बहुत कम कानूनों से उतना विवाद पैदा हुआ है जितना कि विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) गारंटी अधिनियम, 2025 (वीबी-जी राम जी अधिनियम) से। इसने अब 2005 के महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) का स्थान ले लिया है। केंद्र सरकार के लिए यह नया कानून एक लंबे समय से प्रतीक्षित सुधार है।
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान (जिन्होंने वीबी-जी राम जी विधेयक को सदन में प्रस्तुत किया) के शब्दों में यह मनरेगा की “ढांचागत कमियों को दूर करने” और “इसे एक आधुनिक, लागू करने योग्य और एकीकृत रोजगार गारंटी में सुधारने का एक पथ-प्रदर्शक प्रयास है जो विकास के माध्यम से कल्याण को आगे बढ़ाता है।”
आलोचकों के लिए, जिनमें मनरेगा के कई निर्माता शामिल हैं, यह नया कानून एक परिणामी बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है। एक अधिकार-आधारित पात्रता का मौन विघटन जो ग्रामीण परिवारों को 100 दिनों के अकुशल कार्य की गारंटी देता था। वे तर्क देते हैं कि मनरेगा न केवल भारत के संविधान के “नीति निर्देशक तत्वों” में निर्धारित रोजगार के अधिकार को पूरा करता था, बल्कि ग्रामीण गरीबों की आजीविका के आधार को मजबूत करने के लिए ग्रामीण परिसंपत्तियों का निर्माण भी करता था। वहीं, दूसरी तरफ के लोगों के लिए मनरेगा एक बेकार खैराती आवंटन से अधिक कुछ नहीं था और यह संसाधनों का ऐसा गलत इस्तेमाल था जिससे बचा जा सकता था।
इस विवाद के जल्द खत्म होने की उम्मीद नहीं है। मुख्य विपक्षी पार्टी इंडियन नेशनल कांग्रेस ने पहले ही नए कानून के खिलाफ लामबंद होने और मनरेगा को फिर से शुरू करने की मांग करने का वादा किया है। इसलिए दोनों पक्षों की मुख्य दलीलों का विश्लेषण और यह आकलन करना आवश्यक है कि क्या नया ढांचा मनरेगा के कार्यान्वयन में देखी गई ढांचागत कमजोरियों को सही तरीके से दूर करता है।
कानून के मूल तत्वों पर गौर करने से पहले इसके अधिनियमित किए जाने के तरीके की जांच करना जरूरी है। वीबी-जी राम जी अधिनियम को संसद में बेहद जल्दबाजी में आगे बढ़ाया गया। इसे 18 दिसंबर, 2025 को लोकसभा द्वारा पारित किया गया और मात्र तीन दिनों के भीतर राष्ट्रपति की सहमति मिल गई। ऐसी हड़बड़ी वाकई हैरान करने वाली है, खासकर तब जब इस कानून के वित्तीय और प्रशासनिक प्रभाव व्यापक होने वाले हैं। यह विशेष रूप से राज्य सरकारों के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि रोजगार गारंटी कार्यक्रमों को लागू करने की प्राथमिक जिम्मेदारी उन्हीं की होती है।
विधेयक पेश किए जाने से पहले राज्यों के साथ किसी भी प्रकार का पूर्व परामर्श नहीं किया गया था, जो सहकारी संघवाद की भावना के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता पर सवाल उठाता है। कानून के अधिनियमन के बाद से ग्रामीण विकास मंत्री ने इन दावों को खारिज कर दिया है कि सुधार में जल्दबाजी की गई थी। उनका जोर है कि इससे पहले “राज्य सरकारों के साथ व्यापक परामर्श, तकनीकी कार्यशालाएं और बहु-हितधारक विचार-विमर्श” किए गए थे। हालांकि, इन परामर्शों का कोई भी रिकॉर्ड सार्वजनिक क्षेत्र में उपलब्ध नहीं है। राज्यों के साथ सार्थक रूप से परामर्श किया गया था या नहीं, यह उनकी पुष्टि या विरोध पर निर्भर करता है।
