सांगू राम के पास अपने जीवन की कुछ ही यादें बची हैं। सत्तर बसंत देख चुके सांगू राम की सबसे स्पष्ट याद 1950 के दशक के आखिरी वर्षों की है। उस दिन उनके पिता परिवार को महानदी के किनारे बसे अपने गांव से जल्दबाजी में बाहर ले गए थे क्योंकि दुधवा बांध का बैकवाटर धीरे-धीरे गांव की ओर बढ़ रहा था और पूरे गांव को निगल रहा था। सांगू को बचपन का वह गांव आज भी याद है जो “घने महुआ और बांस के जंगलों के बीच बसा था।”
अपने गांव से निकलकर कई दिनों तक भटकने और जगह तलाशने के बाद उनके पिता ने 12 किलोमीटर दूर जंगल के भीतर बांस की एक डंडी गाड़ दी। यह उनके नए घर की प्रतीकात्मक घोषणा थी। इस तरह छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में कौहाबाहरा गांव अस्तित्व में आया। महुआ और बांस के जंगलों से घिरा कौहाबाहरा अब 22 परिवारों और 360 लोगों का गांव है। सड़क के दोनों ओर दो सीधी कतारों में बने घर इसकी पहचान हैं। सांगू का परिवार बांस का काम करने वाले और विशेष रूप से कमजोर (पीवीटीजी) माने जाने वाले कमार आदिवासी समुदाय से है। उनकी तीन पीढ़ियां इसी गांव को अपनी दुनिया मानती हैं। सांगू गर्व से कहते हैं, “मैं कभी यहां से बाहर नहीं गया।” फिर एक लंबी सांस लेते हुए जोड़ते हैं, “वैसे भी मैं जाता कहां?”
कौहाबाहरा का इतिहास और अर्थव्यवस्था एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हैं। गांव की अर्थव्यवस्था पूरी तरह प्रकृति पर टिकी है। हर सुबह सांगू नंगे पैर जंगल की ओर निकल पड़ते हैं। कई बार बांस तलाशने के लिए उन्हें चार-पांच किलोमीटर तक पैदल जाना पड़ता है। लौटकर वह बांस का गट्ठर लाते हैं और टोकरियां बुनने बैठ जाते हैं। यही काम उन्होंने पूरी जिंदगी किया है। अब उनके बेटे और पोते भी यही काम करते हैं। मानो उनका पूरा जीवन इसी एक काम से बंधा हुआ है।
“क्या आपने पहले ज्यादा गरीबी देखी है?” इस प्रश्न के जवाब में वह चौंकते हुए हुए प्रश्न करते हैं, “गरीबी?” फिर कुछ देर रुकते हैं, जैसे जवाब तलाश रहे हों। उनके लिए जिंदगी जन्म से ऐसी ही रही है। जब जीवन में बदलाव ही न हो तो बदलाव को मापने का पैमाना भी खत्म हो जाता है। अगर वह अपनी स्थिति को बदलते हुए देखना भी चाहें तो समझ नहीं पाएंगे कि इसकी तुलना किस आधार पर करें।
सप्ताह में एक दिन वह साइकिल से आने वाले उस आदमी का इंतजार करते हैं, जो गांव की हरी-भरी क्षितिज रेखा पर दिखाई देता है। वह आदमी कौहाबाहरा के लोगों की एकमात्र पूंजी का खरीदार है। यह पूंजी है कि बांस काटने की उनकी मेहनत और उससे टोकरियां बनाने का हुनर। दरअसल वह बिचौलिया है, जो इन टोकरियों को साप्ताहिक बाजारों में कहीं अधिक कीमत पर बेचता है। गांव के बहुत से लोगों को तो पता भी नहीं है कि ये बाजार आखिर हैं कहां।
वह आमतौर पर किसी परिवार को चार-पांच टोकरियों के लिए 500 रुपए एडवांस के तौर पर देता है। इसी के साथ सांगू और गांव के दूसरे परिवारों का गांव की नाजुक अर्थव्यवस्था में एक और असुरक्षित चक्र शुरू होता है।
सांगू कहते हैं, “इस सप्ताह मैं केवल दो टोकरियां ही तैयार कर पाऊंगा।” इससे परिवार का “सकल घरेलू उत्पाद” करीब 50 फीसदी घटने वाला है। बाकी दो टोकरियां देने के लिए उन्हें अगले सप्ताह तक काम करना होगा। यह एक तरह से कर्ज चुकाने जैसा है। दिसंबर 2025 में उनके परिवार की कुल कमाई महज 1,000 रुपए थी। गांव में गुजर-बसर की अपनी एक अलग परिभाषा है। गांव की गरीबी जंगल की दूरी से तय होती है। बांस के लगातार घटते भंडार ने अब इस समीकरण को भी उलट दिया है।
पिछले कुछ वर्षों से जंगल में एक तरह की होड़ शुरू हो गई है। पार्वती कमार बताती हैं, “पास में एक नया गांव बस रहा है। पहले से ही कम हो चुके बांस के जंगलों से अब ज्यादा लोग बांस काट रहे हैं। शहर से आने वाले व्यापारी भी जंगल में बांस की नई कोपलों के लिए पहुंच रहे हैं, जिससे भविष्य में बांस के दोबारा उगने पर असर पड़ रहा है।” पार्वती की विधवा मां ने टोकरियां बुनकर ही उन्हें पाला था।
अब बांस तलाशने में ज्यादा समय लग जाता है और टोकरियां बुनने के लिए समय कम बचता है। पार्वती भविष्य का अनुमान लगाती हैं, “मौजूदा स्थिति में हर परिवार महीने में चार टोकरियां ही बुन पाएगा।” इसका मतलब है महीने में 500 रुपए यानी पांच-छह सदस्यों वाले परिवार के लिए करीब 17 रुपए प्रतिदिन की आमदनी। सांगू याद करते हुए कहते हैं, “यहां जिंदगी तो हमेशा ऐसी ही रही है।”
एक महीने से अधिक समय से सांगू का परिवार लगभग चावल के सहारे ही चल रहा है। रसोई में कुछ नहीं है। एक बड़े कटोरे में पानी में डूबे चावल रखे हैं और उसके आसपास सांगू के पोते बैठे हैं जिनके पेट फूले हुए हैं । सरकार की ओर से हर महीने मिलने वाला मुफ्त राशन भले ही पर्याप्त न हो लेकिन इस कटोरे को पूरी तरह खाली होने से बचाता है।
एक महीने से सांगू का परिवार चावल के सहारे ही चल रहा है। रसोई में कुछ नहीं है। एक बड़े कटोरे में पानी में डूबे चावल रखे हैं और आसपास सांगू के पोते बैठे हैं जिनके पेट फूले हुए हैं
गांव में किसी को भूख से हुई मौत याद नहीं है। लेकिन पार्वती कहती हैं, “हम हमेशा भूख से तड़पते जरूर रहे हैं।” पार्वती ने प्राथमिक स्कूल की पढ़ाई बीच में छोड़ दी थी ताकि मां के साथ बांस इकट्ठा करने में मदद कर सकें। वह स्वीकार करती हैं, “मुझे भोजन और पढ़ाई में से किसी एक को चुनना था।”
फरवरी आते-आते कौहाबाहरा में उम्मीद की एक हल्की किरण फूटती दिखाई देती है। ग्रामीणों के शब्दों में कहें तो इसी समय “जंगल फिर सांस लेने लगता है।” महुआ के पेड़ों पर फूल आना शुरू हो जाता है और यह सिलसिला अप्रैल की शुरुआत तक चलता है। गांव की रोजमर्रा की जिंदगी बदल जाती है। सभी लोग जंगल में जाकर गिरे हुए महुआ फूल इकट्ठा करते हैं। यही एक ऐसा वन उत्पाद है जिसे गांव के लगभग सभी परिवार पास के बाजार में ले जाते हैं। वहां वे इसे तेल, नमक, तंबाकू, कपड़े और साल भर की दूसरी जरूरतों के बदले बेचते या आदान-प्रदान करते हैं। महुआ संकट के समय भोजन का विकल्प भी बन जाता है। पार्वती के अनुसार, “अगर महुआ भरपूर नहीं खिला तो हमारा बचना मुश्किल है।” इसके बाद जून में मॉनसून आता है और सबसे कठिन दौर शुरू हो जाता है। सभी लोग धान की खेती में लग जाते हैं और आमदनी के दूसरे साधन खत्म हो जाते हैं।
बांस की टोकरी बुनकर लौटे सांगू के पोते धर्मू राम नेताम कहते हैं, “मेरे खेत से तीन-चार महीने का अनाज निकलता है। अगर फसल खराब हो गई तो हमें सरकारी राशन पर ही गुजारा करना पड़ेगा, चाहे वह कितना भी अपर्याप्त क्यों न हो।”
सांगू का जीवन भारत में गरीबी के उस भूगोल की कहानी कहता है, जो दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने के बावजूद बदलने का नाम नहीं लेता।
धमतरी कभी रायपुर जिले का हिस्सा था। 1951 से ही इसे देश के सबसे गरीब इलाकों में गिना जाता रहा है। पचास का दशक ही वह समय था जब देश में पहली पंचवर्षीय योजना लागू की गई थी। तब से सांगू सरकारी रिकॉर्ड में गरीब हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो वह नवजात गणराज्य के गरीबों की पहली पीढ़ी का हिस्सा है। करीब 25 साल पहले उनकी श्रेणी बदलकर “अंत्योदय” कर दी गई यानी ऐसे बेहद गरीब लोग जिनका जीवन भूख के कारण गंभीर जोखिम में है।
