवश्यकता को बताता है।

अंडमान और निकोबार में मैचिंग ग्रांट और गोवा में वित्तीय पुरस्कार जैसे प्रोत्साहन के अलावा साझा खनन रॉयल्टी, जिला खनिज कोष (डीएमएफ) और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह, पंचायत राज संस्थानों के राजस्व को और समर्थन देते हैं। इसके अतिरिक्त खनन रॉयल्टी, डीएफएफ और जीएसटी से प्राप्त धन पंचायतों के साथ साझा किया जाता है ताकि वित्तीय संसाधनों को स्थानीय शासन की जरूरतों के साथ जोड़ा जा सके।

सर्वे में कहा गया है कि ग्रामीण आधारभूत संरचनाओं पर किए जाने वाले निवेश का प्रभावी असर स्थानीय स्तर पर लागू की जाने वाली प्रभावशाली योजना, आवंटन और निगरानी पर निर्भर करता है।

भागीदारी बजट और मजबूत स्थानीय शासन समुदायों को परियोजनाओं को प्राथमिकता देने, संसाधनों का कुशलता से उपयोग करने और यह सुनिश्चित करने के लिए सशक्त बनाते हैं कि आधारभूत संरचना स्थानीय जरूरतों के अनुरूप हो। ग्रामीण क्षेत्रों में असली प्रगति केवल ऊपर से नीचे के दृष्टिकोण के बजाय सामुदायिक स्वामित्व से ही होती है। सोच में बदलाव निवासियों की निष्क्रियता को सक्रिय भागीदार में बदल देता है।