मध्य प्रदेश में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के क्रियान्वयन से जुड़ी अनियमितता सामने आई हैं।
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की नई ऑडिट रिपोर्ट में पता चला है कि परीक्षण के तौर पर जांची गई 8 जिलों की 64 ग्राम पंचायतों में साल 2019 से 2024 के बीच 2,426 फर्जी या गलत मनरेगा जॉब कार्ड पाए गए, जिन पर 1.46 करोड़ रुपए की मजदूरी का भुगतान किया गया। इनमें सागर (782), विदिशा (519), मंडला (448) और बैतूल (228) ऐसे फर्जी कार्ड जारी करने में आगे रहे।
साथ ही सीएजी ने पाया कि इन्हीं 5 वर्षों में केवल 2 प्रतिशत परिवारों को ही मनरेगा के तहत पूरे सौ दिनों का काम मिल सका है, जबकि 31.21 प्रतिशत से 46.60 प्रतिशत लोगों को योजना के तहत सिर्फ 40 दिन तक का रोजगार मिला है, जो योजना के उद्देश्य रोजगार की गारंटी पर खरा नहीं उतरता है।
अपनी रिपोर्ट में सीएजी ने इसकी वजह साल 2019-24 के दौरान मजदूरी की कम दरों को माना है, जो उस समय के बाजार दरों से लगातार कम थीं। अगर कोविड के वर्षों (2020-22) को छोड़ दिया जाए तो भी इसी कारण से राज्य में मनरेगा के तहत जॉब की मांग लगातार घटी है। साल 2019 से 2024 तक यह मांग 70.32 प्रतिशत से 64.72 प्रतिशत ही रह गई।
रिपोर्ट से यह भी सामने आया कि मध्य प्रदेश राज्य रोजगार गारंटी परिषद (एमपीएसइजीसी) को 2019-24 के दौरान मिले फंड का लगातार कम इस्तेमाल हुआ है। 2021-22 में यह आंकड़ा सबसे ज्यादा 1703.80 करोड़ रुपए था। इसके अलावा, 31 मार्च 2024 तक राज्य सरकार पर मजदूरी और मटीरियल की लागत के तौर पर 1217.05 करोड़ रुपए की देनदारी बकाया है।
इस रकम में मजदूरी के लिए 54.79 करोड़ रुपए (4.7 लाख ट्रांजेक्शन) की देनदारी भी शामिल है, जिसका कारण लाभार्थियों के खातों को आधार से लिंक न करना बताया गया है।
यह भी देखा गया कि 2019-24 की अवधि में मजदूरी के भुगतान में देरी के लिए 35.13 लाख रुपए के मुआवजे में से 9.07 लाख रुपए का भुगतान नहीं किया गया।
आधार की वजह से अटका भुगतान
सीएजी की रिपोर्ट में सामने आया कि आधार आधारित भुगतान प्रणाली की खामियों के कारण मनरेगा के हजारों श्रमिकों को समय पर मजदूरी नहीं मिल सकी। 31 मार्च 2024 तक 4.70 लाख भुगतान लेनदेन, जिनकी कुल राशि 54.79 करोड़ रुपए थी, केवल इसलिए अटक गए क्योंकि लाभार्थियों के बैंक खाते आधार से सही तरीके से जुड़े (मैप) नहीं थे।
सीएजी ने इसे डेटाबेस प्रबंधन की गंभीर विफलता बताया और कहा कि लाभार्थियों के बैंक खातों का समय पर सत्यापन और आधार मैपिंग सुनिश्चित न करने से मजदूरी भुगतान बाधित हुआ। रिपोर्ट ने सरकार को आधार आधारित भुगतान डेटाबेस को दुरुस्त करने और लंबित भुगतानों का शीघ्र निपटारा करने की सिफारिश की।
कृषि से जुड़ी गतिविधियों पर नहीं किया खर्च
रिपोर्ट में कहा गया है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), 2005 की अनुसूची-1 के पैरा 4(2) के अनुसार, किसी जिले में मनरेगा पर होने वाले कुल व्यय का कम से कम 60 प्रतिशत हिस्सा ऐसे कार्यों पर खर्च होना चाहिए जो कृषि और संबद्ध गतिविधियों से सीधे जुड़े हों। इनमें भूमि विकास, जल संरक्षण, सिंचाई तथा वृक्षारोपण जैसे उत्पादक परिसंपत्तियों का निर्माण शामिल है, लेकिन मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में 2019-20 से 2023-24 के दौरान कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों पर 1,104.66 करोड़ रुपए के कुल व्यय में से केवल 350.73 करोड़ (31.75 प्रतिशत) रुपए ही खर्च किए गए। यह निर्धारित 60 प्रतिशत के मानक से काफी कम है।
अनपयोगी संपत्तियों पर किया गया खर्च
सीएजी की रिपोर्ट में मध्य प्रदेश में मनरेगा के तहत बड़ी संख्या में बनाई गई संपत्तियों की गुणवत्ता, उपयोगिता और क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। ऑडिट के दौरान 12 ऐसी परिसंपत्तियां मिलीं जो या तो पूरी तरह अनुपयोगी थीं या अपने निर्धारित उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर रही थीं।
इसके अलावा सीएजी ने यह भी पाया कि छह ऐसे कार्य, जिन्हें सरकारी रिकॉर्ड में 'प्रगति पर' बताया गया था, उनके स्थल पर वास्तविक प्रगति का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला। इससे रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति के बीच गंभीर अंतर सामने आया।
साथ ही कई ग्राम पंचायतों में एक साल से अधूरे पड़े सामुदायिक कार्यों के बावजूद नए कार्यों को मंजूरी दे दी गई। इससे पुराने काम लंबे तक अधूरे रहे।
कैग रिपोर्ट में कई अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं को भी उजागर किया गया। जैसे -
ग्राम पंचायतों ने बेसलाइन सर्वे और घर-घर सर्वे नहीं किए, जिससे वास्तविक रोजगार मांग और पात्र लाभार्थियों (दिव्यांग, विधवा, परित्यक्ता आदि) की सही पहचान नहीं हो सकी।
राज्य सरकार ने राज्य-विशिष्ट सूचना, शिक्षा एवं संचार योजना तैयार नहीं की, जिससे योजना के प्रति जागरूकता और रोजगार की मांग में गिरावट आई।
लेबर बजट ग्राम पंचायतों की वास्तविक मांग के बजाय ऊपर से तैयार किया गया।
राज्य, जिला, ब्लॉक और ग्राम पंचायत चारों स्तरों पर कर्मचारियों की भारी कमी रही।
विलंबित मजदूरी भुगतान के मुआवजे में 9.07 लाख रुपए का भुगतान लंबित रहा।
अनिवार्य रजिस्टरों का रखरखाव नहीं हुआ कई स्थानों पर महिलाओं की न्यूनतम 33 प्रतिशत भागीदारी का लक्ष्य पूरा नहीं हुआ।
राज्य में निगरानी व्यवस्था कमजोर रही; लोकपाल की नियुक्ति सभी जिलों में नहीं हुई और शिकायत निवारण प्रणाली प्रभावी नहीं थी।
सामाजिक अंकेक्षण में भी कर्मचारियों की कमी रही और वर्ष में दो बार अनिवार्य सामाजिक अंकेक्षण नहीं कराया गया।