भारत ने दिसंबर साल 2000 में अंत्योदय अन्न योजना (एएवाई) शुरू की थी। इससे पहले हुए एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण में सामने आया था कि आबादी का करीब 5 फीसदी हिस्सा ऐसा था, जो दिन में दो वक्त का भरपेट भोजन किए बिना सोता था। इस योजना का लक्ष्य गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) रहने वाले सांगू जैसे करीब एक करोड़ परिवारों तक पहुंचना था। उन्हें हर महीने 35 किलो सब्सिडी वाला राशन दिया जाना था, जो अब मुफ्त दिया जाता है। हालांकि इस योजना ने सांगू की माली हालत सुधारने के बजाय उसे और खराब कर दिया। वह गरीब से और गरीब हो गए। भूख को उनके अस्तित्व के लिए खतरे के रूप में दर्ज कर दिया गया।
गरीब पैदा हुए सांगू ने गरीबी और भूख के साथ जीवन बिताया और यही स्थिति अगली पीढ़ियों को भी विरासत में मिली। उनके बेटे और पोते भी सरकारी रिकॉर्ड में गरीब और “अंत्योदय” हैं। गांव में एक भी ऐसा परिवार नहीं है जो गरीबी रेखा से ऊपर हो। धर्मू कहते हैं, “यहां जन्म के साथ ही गरीबी निश्चित है। बाहरी दुनिया हमें इसी तरह पहचानती है। हम इसी गरीबी में जीते हैं और इसी में मरते हैं।”
उपलब्ध रिकॉर्ड बताते हैं कि राजाओं के शासन से लेकर औपनिवेशिक दौर और आजादी के बाद के दशकों तक भारत का गरीबी का भूगोल काफी हद तक एक जैसा रहा है। जब भी सरकार ने अत्यधिक गरीबी वाले जिलों की पहचान करने की कोशिश की, वही नाम बार-बार सामने आए। ऐसा लगता है जैसे किसी अज्ञात कारण से इस भूगोल को हमेशा गरीब बने रहने के लिए अभिशप्त कर दिया गया हो।
भारत ने साल 1997 में देश के 100 सबसे गरीब जिलों की पहचान की। वर्ष 2003 में मजदूरी कार्यक्रमों को बेहतर तरीके से लक्षित करने और गंभीर आर्थिक संकट को कम करने के लिए फिर एक विस्तृत कवायद की गई और 150 सबसे पिछड़े जिलों की सूची बनाई गई। दोनों सूचियों में ज्यादातर वही जिले शामिल थे। ये जिले मुख्य रूप से मध्य और पूर्वी भारत में केंद्रित थे यानी ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र के कुछ हिस्से, बिहार और झारखंड के जिले इसमें शामिल थे। आजादी से पहले भी चाहे ये जिले ब्रिटिश शासन के अधीन रहे हों या रियासतों के, ये जिले तब भी सबसे गरीब इलाकों में गिने जाते थे। यानी शासन कोई भी रहा हो, जनता तब भी गरीब थी और आज भी गरीब ही है।
1997 में पहचाने गए 100 सबसे गरीब जिलों को बाद में विभाजित कर करीब 200 जिले बना दिए गए। लेकिन ये आज भी देश के सबसे गरीब क्षेत्र हैं। अब उन्हें एक अलग “आकांक्षी जिले” का नाम दिया गया है मानो इससे गरीबी के ऐतिहासिक कलंक को धोया जा सके।
जनवरी 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इनमें सबसे पिछड़े 112 जिलों की स्थिति बदलने के उद्देश्य से “आकांक्षी जिला कार्यक्रम” शुरू किया।
अगर स्वतंत्र भारत महात्मा गांधी के बताए उस “अंतिम व्यक्ति” या “अंत्योदय” को तलाशे जिसकी कसौटी पर विकास को परखा जाना चाहिए तो वह इसी भूगोल में मिलेगा। और अकेला नहीं, बड़ी संख्या में मिलेगा। यहां गरीबी धर्मनिरपेक्ष और स्थायी रूप से मौजूद है।
फनस ने स्थानीय बोली में उस “अजनबी” (प्रधानमंत्री) से कहा था, “मैंने खाना खरीदने के लिए 14 साल की ननद को 40 रुपए में बेच दिया। अगर ऐसा नहीं करती तो मैं मर जाती”
निर्वाचित सरकारों ने इसे मान्यता दी है। 1952 से अब तक गरीबी उन्मूलन और विकास के 2,000 से अधिक कार्यक्रम शुरू किए जा चुके हैं, जिनका मुख्य लक्ष्य यही भौगोलिक क्षेत्र रहा है। हर जिले में औसतन 195 ऐसे कार्यक्रम लागू किए गए या चल रहे हैं, जिनमें गरीबी उन्मूलन का कोई न कोई घटक शामिल है। इन जिलों के इतिहास में विकास कार्यक्रमों की संख्या स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों से ज्यादा है। यहां के लोग ककहरा से ज्यादा इन विकास योजनाओं के संक्षिप्त अंग्रेजी नाम याद रखते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा आकांक्षी जिलों के लिए नई विकास योजना की घोषणा से चार महीने पहले 25 सितंबर 2017 को भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में उन्होंने वादा किया था कि “2022 तक गरीबी खत्म कर दी जाएगी।” यह वादा उनके “न्यू इंडिया” के विजन का मुख्य हिस्सा था, जिसे 2022 में आजादी के 75वें वर्ष में पूरा करना था। इस घोषणा की व्यापक चर्चा हुई, क्योंकि भारत दुनिया में सबसे बड़ी गरीब आबादी वाले देशों में था और वह 2030 तक गरीबी खत्म करने के सतत विकास लक्ष्य-1 (एसडीजी-1) की वैश्विक समयसीमा से आठ साल पहले यह लक्ष्य हासिल करने का दावा कर रहा था।
लेकिन गरीबी के अपने गणराज्य में बहुत कम लोगों ने किसी प्रधानमंत्री से बात की है या किसी प्रधानमंत्री को अपनी दहलीज पर देखा है। फनस पुंजी को यह दुर्लभ अनुभव 27 जुलाई 1985 की दोपहर मिला था। 74 वर्ष की उम्र में चार दशक बाद भी वह मुलाकात उनके जेहन में ताजा हैं। मानो उनके जीवन में इसके अलावा बताने के लिए कुछ बचा ही न हो। जब वह उस बातचीत को याद करती हैं तो आंखें बंद कर लेती हैं और चेहरा तनाव से भर जाता है। वह उस दिन की बातचीत लगभग मशीनी ढंग से दोहराती हैं।
उस दिन उन्होंने एक “अजनबी” से करीब 100 शब्दों में बात की थी। उस अजनबी के साथ 100 से अधिक लोगों का काफिला था। दोनों एक-दूसरे की भाषा नहीं समझते थे। एक अनुवादक ने उनकी बातचीत को बाहर की दुनिया तक पहुंचाया। यह बातचीत भारत और खासकर गरीबी के अपने गणराज्य के लिए एक शोकगीत जैसी बन गई।
फनस ने स्थानीय बोली में उस “अजनबी” से कहा था, “मैंने खाना खरीदने के लिए अपनी 14 साल की ननद को 40 रुपए में बेच दिया था। अगर ऐसा नहीं करती तो मैं मर जाती।”
ननद को खरीदने वाले व्यक्ति ने उसे एक नई साड़ी भी दी थी। बातचीत के दौरान फनस वही साड़ी पहने हुई थीं। वह “अजनबी” थे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी जो अपनी पत्नी सोनिया गांधी के साथ ओडिशा के तत्कालीन कालाहांडी जिले के अमलापाली गांव में फनस के घर पहुंचे थे। यह अब नुआपाड़ा जिले का हिस्सा है। राजीव गांधी वहां घटित उस घटना को अपनी आंखों से देखने पहुंचे थे, जिसे परिवार के किसी सदस्य को भूख के कारण बेचने का पहला दर्ज मामला बताया गया था।
फनस की बात सुनते हुए सोनिया गांधी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री जानकी बल्लभ पटनायक से मिट्टी के बर्तन में रखी बासी पत्तेदार सब्जी देखने को कहा। फनस ने अधिकारियों द्वारा पिछली रात दिए गए चावल की बोरी की ओर इशारा किया। काफी लंबे समय बाद वह अनाज देख रही थीं। उन्होंने कहा था, “हम कई दिनों तक सिरेली खाते हैं। यह एक जंगली घास है, जिसे संकट के समय खाया जाता है और जो मेरे घर के पीछे भी मिल जाती है। हम दूसरों से मांगकर लाए चावल के पानी पर भी गुजारा करते हैं।”
1984-85 में भीषण सूखे ने जिले को तबाह कर दिया था। हजारों लोग भुखमरी की कगार पर पहुंच गए थे। रोजगार नहीं था। पूरे जिले में लोग भोजन की तलाश में सड़कों पर निकल पड़े थे और बदले में अपने बर्तन व दूसरी चीजें देने को मजबूर थे। कई लोग मारे गए। कई कभी अपने गांव नहीं लौटे। माना गया कि या तो वे रास्ते में मर गए या दूर-दराज के इलाकों में चले गए जहां से लौटना मुश्किल था। फनस भी पड़ोसी गांवों में भोजन तलाश रही थीं। उनका बेटा और बेटी कई-कई दिनों तक घर में बिना भोजन के रहे। मार्च 1985 में खबर आई कि फनस ने नाबालिग लड़की को बेच दिया है।