इस कानून को किसी स्थायी समिति या संयुक्त संसदीय समिति के पास भी नहीं भेजा गया, जैसा कि बड़े सुधारों के लिए प्रथा रही है। सरकार ने इन प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों की अनदेखी के लिए कोई सार्वजनिक स्पष्टीकरण नहीं दिया है, विशेष रूप से किसी स्पष्ट तात्कालिकता की अनुपस्थिति में।
आलोचकों का तर्क है कि नया कानून एक वैधानिक नौकरी की गारंटी को “केंद्र सरकार की योजना” में परिवर्तित कर देता है जो बिल्कुल भी लागू करने योग्य गारंटी नहीं देती है। उनकी चिंता अधिनियम के छह प्रावधानों से उत्पन्न होती है।
पहला, धारा 4(5) मनरेगा के तहत वैधानिक रोजगार गारंटी को आवंटन-आधारित, केंद्र प्रायोजित “योजना” में बदल देती है और केंद्र सरकार को वार्षिक रूप से राज्य वार आवंटन निर्धारित करने का अधिकार देती है। दूसरा, जो राज्य अधिक व्यापक रोजगार गारंटी प्रदान करने के लिए अपने स्वयं के संसाधनों और केंद्रीय आवंटन को एक साथ जोड़ना चाहते हैं, वे केंद्र द्वारा निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुसार ही ऐसा कर सकते हैं (नए कानून की धारा 4(6) और 22(5) के अनुसार), जो राजकोषीय स्वायत्तता को सीमित करता है। तीसरा, धारा 5(1) केंद्र को उन ग्रामीण क्षेत्रों को अधिसूचित करने के लिए अधिकृत करती है जहां गारंटी लागू होती है और यह प्रभावी रूप से उस सार्वभौमिक पात्रता को समाप्त कर देता है जो मनरेगा की विशेषता बन गई थी। चौथा, धारा 22(2) व्यय के राज्य हिस्से को 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 40 प्रतिशत कर देती है (पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के अपवाद के साथ जहां यह आंकड़ा 10 प्रतिशत बना रहेगा और बिना विधायिका वाले केंद्र शासित प्रदेश, जो केंद्र द्वारा पूरी तरह से वित्त पोषित रहेंगे)।
पांचवां, धारा 22(4) मनरेगा के “ओपन-एंडेड” वित्तपोषण ढांचे को केंद्र द्वारा निर्धारित राज्य-वार “मानक आवंटन” से बदल देती है। आलोचकों का तर्क है कि यह अधिकार-आधारित, मांग-संचालित पात्रता को आपूर्ति-बाधित, आवंटन-आधारित कार्यक्रम में बदल देता है, जो अन्य केंद्र प्रायोजित योजनाओं के समान है। छठा, नया कानून स्थानीय मांग के आधार पर साल भर रोजगार प्रदान करने के प्रावधान को समाप्त कर देता है। धारा 6(1) और 6(2) मुख्य कृषि मौसमों के दौरान 60 दिनों के लिए काम के प्रावधान को प्रतिबंधित करती हैं, जो जाहिरा तौर पर बुवाई और कटाई कार्यों के लिए “कृषि श्रम की पर्याप्त उपलब्धता को सुविधाजनक बनाने” के लिए है। आलोचकों को डर है कि इससे ग्रामीण श्रम-बाजार की गतिशीलता बदल जाएगी और श्रम-निर्भर ग्रामीण परिवारों के वित्तीय स्वास्थ्य को हानि पहुंचेगी।
ये सभी बदलाव पूरी तरह से नए नहीं हैं। उदाहरण के लिए, धारा 5(1) के तहत कवरेज के क्षेत्रों को अधिसूचित करने की केंद्र की शक्ति, मनरेगा की धारा 3(1) का शब्दशः पुनरुत्पादन है, जिसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने के लिए पेश किया गया था, ताकि अंततः इसके लागू होने के पांच साल के भीतर पूरे देश को कवर किया जा सके।
