19 साल के गांधी जब 1888 में कानून की पढ़ाई के लिए लंदन जाते हैं, तो वे पहली बार दादाभाई नौरोजी से मिलते हैं। गांधी अपनी पढ़ाई पूरी करके भारत लौट आते हैं और कुछ साल बाद दक्षिण अफ्रीका चले जाते हैं। इस बीच दोनों के बीच कोई खास संपर्क नहीं रहता। फिर 1894 में, जब दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के राजनीतिक अधिकारों के खिलाफ नया कानून लाया जा रहा था, गांधी पहली बार दादाभाई को पत्र लिखते हैं।
गांधी लिखते हैं कि आप मेरा मार्गदर्शन करें। आपकी सलाह का अनुसरण वैसे ही होगा जैसे एक पिता की बात बच्चे मानते हैं। गाँधी ने नटाल में भारतीयों के मताधिकार के प्रश्न पर दादाभाई नौरोजी से हस्तक्षेप की अपील की थी। 25 वर्षीय गांधी अभी महात्मा नहीं बने थे । मगर 68 साल की दादा भाई नरोजी उस समय तक भारत और ब्रिटेन—दोनों जगह एक स्थापित सार्वजनिक व्यक्तित्व बन चुके थे । दादा भाई भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों में से एक थे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि वह ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स में फिन्सबरी सेंट्रल से सांसद और ब्रिटेन में भारतीय हितों के प्रमुख प्रतिनिधि थे।
कुछ लोग ऐसे होते हैं जो नई राह की लीक बनाते हैं। दादाभाई नौरोजी ऐसे ही व्यक्ति थे। भारत की गरीबी के बारे में उन्होंने तथ्यों और आंकड़ों के साथ जो विश्लेषण किया, वह अपने समय से बहुत आगे था। औसत भारतीय की आय बहुत कम थी। लेकिन दादाभाई नौरोजी के लिए सवाल यह था ही नहीं कि भारत में उत्पादन की क्षमता नहीं है। उन्होंने 1835–1872 के आंकड़ों में देखा कि भारत का निर्यात उसके आयात से काफी अधिक था। सामान्य व्यापार में इसका मतलब हो सकता है कि देश के पास पूंजी जमा हो रही है। मगर भारत तो गरीब हो रहा था। फिर भारत का ये अतिरिक्त निर्यात किसके बदले जा रहा है? ये था असली प्रश्न ।
उन्होंने पाया कि पूंजी को वापस भेजने के कई रास्ते थे—
कर्ज़ और उसका ब्याज — भारत के नाम पर लिए गए विदेशी कर्ज़ पर ब्याज भारत के राजस्व से चुकाया जा रहा था और उसका पैसा ब्रिटेन जा रहा था। “सोचिए, भारत के राजस्व से दिया जा रहा यह ब्याज आखिर किसके पास जा रहा था? ब्रिटेन के साहूकारों और निवेशकों के पास।”
रेलवे और दूसरे विकास के काम — इन कामों के लिए ब्रिटिश पूँजी लगाई गई। भारत में रेलवे और दूसरी संपत्तियाँ बनीं, लेकिन उस पूँजी पर ब्याज और गारंटीड रिटर्न का भुगतान भारत को करना था। तो विकास के लिए आई इस पूँजी की असली कीमत कौन चुका रहा था?
ब्रिटिश अधिकारियों के वेतन और पेंशन — भारत में काम करने वाले अधिकारियों को भारत के राजस्व से भुगतान किया जाता था, लेकिन उनकी बचत, पेंशन और दूसरी आय का एक हिस्सा ब्रिटेन लौट जाता था । सोचिए, ब्रिटेन अपने अधिकारियों पर जो अच्छी-खासी रकम खर्च करता था, उसका पैसा आखिर कौन भर रहा था?
होम चार्जेज़- ब्रिटेन में भारत से जुड़े खर्च — भारत के राजस्व से ब्रिटेन में भारत से जुड़े कई सरकारी खर्च और दायित्व पूरे किए जाते थे। सोचिए, भारत से लिया गया यह पैसा ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था और वित्तीय व्यवस्था में ही घूम रहा था। तो इससे फायदा किसकी अर्थव्यवस्था को हो रहा था?
कंपनियों और व्यापार से होने वाला मुनाफ़ा — भारत में कमाया गया कुछ मुनाफ़ा भारत में दोबारा लगाने के बजाय ब्रिटेन भेजा जाता था।
नौरोजी ने सिर्फ यह नहीं देखा कि भारत से कितना पैसा बाहर जा रहा है। उन्होंने यह भी देखा कि सरकार भारत से राजस्व कैसे जुटा रही है, उस राजस्व का बोझ किस पर पड़ रहा है और फिर उस पैसे का इस्तेमाल कहाँ हो रहा है। उन्होंने सरकारी आंकड़ों को देखा, राजस्व और खर्च को समझा और यह जोड़ने की कोशिश की कि भारत की आय का कितना हिस्सा देश के भीतर रह रहा है और कितना बाहर जा रहा है।
भारत की गरीबी और धन-निकास पर अपना तर्क दादा भाई ने 1870 के दशक से लिखना और प्रस्तुत करना शुरू कर दिया और अपनी प्रसिद्ध किताब -पॉवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया 1901 में लिखी। ये सवाल अगले चार दशकों तक , आज़ादी के समय तक, प्रासंगिक बने रहे। 2 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से लॉर्ड इरविन को लिखे पत्र में, दांडी मार्च से दस दिन पहले, गांधी ने पूछा कि “भारत के नाम पर” ली गई देनदारियों (लायबिलिटीज) की जाँच क्यों न हो, जबकि उनका बोझ रैयत और गरीब जनता पर पड़ता है । 30 जून 1917 को दादाभाई नौरोजी के निधन के समय गांधी चंपारण सत्याग्रह के काम में लगे हुए थे।
उपनिवेशवाद खत्म हो गया, लेकिन दादाभाई का मूल सवाल आज भी प्रासंगिक है—और शायद आज पहले से भी ज्यादा।
जब हम कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन से निपटने, रेलवे और सड़कों जैसे बुनियादी ढाँचे, या सतत विकास के लिए बहुत बड़ी पूंजी की जरूरत है, तो हमें कुछ बुनियादी सवाल पूछने चाहिए:
पैसा कहां से आ रहा है? किस शर्त पर आ रहा है? उसकी कीमत क्या है? ब्याज और दूसरे भुगतान कौन करेगा? और अंत में इस निवेश से पैदा होने वाली कमाई कहां जाएगी? क्या विकास के लिए पैसा आना और देश या समुदाय के पास उस विकास से पैदा होने वाली संपत्ति और आय का पर्याप्त हिस्सा बचना—एक ही बात है?
यही सवाल हमारे बापू के गुरु और आदर्श, दादासाहेब नौरोजी ने अपने समय में उठाया था। आज वित्त के रूप और संस्थाएं बदल गई हैं, लेकिन पैसे के प्रवाह को समझने की जरूरत खत्म नहीं हुई है।