स्थानीय लोगों के मुताबिक, राजीव गांधी ने उनसे पूछा, “तुमने अपनी छोटी बेटी को क्यों नहीं बेच दिया?” फनस ने जवाब दिया, “बच्ची को कौन खरीदता?” आंखों से कमजोर एक शख्स ने फनस की ननद को अपने साथ रहने के लिए खरीदा था और बाद में उससे औपचारिक रूप से विवाह कर लिया। फनस ने प्रधानमंत्री से कहा था, “घर का आदमी कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। अपने बच्चों की देखभाल करते हुए एक और पेट को पालना संभव नहीं था।” प्रधानमंत्री के सामने कहे गए ये कुछ आखिरी शब्द थे। इस भयावह गरीबी को प्रत्यक्ष देखने के बाद राजीव गांधी ने विकास के संदर्भ में एक चर्चित टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था, दिल्ली से भेजे गए एक रुपए में से 15 पैसे भी लोगों तक नहीं पहुंचते।”
फरवरी 2022 में यानी वह साल जब प्रधानमंत्री मोदी के वादे के मुताबिक गरीबी खत्म हो जानी थी, फनस ने कहा था, “मेरी पूरी जिंदगी उसी यात्रा के इर्द-गिर्द है।” आज फनस अपने बेटे, बहू और पोते-पोतियों के साथ राज्य सरकार की मदद से बने एक कमरे के घर में रहती हैं। उनकी अगली दो पीढ़ियां उस बातचीत को सुनते हुए बड़ी हुई हैं जो उन्होंने भारत के एक प्रधानमंत्री से की थी।
वह भारत की गरीबी का पर्याय बन चुकी हैं और कालाहांडी सरकार के लिए गरीबी उन्मूलन की प्रगति मापने का एक भौगोलिक पैमाना। अगर फनस गरीबी से बाहर नहीं निकल रही हैं तो इसका अर्थ है कि यह क्षेत्र भी नहीं निकल रहा। अगर कालाहांडी में भुखमरी और संकट की खबरें आती हैं तो इसका मतलब है कि देश अब भी उसी स्थिति में फंसा है। लेकिन फनस की तरह अविभाजित कालाहांडी जिला भी अभाव की पहचान से मुक्त नहीं हो सका। 1951 के बाद से गरीबी के लगभग सभी आकलनों में इसे सबसे गरीब जिलों में शामिल किया गया है। प्रधानमंत्री की यात्रा और भूख से हुई सैकड़ों मौतों के एक दशक बाद 1996 में केंद्र सरकार ने कालाहांडी को भारत के उन 41 जिलों में शामिल किया, जिन्हें “भुखमरी की आशंका वाले” जिले कहा गया था। आज भी वह इसी श्रेणी में है।
अविभाजित कालाहांडी से अलग होकर बने नुआपाड़ा की गिनती भी देश के सबसे गरीब जिलों में होती है। यहां ज्यादातर लोगों की आजीविका कभी जंगल और खेती पर निर्भर थी। अब ये दोनों ही जीवन-निर्वाह के भरोसेमंद साधन नहीं रह गए हैं। भोजन और जीवन चलाने के लिए पलायन अब एक मौसमी हकीकत बन चुका है। मार्च 2020 में जब कोविड-19 महामारी के प्रसार को रोकने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन लगाया गया, तब जिला प्रशासन ने 70,000 असंगठित कामगारों के घर लौटने का रिकॉर्ड दर्ज किया। हर साल नुआपाड़ा से 80,000 से एक लाख लोग काम की तलाश में बाहर जाते हैं।
एक छोटे-से खेत में कितने मजदूरों को रोजगार मिल सकता है? संकट के समय इसका जवाब अक्सर बंधुआ मजदूरी रहा है। जिले में ऐसे कई मामले हैं। अलग-अलग समय पर फनस और उनका बेटा भी बंधुआ मजूदरी में शामिल रहे हैं। 2020 की नुआपाड़ा जिला हैंडबुक 2011 की जनगणना के आंकड़ों के जरिए जिले के रोजगार संकट की एक झलक देती है। 2011 में जिले में किसानों की तुलना में कृषि मजदूरों की संख्या अधिक थी। इस साल कुल 3 लाख कामगारों में 94,000 किसान थे, जबकि 1.4 लाख कृषि मजदूर थे। खरियार विकासखंड में जहां फनस का गांव है, वहां कृषि मजदूरों की संख्या किसानों से दोगुनी थी। पहले पलायन संकट से बचने का रास्ता था। अब यह अधिक भरोसेमंद अवसर में बदल गया है। कभी सूखे के समय काम की तलाश में फनस गांव से बाहर गई थीं। अब उनका परिवार नियमित रूप से ऐसा करता है। जिले के हजारों लोगों की यही कहानी है।
फनस के पास तीन एकड़ यानी एक हेक्टेयर से कुछ अधिक जमीन है। लेकिन सूखे ने खेती को लगभग असंभव बना दिया है। वह कहती हैं, “मुझे याद है कि मैं चावल के बदले भूती (मजदूरी) करती रही हूं।” 1990 तक उनका बेटा जगबंधु पुंजी भी काम की तलाश में पलायन करने लगा। तब वह 15 वर्ष का था। पहले वह अपनी मां के साथ आसपास के गांवों में जाता था और बाद में छत्तीसगढ़ जाने लगा। उनकी दो बेटियों ने भी मां की मदद के लिए खेतिहर मजदूर के रूप में काम किया। वे महीनों गांव से बाहर रहती थीं।
यह एक अंतहीन दौड़ थी। फनस और उनका परिवार हर दिन सिर्फ इतना कमाने के लिए काम करता था कि खाना खा सके। आपात स्थिति में उन्हें निजी स्रोतों से कर्ज लेना पड़ता था और यही उन्हें कर्ज के दुष्चक्र में धकेल देता। प्रधानमंत्री की यात्रा के करीब एक दशक बाद 1995 में सरकार ने फनस को पास के आंगनवाड़ी केंद्र में खाना बनाने का काम संविदा पर दिया। अब उन्हें हर महीने 3,500 रुपए मानदेय मिलता है। इसके बावजूद पिछली तीन पीढ़ियों में फनस का परिवार गरीबी की और गहरी दलदल में चला गया। उनका बेटा और पोते-पोतियां भी उस कर्ज के जाल में फंसे हैं, जिसकी शुरुआत तब हुई थी जब जगबंधु ने कुछ समय के लिए खेती करने की कोशिश की थी। अब उनके सामने अपनी एकमात्र संपत्ति खोने का खतरा है। यह संपत्ति वह जमीन है जिस पर वे रहते हैं।
2004 में जगबंधु ने पलायन रोककर तीन एकड़ जमीन पर खेती करने का फैसला किया। वह कहते हैं, “छत्तीसगढ़ में एक खेत पर बंधुआ मजदूरी करते हुए मैंने खेती का अनुभव हासिल किया। आजाद होने का एहसास बहुत बड़ा था। मां की नौकरी से थोड़ी सुरक्षा मिली। सरकार से मिलने वाला सस्ता चावल किसी तरह यह सुनिश्चित करता है कि हमारे पास कुछ दिनों का खाना रहे। लेकिन यह भी हर दिन भूख के साथ लिए जा रहे उन जोखिमों में से एक था।”
शुरुआत में उन्होंने घर के लिए धान और बेचने के लिए सब्जियां उगाईं। लेकिन बार-बार पड़ने वाले सूखे और बढ़ते मरुस्थलीकरण ने खेती से लाभ कमाना असंभव बना दिया। सरकारी योजना के तहत उन्हें खेत में कुआं भी मिला, लेकिन कुछ ही महीनों में वह सूख गया। वह कहते हैं, “खेती में लगने वाली चीजों की लागत इतनी ज्यादा थी कि मैं वहन नहीं कर सकता था। मुझे अपनी आय बढ़ाने के लिए फिर से स्थानीय स्तर पर दिहाड़ी मजदूरी के लिए पलायन करना पड़ा।”
बच्चों को खेलते हुए देखकर जगबंधु को भूख के वे दिन याद आते हैं। फनस के 3,500 रुपए मासिक मानदेय और मजदूरी से होने वाली आमदनी को मिलाकर पांच सदस्यों का परिवार महीने में 4,750 रुपए पर गुजारा करता है। यानी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन करीब 31 रुपए पर गुजर-बसर कर रहा है। यह 2011-12 की कीमतों के आधार पर तय ग्रामीण गरीबी रेखा से एक रुपए कम है। इसे अक्सर “भुखमरी की रेखा” भी कहा जाता है। परिवार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत हर महीने 50 किलो सब्सिडी वाला (अब मुफ्त) चावल मिलता है। जगबंधु कहते हैं, “जरूरत पूरी करने के लिए हर महीने 25 किलो और चावल खरीदना पड़ता है, जिसकी कीमत 750 रुपए है। हम दाल और सब्जियों की मात्रा कम करके ही किसी तरह गुजारा करते हैं।”
उनके दोनों बच्चे पहले ही कर्ज का एक असहनीय बोझ विरासत में पा चुके हैं। अगर सरकार ने सब्सिडी वाला चावल देना बंद कर दिया तो फनस और उनके परिवार पर भुखमरी का संकट मंडराने लगेगा। यही कालाहांडी की कहानी है जहां राहत उपायों ने संकट को कुछ हद तक कम किया है, लेकिन गरीबी से मुक्ति अभी भी बहुत दूर है। इतनी दूर कि लगभग असंभव प्रतीत होती है। ठीक उसी तरह जैसे गरीबी खत्म करने का वह वादा।
कालाहांडी-बलांगीर-कोरापुट को गरीबी की त्रयी या केबीके क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है। यह अत्यधिक गरीबी का एक भौगोलिक प्रतीक है। आपस में जुड़े आठ जिलों वाला यह क्षेत्र ओडिशा के 30 फीसदी से अधिक हिस्से में फैला है और इसमें 12,000 से ज्यादा गांव हैं। यहां गरीबी भूगोल और इतिहास दोनों में गहराई से समाई हुई है। इस क्षेत्र के इतिहास को देखें तो इसकी दो तस्वीरें दिखाई देती है। घने जंगलों वाला यह इलाका सालाना करीब 1,400 मिलीमीटर बारिश पाता है। यहां 50 से अधिक नदियां हैं, जिनमें साल भर पानी बहता है और कई बार बर्फबारी जैसी घटनाएं भी दर्ज होती हैं। ब्रिटिश भारत के सेंट्रल प्रोविंसेज में इसे “चावल का कटोरा” कहा जाता था।
