केंद्रीय बजट 2026-27 में दुर्लभ धातु गलियारा यानी रेयर अर्थ मेटल कॉरिडोर के निर्माण की घोषणा की गई है। इस घोषणा को वित्त मंत्री ने बहुत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि केंद्र सरकार ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे खनिजों बहुल राज्यों में किए जाने वाले खनन, प्रसंस्करण, शोध और विनिर्माण को भविष्य में और आगे बढ़ाने के लिए रेयर अर्थ कॉरिडोर स्थापित करने में मदद देगी।
लेकिन वास्तविकता यह है कि 27 नवंबर 2025 को हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में रेयर अर्थ मैन्युफैक्चरिंग प्रोग्राम को दी गई मंजूरी का ही यह एक विस्तार रूप है। इसके लिए तब धनराशि 7,280 करोड़ रुपए आवंटित की गई थी। जबकि अब बजट में 10 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। कुल मिलाकर देखा जाए तो मंत्रिमंडल की घोषणा को ही अब एक अलग रूप में बजट में स्थान दिया गया है। नवंबर में जब इस पहल की घोषणा की गई तो सरकार की ओर से कहा गया था कि इंट्रीग्रेटेड रेयर अर्थ मैग्नेट मैन्युफैक्चरिंग को आगे बढ़ाने के लिए यह अलग प्रकार की योजना है।
ध्यान रहे कि वर्तमान भू-राजनीति में रेयर अर्थ का महत्व और अधिक बढ़ गया है और भारत इस क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर तीसरे पायदान पर सबसे बड़े आयातक देश के रूप में बना हुआ है। रेयर अर्थ इलेक्ट्रिक वाहनों, पवन टर्बाइनों, रक्षा प्रणालियों में उपयोग किया जाता है। और इससे भी आगे बढ़कर केंद्र सरकार के नेट जीरो (2070) के लक्ष्यों को प्राप्त करने में भी इसकी उपलब्धता महत्वपूर्ण साबित होगी।
यह सर्वविदित है कि घरेलू आपूर्ति श्रृंखलाओं के विकास से रणनीतिक स्वायत्तता को अधिक मजबूती मिलती है। साथ ही तेजी से बढ़ते आयात को कम करने में भी मदद मिलेगी। और इस मामले में चीन पर निर्भरता भी धीरे-धीरे कम होगी क्योंकि वैश्विक स्तर पर चीन का कुल उत्पादन में 60 प्रतिशत और प्रसंस्करण में लगभग 85 प्रतिशत हिस्से पर नियंत्रण है। वर्तमान में भारत की रेयर अर्थ क्षेत्र में चीन पर लगभग 45 प्रतिशत निर्भरता बनी हुई है।
केंद्रीय बजट में यह घोषणा ऐसे समय हुई है कि जब चीन (रेयर अर्थ के उत्पादन व निर्यात में प्रमुख देश) अमेरिका के साथ चल रहे टैरिफ की लड़ाई में अपने रेयर अर्थ खनन उद्योग को एक रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। इस क्षेत्र में भारत के सामने कई ऐसी बड़ी चुनौतियां हैं जिसके कारण रेयर अर्थ उत्पादन में भारत का वैश्विक स्तर पर मात्र एक प्रतिशत ही हिस्सा है। भारत वर्तमान में प्रतिवर्ष 2,900 टन रेयर अर्थ का ही उत्पादन कर पाता है। इसके पीछे कई कारण हैं जैसे इस क्षेत्र का बुनियादी ढांचा बहुत पुराना है, प्रसंस्करण का अभाव है और तटीय खनन से होने वाले पर्यावरणीय जोखिम भी हैं।
भारत का गत 2024 में रेयर अर्थ का आयात 17.5 मिलियन डॉलर था जबकि 2014 में यह राशि 14.1 मिलियन डॉलर थी। कहने के लिए तो भारत, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया में रेयर अर्थ के भंडार मौजूद है लेकिन इस मामले में चीन का हिस्सा विश्व में उत्पादित किए जाने वाले कुल रेयर अर्थ का आधा है। और इसे विश्व में सबसे बड़े उत्पादक देश के रूप में जाना जाता है। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार रेयर अर्थ का निर्यात किए जाने के मामले में चीन गत 5 वर्षों से अग्रसर रहा है। वह कुल वैश्विक मांग का लगभग तीस फीसदी की आपूर्ति करता है।