लेकिन पिछले 125 वर्षों में 100 साल यह क्षेत्र सूखाग्रस्त रहा है। 10 अकालों ने यहां भयावह विनाश की अमिट छाप छोड़ी है और 20 गंभीर बाढ़ों ने सैकड़ों गांवों को तबाह किया है। 1956 से 2005 के बीच 10,000 से अधिक लोगों की भुखमरी से मौत दर्ज की गई है। इसके बाद बड़े पैमाने पर लोगों ने अपने घर छोड़े और ऐसी जगहों की ओर कूच किया जहां कोई निश्चित ठिकाना नहीं था।
आपदाएं यहां नाम बदलकर-बदलकर कई रूपों में सामने आईं मानो वे विनाशकारी सूखे और अकाल की स्मृति को बनाए रखना चाहती हैं। इस क्षेत्र में कई लोगों के नाम 1899, 1919-20 या 1965-66 के विनाशकारी सूखे या अकाल की याद दिलाते हैं। केबीके क्षेत्र में लोग अक्सर अपनी पहचान इस तरह बताते हैं, “मैं एक सुखबासी हूं।” सुखबासी का शाब्दिक अर्थ है सुख से रहने वाला व्यक्ति। लेकिन यहां इस शब्द में विनाशकारी सूखे और अकाल का पूरा इतिहास समाया हुआ है। इन आपदाओं ने कभी “धान का कटोरा” कहे जाने वाले इस क्षेत्र के किसानों को भूमिहीन मजदूरों में बदल दिया। इसलिए जब कोई खुद को सुखबासी कहता है तो उसका अर्थ होता है, “अब मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा है।”
केबीके सुखबासियों की जगह है। यानी उन भूमिहीन मजदूरों की स्थली है जो संपन्न पारिस्थितिकी-अर्थव्यवस्था के ढहने से अनाथ हुए हैं। यहां से हर साल करीब सात लाख लोग पलायन करते हैं। वे आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल जैसे दूर-दराज के राज्यों में काम की तलाश में जाते हैं। देश के सबसे बड़े मौसमी पलायनों में से एक माना जाने वाला यह सिलसिला आम तौर पर नवंबर में शुरू होता है। मॉनसून के ओडिशा पहुंचने के साथ मई-जून में ये मजदूर वापस लौटते हैं और खेती में लग जाते हैं। एक ऐसी खेती जिसे वे अभिशाप मान चुके हैं। समय के साथ सुखबासियों से एक और वर्ग पैदा हुआ है जिसे दादन यानी बंधुआ मजदूर कहा जाता है।
इस गणतंत्र दिवस पर बलांगीर के डांगाबांजी गांव में राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए बहुत कम लोग मौजूद थे। गांव के 141 परिवारों में से लगभग आधे पहले ही पलायन कर चुके थे। बाकी लोग भी मजदूर ठेकेदारों के साथ पलायन की जगह तलाशने में व्यस्त थे। कई बार गांव में मौजूद लोगों से अधिक ठेकेदारों की संख्या होती है। गांव के संस्थापक मुनी माझी के परपोते सना गौंटिया माझी कहते हैं, “हर परिवार में एक दादन है और हर दादन अपने साथ अगली पीढ़ी के लिए चुकाए जाने वाला कर्ज लेकर आता है।”
नई सदी की शुरुआत जनवरी 2000 में मुनी के बेटे तिरेस्कर माझी कई किलोमीटर पैदल चलकर नजदीकी रेलवे स्टेशन पहुंचे। वहां से वह तत्कालीन आंध्र प्रदेश के सिकंदराबाद (अब तेलंगाना) दादन मजदूर के रूप में काम करने गए। वह साल 1899 के भीषण अकाल के 100 वर्ष पूरे होने का साल था। उस अकाल में जिले में हजारों लोग भूख से मारे गए थे और लगभग सभी गांव खाली हो गए थे।
जनगणना के रिकॉर्ड बताते हैं कि उस वक्त जिले की आबादी को आंशिक रूप से ही उबरने में पांच साल लगे थे। 1899 के उस अकाल को छप्पनिया अकाल के नाम से भी जाना जाता है। अनुमान है कि पूरे भारत में इस अकाल ने 90 लाख लोगों की जान ली थी। तिरेस्कर भी दो साल तक चले ऐसे ही एक अन्य भीषण सूखे के शिकार हुए थे। उन्होंने शादी के लिए मजदूर ठेकेदार से 2,000 रुपए का एडवांस लिया था, लेकिन फसल पूरी तरह बर्बाद हो जाने के कारण कर्ज नहीं चुका सके। परिवार का गुजारा चलाने के लिए उन्होंने उसी ठेकेदार से एक बार और एडवांस ले लिया। इसके बाद उनका परिवार कर्ज पर ही निर्भर होता चला गया और पीढ़ी दर पीढ़ी खुद को कर्ज के बदले गिरवी रखने की स्थिति में पहुंच गया।
दादन व्यवस्था की जड़ें 17वीं और 18वीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी के कपड़ा व्यापार तक जाती हैं। यह शब्द फारसी के “दादनी” शब्द से निकला है, जिसका अर्थ है अग्रिम भुगतान यानी एडवांस पेमेंट। इस व्यवस्था में शामिल भारतीय और यूरोपीय व्यापारी “दादानदार” कहलाते थे, अग्रिम भुगतान “दादन” और इसे लेने वाले “दादनी” कहलाते थे। ओडिशा ने इस व्यवस्था को खत्म करने के लिए 1975 में ओडिशा दादन श्रम (नियंत्रण और विनियमन) अधिनियम भी बनाया था। इसमें ऐसे श्रमिकों की व्यवस्था को नियंत्रित किया गया था, जिन्हें पलायन से पहले अग्रिम राशि दी जाती थी।
लेकिन आज भी यह प्रथा मुख्य रूप से केबीके क्षेत्र तक सीमित है और ऐसी अर्थव्यवस्था में बदल गई है जिसमें श्रम को पीढ़ी दर पीढ़ी गिरवी रखा जाता है। लोग शादी, त्योहार, इलाज, अंतिम संस्कार और यहां तक कि पुराने कर्ज चुकाने के लिए भी मजदूर ठेकेदारों से अग्रिम राशि लेते हैं। यानी लगभग हर ऐसी जरूरत के लिए जिसके लिए नकदी चाहिए। बदले में उन्हें दादन मजदूर के रूप में बाहर भेज दिया जाता है।
स्थानीय निवासी सदानंद धरुआ कहते हैं, “अर्थव्यवस्था बदल गई है। दादन ने हमारी जिंदगी के सभी पुराने आजीविका के साधनों की जगह ले ली है।” पिछले वर्षों में गांव ने आजीविका के अपने ज्यादातर स्रोत खो दिए हैं। इनमें खेती, वन उपज का कारोबार, जलावन लकड़ी की बिक्री और यहां तक कि सार्वजनिक मजदूरी कार्यक्रमों में मिलने वाला रोजगार भी शामिल है। इनकी जगह “अग्रिम मजदूरी” ने ले ली है। वह कहते हैं, “जब तक लोग काम के लिए पलायन करते हैं, तब तक वे अपनी मजदूरी पहले ही खर्च कर चुके होते हैं।”
डांगाबांजी में एक अनोखा “प्रवासी रजिस्टर” है। यह 19वीं और 20वीं सदी के शुरुआती वर्षों में गुलामी खत्म होने के बाद विदेशों की ओर ले जाए गए अनुबंधित मजदूरों के बंदरगाह रजिस्टरों की याद दिलाता है। इस रजिस्टर में पलायन करने वाले लोगों और मजदूर ठेकेदारों से लिए गए उनके अग्रिम की जानकारी दर्ज होती है। इसमें गांव लौटने की अनुमानित तारीख का एक कॉलम भी है। यह रजिस्टर गांव की मजदूर अर्थव्यवस्था, कर्ज और संकट का लेखा-जोखा अथवा बही खाता है। इसमें कोई “लाभ” नहीं दिखता। सिर्फ बढ़ता कर्ज दिखाई देता है और उस बंधुआ मजदूरी का जीवनभर का बोझ जिसे लोगों को चुकाना होता है। 2024 में 62 लोग गांव से बाहर गए और उन्होंने कुल 21.70 लाख रुपए का एडवांस लिया। इनमें से 16 लोग जनवरी 2026 तक गांव लौटकर नहीं आए थे।
जिले में मजदूर पलायन पर नजर रखने वाले कार्यकर्ता मुरली चरण दास कहते हैं, “रजिस्टर यह नहीं बताता कि अग्रिम राशि पूरी तरह चुकाने के लिए लोगों को कितने महीनों तक काम करना होगा। मुझे लगता है कि यह गांव कई वर्षों के लिए पूरी तरह से गिरवी रखा जा चुका है।” लोग बिना कमाई के काम करते रहते हैं, क्योंकि उनकी मजदूरी पहले ही एडवांस के रूप में खर्च हो चुकी होती है। मुरली इसे “मजदूरी चोरी” कहते हैं।
करीब 100 साल पहले जब डांगाबांजी के संस्थापक मुनी माझी यहां पहुंचे थे तो जंगल ही इस जगह का आकर्षण था। मुनी के परपोते सना गौंटिया कहते हैं, “हर पेड़ हमारी आजीविका का स्रोत है। वह इसे अच्छे से समझते थे।” लेकिन जब जंगल खत्म हो जाएं तो क्या होगा? सना संक्षेप में जवाब देते हैं, “समृद्धि की जगह दादन ले लेता है।” तीन पीढ़ियों में गांव ने किसी को गरीबी रेखा से बाहर आते नहीं देखा या वहां इतना लंबा टिकते नहीं देखा कि गरीबी रेखा मुक्त अगली पीढ़ी की बुनियाद रखी जा सके।
गरीबी के अपने गणराज्य में गरीबी का प्रभाव अब हैरान नहीं करता, बल्कि यहां और ज्यादा गहरा एवं खतरनाक आकार लेता दिखाई दे रहा है। सांगू, फनस और सना की जिंदगी बताती है कि कुछ भौगोलिक क्षेत्रों में बड़ी आबादी के लिए गरीबी वंशानुगत होती जा रही है। कुछ वर्ष पहले शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों के अंतरराष्ट्रीय संगठन क्रोनिक पावर्टी रिसर्च सेंटर (सीपीआरसी) ने एक दुर्लभ अध्ययन के निष्कर्ष प्रकाशित किए। इसमें छह राज्यों-ओडिशा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार और तेलंगाना के 3,000 परिवारों का 30 वर्षों तक (1968-99) अध्ययन किया गया। इन राज्यों में देश के सबसे गरीब जिले शामिल हैं, जिनमें बलांगीर, नुआपाड़ा और बस्तर क्षेत्र भी हैं। अध्ययन ने यह समझने की कोशिश की कि गरीबी के कारण क्या हैं, लोग इसमें फंसे क्यों रहते हैं और किन परिस्थितियों में इससे बाहर निकल पाते हैं।
अर्थशास्त्री आशा कपूर मेहता ने इस अध्ययन की अगुवाई की। उनके मुताबिक, यह सर्वेक्षण “दो भारत” की तस्वीर सामने लाता है। एक भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, जबकि दूसरा लगातार गरीब बना हुआ है। वह कहती हैं कि यह विस्तृत अध्ययन उन दो सवालों के जवाब देता है, जो भारत के गरीब भूभाग को देखते हुए उठते हैं। ये दो सवाल हैं, “कुछ लोग लंबे समय तक गरीब क्यों बने रहते हैं और गरीब हमेशा गरीब क्यों बने रहते हैं?” उनके मुताबिक, सबसे गरीब जिलों में गरीबों की एक नई श्रेणी उभर रही है जिसे दीर्घकालिक गरीब कहा जाता है। इनकी गरीबी खत्म करना मुश्किल है। लेकिन वह अलग-अलग रूपों में सामने आ सकती है।
दीर्घकालिक गरीब वे लोग, परिवार और सामाजिक समूह हैं जो अपने जीवन की लंबी और महत्वपूर्ण अवधि तक गरीब रहते हैं और जिनके परिवार और बच्चे भी इस स्थायी स्थिति को विरासत में पा सकते हैं। दीर्घकालिक गरीबी परिवर्तनशील है। बड़ी संख्या में लोग इससे बाहर निकलते भी हैं और इसमें शामिल भी होते हैं। हालांकि इससे पूरी तरह बाहर निकलना बेहद मुश्किल हो सकता है। सीपीआरसी के अनुसार, गरीब आबादी में करीब आधी हिससेदारी दीर्घकालिक गरीबों का है। जो लोग गरीबी रेखा से ऊपर उठ चुके थे, उनका दोबारा गरीबी में लौटना दीर्घकालिक गरीबी का सबसे महत्वपूर्ण कारण है। अध्ययन के मुताबिक, ज्यादातर दीर्घकालिक गरीब प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध इलाकों खासकर जंगलों में रहते हैं। इन संसाधनों पर उनकी निर्भरता बहुत अधिक है।
गरीबी में लंबे समय तक रहने के कारण उनमें अचानक आने वाले झटकों से निपटने की क्षमता भी कम होती है। प्राकृतिक आपदा हो, स्वास्थ्य पर अचानक आया खर्च हो या ऐसी सरकारी नीति जिससे उनकी आजीविका प्रभावित हो, हर झटका गरीब व्यक्ति को दीर्घकालिक गरीबी की ओर तेजी से धकेल देता है।
आदिवासी अथवा वन क्षेत्रों या नष्ट हो चुके वन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के हमेशा गरीब बने रहने की आशंका होती है। रिपोर्ट कहती है, “वन क्षेत्रों में कृषि या प्राकृतिक परिस्थितियों की उतनी समस्या नहीं है, जितनी वहां उपलब्ध संसाधनों तक गरीबों की पहुंच, उनकी मानवीय पूंजी और श्रम बाजार में उनके शामिल होने के तरीके की है।” आशा कपूर मेहता सर्वेक्षण के निष्कर्षों के आधार पर पक्के तौर पर मानती हैं, “जो लोग दीर्घकालिक गरीबी में हैं, वे गरीबी अगली पीढ़ी को सौंप सकते हैं।”
गरीब परिवारों में जन्मे बच्चे गरीबी के पीढ़ीगत हस्तांतरण का सामना करते हैं। कह सकते हैं कि भारत के 200 से अधिक सबसे गरीब जिलों में गरीबों की नई पीढ़ी एक अंतहीन चक्र में पैदा हो रही है। आने वाली और नई पीढ़ियों के लिए गरीबी और विकराल हो रही है। नई पीढ़ी के पास जमीन, जंगल और पानी जैसे आजीविका के संसाधनों तक या तो पहुंच नहीं है या बहुत सीमित पहुंच है। अगर जाति और धर्म दो ऐसे वंशानुगत बोझ हैं, जो व्यक्ति को जन्म के साथ मिलते हैं, तो उनके लिए गरीबी तीसरा बोझ बनती जा रही है, खासकर उन लोगों के लिए जो पहले से गरीब हैं।
लाकमु सलाम गरीबी के अपने गणराज्य के “जेन जी” हैं। छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के वाट्टेकोल गांव के रहने वाले 20 साल के लाकमु साप्ताहिक हाटों में घूमते हैं। वह खरीदारी या वन उपज के लेन-देन के लिए नहीं, बल्कि काम की तलाश में भटकते हैं। उनके लिए ये हाट अनौपचारिक “रोजगार विनिमय केंद्र” हैं। वह कहते हैं, “यहां कोई काम दिहाड़ी पर मिल सकता है या कोई उसके बारे में बता सकता है। मैं उसके पीछे जाता हूं और इसी तरह अपना गुजारा करता हूं।” वह पहले ही एक महीने से बेरोजगार हैं।
ओडिशा, छत्तीसगढ़ या झारखंड में हर जगह आदिवासी गांवों की आबादी लगातार घट रही है। यह अगली पीढ़ी के गरीबी के भूगोल में अदृश्य होते जाने का संकेत है
घने जंगलों के भीतर बसा उनका गांव पहाड़ों से घिरा है और बाहर की दुनिया से कटा हुआ है। इसकी वजह दो बारहमासी नदियां हैं। उनका गांव 4,000 वर्ग किलोमीटर में फैले अबूझमाड़ के जंगलों के भीतर स्थित है। अबूझमाड़ का अर्थ है, “अनजान पहाड़ियां।” 2009 तक इस इलाके में बाहरी लोगों के प्रवेश पर आधिकारिक रूप से रोक थी। यह सशस्त्र माओवादियों का गढ़ रहा है जिन्हें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने “भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा” बताया था। वर्षों तक सरकार के अपने ही प्रतिबंध ने उसे इस इलाके से दूर रखा। “अनजान पहाड़ियों” में रहने वाले लोगों को बाहरी दुनिया का एहसास तभी होता था जब आधी रात के अंधेरे में माओवादियों या सुरक्षा बलों की हलचल होती है। इस साल मार्च में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा की कि इस क्षेत्र में माओवादी “लगभग पूरी तरह” खत्म हो चुके हैं। माओवादियों द्वारा कभी “आजाद क्षेत्र” कहे जाने वाले इलाके अब राज्य द्वारा माओवादियों से मुक्त कराए गए क्षेत्र के रूप में पेश किए जा रहे हैं। 50 साल पुराने संघर्ष में इसे एक ऐतिहासिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन यह बदलाव वाट्टेकोल तक नहीं पहुंचा है। अगर पहुंचा भी है तो शायद उसका यहां कोई असर नहीं पड़ा।
लाकमु के माता-पिता भी लगभग वैसा ही जीवन जीते हैं। वे मौसम के हिसाब से वन उपज बेचते या उसका भोजन के लिए लेन-देन करते हैं, मुश्किल महीनों में सादे चावल और जंगली कंदों के सहारे रहते हैं या अपने सीमित भौगोलिक दायरे में कभी-कभार मजदूरी करते हैं। उनके गांव की सीमाएं सदियों से आसपास के पहाड़ों ने तय कर रखी हैं। लाकमु कहते हैं, “मेरे माता-पिता ने भुखमरी देखी है, लेकिन मैंने नहीं देखी। सरकार का खाद्यान्न हमें मदद करता है।” कुछ साल पहले तक गांव के लोगों को पीडीएस का चावल लेने में तीन दिन लगते थे। करीब 50 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। वे सिर पर चावल ढोते हुए नदियां पार करते और बाहर कहीं रुकते थे। उनके लिए वह जगह उतनी ही दूर थी, जितना बाहरी दुनिया के लिए अबूझमाड़। अब गांव के लोग मिलकर पैसे जमा करते हैं और मुफ्त खाद्यान्न समय पर घर लाने के लिए ट्रैक्टर किराये पर लेते हैं। लाकमु कहते हैं, “हर महीने प्रति व्यक्ति 200 रुपए खर्च होते हैं।” माडिया आदिवासी समुदाय के 16 परिवारों वाले इस गांव ने पिछले साल कुल 10,000 रुपए की कमाई की। लाकमु के अनुसार, “हम अपनी पूरी नकद कमाई मुफ्त खाद्यान्न घर लाने में खर्च कर देते हैं।”
लाकमु के बच्चों समेत करीब 40 बच्चे गांव की नई पीढ़ी हैं। “क्या उनकी जिंदगी आपसे अलग होगी?” प्रश्न के जवाब में लाकमु कुछ देर सोचते हैं और फिर जोर से हंसते हुए कहते हैं, “वही जंगल, वही जगह, भोजन जुटाने का वही तरीका और पहाड़ों की वही सीमा। अलग कैसे होगी?”
दो पहाड़ियों की दूरी पर स्थित मालमत्ता गांव के पांडु दुग्गा को इस “आकांक्षी जिले” में भी ऐसा कुछ दिखाई नहीं देता, जिसकी आकांक्षा की जाए। उनके मुख से सहसा ही एक शब्द निकला “गोडुंग”। उनके मुताबिक, पिछले 20 वर्षों से यही उनके जीवन का ढांचा है। गोडुंग स्थानीय शब्द है, जिसका अर्थ है खेती के लिए जंगल की जमीन साफ करना। जंगल के जिस हिस्से को वह साफ करते हैं, वह उनके जीवन में एक मील का पत्थर होता है। वह कहते हैं, “मेरे पिता ने यह किया, मैं भी कर रहा हूं। मेरे पास यही हुनर है। इससे कमाई नहीं होती, लेकिन गुजारा चलता है।” फिर अपने जीवन का सार बताते हुए कहते हैं, “गोडुंग करो, कुछ काम करो, शौच करो और अगले दिन फिर वही दोहराओ।” उनके पड़ोसी बुदरा मुइके का मानना है कि उनके इलाके का दूरदराज होना ही विकास के यहां तक न पहुंचने का कारण है। वह कहते हैं, “घने जंगलों के भीतर हमें कोई देख नहीं सकता, कोई खोज नहीं सकता।”
ऐसे दूरदराज के इलाके आमतौर पर दीर्घकालिक गरीबों और उनकी अगली पीढ़ियों की रिहाइश होते हैं। ये ऐसे इलाके हैं जिनकी पहचान अलग-थलग और हाशिए पर होने से होती है। लेकिन इन्हें अलग भौगोलिक श्रेणी के रूप में मान्यता नहीं मिली है। अक्सर गरीबी से अभिशप्त ऐसे इलाके से बाहर निकलने का पहला कदम ही गरीबी के भूगोल से बाहर निकलना होता है।
यही कारण है कि ओडिशा, छत्तीसगढ़ या झारखंड में हर जगह आदिवासी बहुल गांवों की आबादी लगातार घट रही है। यह अगली पीढ़ी के गरीबी के भूगोल में अदृश्य होते जाने का संकेत है, भले ही इसका अर्थ यह न हो कि वे गरीबी से बाहर निकल गए हैं। देश की करीब 55 फीसदी आदिवासी आबादी अब अपने पारंपरिक क्षेत्रों से बाहर रहती है। आदिवासी समुदायों में पलायन बढ़ रहा है और यह संकट के कारण होने वाला पलायन बनता जा रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, भारत की 10.4 करोड़ आदिवासी आबादी में से आधे से अधिक लोग अब देश के 809 आदिवासी बहुल विकासखंडों से बाहर रहते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, 2001 से 2011 के बीच 100 फीसदी आदिवासी आबादी वाले गांवों की संख्या में 32 फीसदी की कमी आई। यह पलायन मुख्य रूप से आजीविका की तलाश में हो रहा है, हालांकि कुछ लोग शिक्षा के लिए भी पलायन कर रहे होंगे। भारत की आदिवासी आबादी अब भी बड़े पैमाने पर खेती और जंगल आधारित आजीविका पर निर्भर है। गैर-आदिवासी आबादी में 43 फीसदी लोग खेती पर निर्भर हैं, जबकि 66 फीसदी आदिवासी लोग इस प्राथमिक क्षेत्र की आजीविकाओं पर निर्भर हैं। हाल के दशकों में आदिवासी किसानों की संख्या घटी है और अधिक लोग कृषि मजदूर बन गए हैं। पिछले एक दशक में 35 लाख आदिवासी खेती और उससे जुड़ी गतिविधियों से बाहर हो चुके हैं। 2001 और 2011 की जनगणनाओं के बीच आदिवासी किसानों की संख्या में 10 फीसदी की कमी आई, जबकि कृषि मजदूरों की संख्या 9 फीसदी बढ़ी है।
सामाजिक कार्यकर्ता मुरलीधर देवीदास आम्टे, जिन्हें बाबा आम्टे के नाम से जाना जाता है, मध्य भारत के इस क्षेत्र यानी गरीबी के अपने गणराज्य को देश का “कंमरबंद” कहा करते थे। उन्होंने इस क्षेत्र को अपार प्राकृतिक संपदा के भंडार के रूप में देखा था। संभवतः यह देश का सबसे समृद्ध भौगोलिक क्षेत्र है। भारत के सबसे गरीब जिले समृद्ध जंगलों, महंगे खनिज भंडार और प्रमुख नदी घाटियों के लिए प्रसिद्ध हैं।
दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी गरीबी का भूगोल कुछ इसी तरह का है। प्राकृतिक संसाधनों के जितना करीब कोई समुदाय होता है, उसके गरीब होने की आशंका उतनी ही प्रबल होती है। गरीबी का समीकरण भी लगभग समान है। जीवन-निर्वाह के लिए प्रकृति या पारिस्थितिकी पर जितनी अधिक निर्भरता होती है, गरीब होने की आशंका उतनी ही ज्यादा होती है। अनुमानों के मुताबिक, दुनिया की कुल संपदा में प्राकृतिक पूंजी की हिस्सेदारी करीब 9 फीसदी है। लेकिन भारत जैसे निम्न आय वाले देशों में यह 47 फीसदी तक है। यह विकासशील और गरीब देशों में लोगों की प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भरता को दर्शाता है। दुनिया में एक अरब से अधिक लोग जंगलों पर निर्भर हैं और उनमें से ज्यादातर गरीबी रेखा के नीचे हैं। इनकी बड़ी आबादी अफ्रीका और एशिया में केंद्रित है।
दुनिया के सबसे गरीब लोगों का संसाधन खरबों डॉलर की अर्थव्यवस्था का भी आधार है। इंटरनेशनल यूनियन ऑफ फॉरेस्ट रिसर्च आर्गनाइजेशंस के अनुमानों के मुताबिक, वानिकी सीधे तौर पर वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में कम से कम 539 अरब अमेरिकी डॉलर का योगदान देती है। अगर इसके प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष और प्रेरित प्रभावों को भी शामिल किया जाए तो इसका मौद्रिक कारोबार 1.2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच जाता है। यह भारत के सकल घरेलू उत्पाद का करीब एक-तिहाई है। क्या यही प्रकृति पर निर्भर समुदायों में लगातार और दीर्घकालिक गरीबी का कारण है? दुनिया के हर 10 गरीब लोगों में से एक व्यक्ति ऐसे संसाधन-समृद्ध क्षेत्र में रहता है और जीवन-निर्वाह के लिए सीधे प्रकृति पर निर्भर है। इनमें जंगलों में रहने वाले लोग तथा जमीन व बारिश पर निर्भर किसान शामिल हैं।
असहज करने वाला यह सवाल है कि प्रकृति पर निर्भर लोग गरीब क्यों बने रहते हैं? जब हम बढ़ती समृद्धि को देखते हैं तो यह साफ दिखाई देता है कि इसके लिए पारिस्थितिकी को भारी कीमत चुकानी पड़ी है। इंटरनेशनल साइंस पॉलिसी प्लेटफॉर्म ऑन बायोडायवर्सिटी एंड ईकोसिस्टम सर्विसेस के मुताबिक, 1970 के बाद से प्रकृति प्रदत्त सेवाओं में गिरावट आई है। यह सेवाएं 18 श्रेणियों से घटकर 14 श्रेणियों में पहुंच गई है।
रिपोर्ट स्पष्ट रूप से कहती है कि “प्रकृति का दोहन बढ़ा है, जबकि इसका नियमन और रखरखाव करने वाली सेवाओं की उपलब्धता में गिरावट आई है।” संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) के एक अध्ययन के मुताबिक, 1992 से 2014 के बीच दुनिया में प्रति व्यक्ति उत्पादित पूंजी दोगुनी हो गई और प्रति व्यक्ति मानव पूंजी करीब 13 फीसदी बढ़ी। इसके उलट प्रति व्यक्ति प्राकृतिक पूंजी के भंडार का मूल्य करीब 40 फीसदी घट गया। इसका अर्थ है कि पर्यावरण पर निर्भर लोगों की संपत्ति में गिरावट आई और इससे गरीबी बढ़ी है। ऐसे हालत में जब पारिस्थितिकी ही जीवन और संपत्ति का निर्धारण करती है, तब उस तक पहुंच और उसकी उपलब्धता ही समृद्धि का स्तर तय करती है।
भारत के सबसे गरीब लोगों की अर्थव्यवस्था “सकल राष्ट्रीय उत्पाद” या जीएनपी के बजाय “सकल प्रकृति उत्पाद” पर टिकी है। करीब 70 फीसदी आबादी खेती पर निर्भर है और लगभग 20 करोड़ लोग जंगलों पर आश्रित हैं। यहां पारिस्थितिकी ही अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करती है। यही जीवन का वह आधार है जिस पर लोगों का अस्तित्व टिका है। इसलिए पारिस्थितिकी और अर्थव्यवस्था का संबंध मजबूत भी है और बेहद नाजुक भी। इसमें जरा-सा व्यवधान भी मानवीय त्रासदी पैदा कर सकता है। छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के कई गांवों में स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं का ढहना इसका उदाहरण है।
2022 में 235 किलोमीटर लंबी दल्लीराजहरा-रावघाट-जगदलपुर रेलवे परियोजना के चालू होने के बाद कांकेर के ये गांव बाहरी दुनिया से जुड़ गए। इनमें पटकल बेड़ा जैसे गांव भी शामिल हैं। इस गांव से गुजरने वाली रेलवे लाइन का एक अहम उद्देश्य रावघाट की खदानों से लौह अयस्क को ढोना था। स्थानीय समुदायों ने करीब एक दशक तक रेलवे लाइन और रावघाट की खदानें खोलने का विरोध किया। इसमें कई लोगों की जमीन चली गईं। अधिकांश लोगों के लिए आसपास के जंगल ही उनकी आर्थिक पूंजी थे। ग्रामीणों का कहना है कि रेलवे लाइन के लिए जंगल साफ किए जाने के बाद उनका जीवन तेजी से गरीबी की ओर चला गया। जिन गांवों ने अपने आसपास के जंगल तुरंत खो दिए, वे यह भी दिखाते हैं कि स्थानीय अर्थव्यवस्थाएं कितनी गहराई से पारिस्थितिकी पर निर्भर थीं और इस प्राकृतिक संपदा के गायब होने के बाद क्या होता है।
पारिस्थितिकी और अर्थव्यवस्था का संबंध मजबूत है और बेहद नाजुक भी। इसमें जरा-सा व्यवधान मानवीय त्रासदी पैदा कर सकता है। इसके कई उदाहरण हैं
पटकल बेड़ा गांव में बहुत कम लोगों को पता है कि बाहरी दुनिया आज “पॉलीक्राइसिस” (जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का नुकसान, आर्थिक संकट और अन्य संकटों का साझा नाम अथवा बहुसंकट) से जूझ रही है। इस गांव का अपना पॉलीक्राइसिस है। इसकी शुरुआत रेलवे लाइन के लिए काटे गए हर पेड़ के साथ हुई। गांव के 35 परिवारों में से 17 ने परियोजना के लिए अपनी जमीन गंवा दी। साथ ही रेलवे लाइन निर्माण के लिए काटे गए जंगलों का सहारा भी छिन गया। कितने तेंदू पेड़ काटे गए इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है। लेकिन ग्रामीणों को इससे हुए आर्थिक नुकसान का पूरा अंदाजा है। गांव के बाहर कभी कदम नहीं रखने वाले 80 वर्षीय ग्रामीण संगनाथ दुगा कहते हैं, “हर परिवार के पास पीढ़ियों से तेंदू जंगल का एक हिस्सा था।” परियोजना के लिए उनकी एक हेक्टेयर जमीन अधिग्रहित की गई और घर के बदले उन्हें 3 लाख रुपए मुआवजा मिला। वह कहते हैं, “परियोजना में आसपास के बहुत सारे तेंदू पेड़ चले गए और उनके जरिए होने वाली नियमित आमदनी भी खत्म हो गई।”
पटकल बेड़ा गांव की अर्थव्यवस्था जंगल पर केंद्रित है। मोटे अनुमान के मुताबिक, गांव की 80 फीसदी अर्थव्यवस्था वन उपज पर और बाकी खेती पर निर्भर है। यहां कौन गरीब है और कौन अपेक्षाकृत संपन्न, यह इस बात से तय होता है कि जंगल से किसे कितनी आमदनी होती है। दूसरे शब्दों में कहें तो गांव की प्रति व्यक्ति आय इस बात पर निर्भर है कि किसी व्यक्ति की वन उपज तक कितनी पहुंच है। 28 वर्षीय ग्रामीण दुगराम गवड़े कहते हैं, “अगर हिसाब लगाया जाए तो रेलवे लाइन बनने के बाद हमारे आसपास के तेंदू पेड़ों के खत्म होने से गांव को हर साल 24 लाख रुपए का नुकसान हुआ है।” वह कहते हैं, “हमारी पुरानी दुनिया जंगलों की एक स्वतंत्र अर्थव्यवस्था थी। रेलवे ने बाहरी दुनिया को हमारे करीब तो ला दिया, लेकिन हमारी आजीविका को हमसे दूर कर दिया।”
कांकेर जिले में नई रेलवे लाइन के कारण कम से कम 20 गांवों ने अपने वे जंगल खो दिए, जहां से वे तेंदू पत्तों का संग्रहण करते थे। ये जंगल समुदाय के साझा संसाधन थे। पास के मड़ापा गांव के निवासी और आदिवासी अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता मोहन सिंह दार्रो कहते हैं, “सरकार जंगल की अर्थव्यवस्था जैसी कोई चीज नहीं मानती। हम या तो बेरोजगार हैं या गरीब।” वह कहते हैं, “सिर्फ एक तेंदू पेड़ के खत्म होने का मतलब है सालाना 10,000 रुपए का आर्थिक नुकसान। इसके बिना मैं खेती में निवेश भी नहीं कर सकता। खेती के बिना पर्याप्त या अच्छा खाना नहीं खा सकता। आमदनी कम होने पर बच्चों को स्कूल नहीं भेज सकता और स्वास्थ्य की जरूरतें पूरी नहीं कर सकता।”
गवड़ेकसगांव कांकेर जिले के अंतागढ़ ब्लॉक का अपेक्षाकृत बड़ा गांव है। यहां गोंड आदिवासी समुदाय के 250 परिवार रहते हैं। नई रेलवे लाइन इस गांव से भी होकर गुजरती है। ग्रामीण संध्या कांदो कहती हैं, “परियोजना ने जंगल पूरी तरह साफ कर दिए। इनमें मुख्य रूप से साल, तेंदू और महुआ के पेड़ थे, जिन पर हम पीढ़ियों से निर्भर रहे हैं।” ये जंगल गांव की आय का मुख्य स्रोत थे। गांव की वन सुरक्षा समिति के अध्यक्ष और स्थानीय पुजारी रंजू राम गवड़े के अनुसार, “हर साल गांव को इसी जंगल से इकट्ठा किए गए तेंदू पत्तों से करीब 20 लाख रुपए की आमदनी होती थी।” गांव को महुआ फूल और बीज बेचने से होने वाली 5 लाख रुपए की सालाना आमदनी भी खत्म हो गई है। वह कहते हैं, “औसतन हर परिवार जंगल से साल में 40,000 रुपए कमाता था। इसके खत्म होते ही हम रातोंरात गरीब हो गए।” हालांकि गांव की अर्थव्यवस्था में हाल के वर्षों में मामूली बदलाव देखे गए। सब्सिडी वाले चावल ने भोजन पर होने वाला खर्च घटा दिया था। राज्य द्वारा धान के लिए दिया जाने वाला अपेक्षाकृत ऊंचा न्यूनतम समर्थन मूल्य खेती से उचित आमदनी सुनिश्चित करता था। तेंदू पत्ते और साल बीज जैसी गैर-काष्ठ वन उपज के लिए राज्य की ऊंची खरीद कीमतों ने भी ग्रामीणों को वानिकी गतिविधियां बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया था। रंजू कहते हैं, “हमारी करीब 90 फीसदी आय जंगल से आती है। जंगल खत्म हो गया तो नुकसान बहुत बड़ा है।”
मार्च 2022 में कोविड-19 के कारण लगे लॉकडाउन के दौरान गांव लौटे कई लोगों ने फिर से पलायन करने का फैसला किया। इस बार यह उनकी मजबूरी थी। संध्या कहती हैं, “जंगल से अच्छी आमदनी होती थी। पलायन अतिरिक्त आमदनी का साधन था। लेकिन अब यह मजबूरी है।” वह आगे कहती हैं, “संभव है कि गांव से बाहर जाने के लिए हम नई ट्रेन का ही इस्तेमाल करें। हमने कभी नहीं सोचा था कि बाहरी दुनिया हमसे इस तरह जुड़ेगी।”
गरीबी से घिरे इस क्षेत्र में गवड़ेकसगांव कुछ समय पहले तक अपेक्षाकृत एक “समृद्ध” गांव था। अब वह फिर गरीबी में धंस गया है। विडंबना यह है कि उसे गरीबी में धकेलने का काम उसी रेलवे लाइन ने किया, जिसने उसे बाहरी दुनिया से जोड़ा। अब इस गांव का उबरना आसान नहीं हैं। इसने अपनी प्राकृतिक पूंजी और उस तक पहुंच खो दी है। यही वह संपत्ति थी, जो कभी गांव को दूसरे इलाकों से अलग करती थी और उसके लोगों को गरीबी से बाहर निकलने की सीढ़ी देती थी।
भारत के सबसे गरीब जिलों में लोग रोजाना गरीबी रेखा से नीचे पहुंचते हैं। जरा-सा झटका उन्हें और नीचे धकेल देता है। स्थिति इतनी गंभीर है कि विकास के देशव्यापी रडार से वे अब लगभग अदृश्य हो चुके हैं।
भारत ने आखिरी बार गरीबी की गणना 15 साल से पहले की थी। और अब तक ऐसा कोई स्पष्ट संकेत नहीं है कि सरकार दोबारा गरीबी की गणना करने का इरादा रखती है। 2011-12 में (2009 में अपनाई गई पद्धति के आधार पर) देश ने आखिरी बार गरीबी रेखा तय की थी। तब ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लिए क्रमशः 816 रुपए और 1,000 रुपए प्रति माह की गरीबी रेखा निर्धारित की गई थी और गरीबों की संख्या का अनुमान लगाया गया था। यह कवायद इतनी विवादास्पद रही कि सही गरीबी रेखा और गरीबी के वास्तविक स्तर का पता लगाने के लिए तीन वर्षों तक कई विशेषज्ञ समूह बनाए गए।
2014 में तत्कालीन योजना आयोग ने गरीबी के अनुमान की समीक्षा के लिए एक और विशेषज्ञ समूह बनाया, जिसे रंगराजन समिति के नाम से जाना गया। इसकी अध्यक्षता भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर सी रंगराजन ने की थी। दोनों अनुमानों के बीच अंतर बेहद बड़ा था। 2009 की पद्धति के मुताबिक, 2011-12 में ग्रामीण भारत की 25.7 फीसदी और शहरी भारत की 13.7 फीसदी आबादी गरीब थी। लेकिन 2014 की पद्धति के अनुसार इसी अवधि में ग्रामीण आबादी का 30.9 फीसदी और शहरी आबादी का 26.4 फीसदी हिस्सा गरीब था। तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन-2 सरकार ने रंगराजन समिति के अनुमान स्वीकार नहीं किए। इसके बाद से देश गरीबी के किसी नए आधिकारिक अनुमान के बिना सिर्फ साल गिनता रहा है।
भारत में गरीबी का एक और दिलचस्प पहलू है। 1973-74 के बाद गरीबी की दर में गिरावट आई, लेकिन गरीबों की कुल संख्या कई दशकों तक लगभग उतनी ही रही। 2011-12 तक यह संख्या 26-30 करोड़ के बीच रही। माना जा सकता है कि इसमें आधे लोग दीर्घकालिक गरीब हैं। अगर आखिरी गरीबी रेखा में सिर्फ 10 रुपए जोड़ दिए जाएं तो गरीबों की संख्या में 10 करोड़ और लोग जुड़ जाते हैं। गरीबों की कुल संख्या के लगभग स्थिर बने रहने का अर्थ है कि गरीबी से बाहर निकलने वाले लोगों की तुलना में गरीबी की श्रेणी में आने वाले लोगों की संख्या ज्यादा है। यह इस बात का भी संकेत है कि गरीब आबादी का बड़ा हिस्सा दीर्घकालिक गरीबों का है। आशा कपूर मेहता कहती हैं, “अगर गरीबी रेखा को न्यूनतम जीवन-निर्वाह के बजाय वास्तविक जरूरतों के स्तर पर तय किया जाए तो हम पाएंगे कि कम से कम आधे भारतीय गरीब हैं और गरीबी रेखा से ऊपर रहने वाली आबादी का एक बड़ा हिस्सा गरीबी के खतरे में है।” वह कहती हैं, लेकिन इससे पहले भारत को “गिनती” करनी होगी।
गरीबी के भूगोल से परे दूसरा भारत समृद्धि के रास्ते पर कुलांचे मार रहा है। यह दुनिया में सबसे तेजी से संपत्ति पैदा करने वाले देशों में शामिल है। भारत अब अरबपतियों का “प्रजनन स्थल” बन चुका है। कैपजेमिनी रिसर्च इंस्टीट्यूट की वर्ल्ड वेल्थ रिपोर्ट 2025 के अनुसार, भारत में अरबपतियों की संख्या करोड़पतियों की संख्या से भी तेज गति से बढ़ रही है। गरीबी की आधिकारिक गणना के बिना यह पता लगाना मुश्किल है कि गरीबी किस गति से घट रही है। लेकिन ऐसे स्पष्ट संकेत हैं कि “संपत्ति की इस अंधी दौड़” में पीछे छूट गए लोगों के लिए आगे बढ़ना और मुश्किल हो सकता है और वे गरीबी के भंवर में फंसे रह सकते हैं।
“संपत्ति की अंधी दौड़” में पीछे छूट गए लोगों के लिए आगे बढ़ना और मुश्किल हो सकता है और वे गरीबी के भंवर में फंसे रह सकते हैं
वर्ल्ड इनइक्वेलिटी लैब के मुताबिक, दो भारत के बीच की खाई न केवल बढ़ रही है, बल्कि संभवतः दो हिस्सों में बंट रही है। आय की असमानता अब औपनिवेशिक काल के स्तर के करीब पहुंच गई है। 2022 में देश की निचली आधी आबादी की प्रति व्यक्ति सालाना आय 53,610 रुपए थी, जबकि शीर्ष 10 फीसदी आबादी का कोई व्यक्ति इससे करीब 20 गुना कमाता था। शीर्ष एक फीसदी आबादी के पास राष्ट्रीय आय के पांचवें हिस्से से अधिक था, जबकि निचली आधी आबादी के हिस्से में सिर्फ 13 फीसदी आय आई। निचली आबादी की यह हिस्सेदारी कई दशकों से लगातार घट रही है। 1980 के दशक के मध्य से विनियमन में ढील और उदारीकरण की नीतियों ने आय और संपत्ति की असमानता में दुनिया की सबसे तेज बढ़ोतरी में से एक को जन्म दिया। भारत अब एक ऐसे देश के रूप में उभर रहा है, जो गरीब भी है और अत्यधिक असमान भी। साथ ही उसका एक छोटा-सा अभिजात वर्ग बेहद समृद्ध है। देश में संपत्ति का वितरण इस बात का संकेत देता है कि असमानता कितनी तेजी से बढ़ रही है।
वर्ल्ड इनइक्वेलिटी लैब के सह-निदेशक लुकास चांसल “दो भारत” की इस खाई को गहरी असमानता की अभिव्यक्ति बताते हैं। वह कहते हैं, “संपत्ति का वितरण बेहद असमान रहा है। 50 फीसदी से अधिक आबादी के पास कोई महत्वपूर्ण संपत्ति ही नहीं है।” जिन लोगों को संपत्ति विरासत में मिलती है, उनके पास उसे और बढ़ाने का अवसर होता है। लेकिन जिनके पास विरासत में संपत्ति नहीं है, उन्हें यह अवसर नहीं मिलता। भारत में ऐसे लोगों की संख्या करीब आधी है। यही वजह है कि कुछ लोग लगातार अमीर होते जा रहे हैं, जबकि बहुसंख्यक आबादी उसी गति से संपत्ति की इस दौड़ में शामिल नहीं हो पा रही। दीर्घकालिक गरीबों की स्थिति इस दौड़ में शामिल होने की नहीं है। उनके सामने गरीबी के अभिशाप जैसे दुष्चक्र के आगे समर्पण के अलावा बहुत कम विकल्प बचते हैं।
ऐसी स्थिति 20वीं सदी की शुरुआत और उससे पहले के दौर में भी मौजूद थी, जब पश्चिमी साम्राज्यवाद अपने चरम पर था और लोकतंत्र का विस्तार बहुत सीमित था। लेकिन हैरानी की बात यह है कि आज अगर दुनिया की सबसे गरीब आधी आबादी में पैदा हुआ कोई व्यक्ति अपनी विरासत में मिली स्थिति को देखे तो उसकी आय 1820 में इसी आबादी के हिस्से में रहने वाले उसके पूर्वज की आय की आधी है। दूसरी ओर, दुनिया के सबसे अमीर एक फीसदी लोग 1990 के दशक के बाद पैदा हुई वैश्विक संपत्ति के एक-तिहाई से अधिक हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं। 2020 में यानी महामारी वाले साल में दुनिया में अरबपतियों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। इसलिए विरासत में गरीबी पाने वाला व्यक्ति यह मानने को मजबूर है कि “अमीर और अमीर होते जा रहे हैं और गरीब और गरीब।”