अपने पूर्ववर्ती कानून के विपरीत नया कानून एक निश्चित समय सीमा के भीतर सार्वभौमिक कवरेज प्रदान करने के लिए कोई प्रतिबद्धता नहीं दर्शाता है। इसलिए आलोचकों का यह डर कि वीबी-ग्राम जी अधिनियम के तहत अनिवार्य रोजगार गारंटी सार्वभौमिक नहीं रह जाएगी निराधार नहीं है। कवरेज के लिए क्षेत्रों को अधिसूचित करने के किसी भी घोषित सिद्धांत या मानदंड की अनुपस्थिति में नया कानून मनमाने या राजनीतिक रूप से प्रेरित बहिष्करण के खिलाफ बहुत कम सुरक्षा प्रदान करता है। कवरेज अधिसूचित करने से पहले राज्यों के साथ अनिवार्य परामर्श को कानून में जोड़ा जाना चाहिए था।
यह अधिनियम “केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित किए जाने वाले” मानदंडों के आधार पर मानक आवंटन के माध्यम से राज्यों की पात्रता पर सीमाएं भी लगाता है। यह प्रावधान मनरेगा की एक लंबे समय से चली आ रही कमी का जवाब देता हुआ प्रतीत होता है कि इसका खर्च ग्रामीण गरीबी के निचले स्तर वाले अपेक्षाकृत बेहतर राज्यों के पक्ष में था। साक्ष्य इस विचार का समर्थन करते हैं। स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट 2021 में प्रकाशित एक अध्ययन में हमने दिखाया कि ग्रामीण गरीबी की उच्च व्यापकता वाले छह राज्यों की कुल मनरेगा व्यय में हिस्सेदारी 2014-15 और 2019-20 के बीच मात्र 30-32 प्रतिशत थी, जबकि वहां 60 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण गरीब रहते थे। आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24 भी इसी तरह की विसंगतियों की रिपोर्ट करता है। वित्तीय वर्ष 2024 में तमिलनाडु और केरल, जहां भारत के मुश्किल से 1 प्रतिशत गरीब निवास करते हैं, उन्हें कुल मनरेगा निधि का पांचवां हिस्सा मिला, जबकि बिहार और उत्तर प्रदेश, जहा 45 प्रतिशत गरीब रहते हैं, उन्हें 17 प्रतिशत प्राप्त हुआ।
मनरेगा के तहत ऐसा असंतुलित खर्च केवल ओपन-एंडेड फंडिंग का परिणाम नहीं था। यह उच्च-गरीबी वाले राज्यों में गंभीर क्षमता की कमी को भी दर्शाता था, जिनकी प्रशासनिक मशीनरी बड़े आवंटन की योजना बनाने, उसे निष्पादित करने और आत्मसात करने में अक्षम रही। जब तक राज्य-स्तर की क्षमता बढ़ाने में निरंतर निवेश के माध्यम से इस संरचनात्मक कमजोरी को दूर नहीं किया जाता, तब तक मानक आवंटन के माध्यम से उनकी हिस्सेदारी बढ़ाने ( बेहतर स्थिति वाले राज्यों की हिस्सेदारी कम करने) से गरीब राज्यों का खराब प्रदर्शन चालू रहने का जोखिम है। आवंटन में कटौती के साथ बेहतर स्थिति वाले राज्यों में रोजगार और खर्च में गिरावट देखी जाएगी, जबकि गरीब राज्य उच्च हिस्सेदारी का उपयोग करने में असमर्थ रह सकते हैं। इसका संभावित परिणाम रोजगार गारंटी कार्यक्रम के तहत कवरेज और खर्च में व्यापक रूप से कमी होना है।
नए ढांचे के समर्थक अक्सर भारतीय स्टेट रिसर्च की एक हालिया रिपोर्ट का हवाला देते हैं, जिसमें यह सुझाव दिया गया है कि एक काल्पनिक मानक आवंटन व्यवस्था के अंतर्गत अधिकांश बड़े राज्यों को लाभ होगा। हालांकि, बारीकी से निरीक्षण करने पर पता चलता है कि प्रस्तावित फॉर्मूला दक्षता मानदंडों को 58 प्रतिशत भार देता है और निष्पक्षता को केवल 42 प्रतिशत। इस बात को लेकर कोई आश्वासन नहीं है कि अधिनियम के तहत अनिवार्य राष्ट्रीय स्तर की संचालन समिति इस तरह के उच्च दक्षता-भार वाले दृष्टिकोण को अपनाएगी। अधिक निष्पक्षता-उन्मुख फॉर्मूले से काफी अलग वितरण संबंधी परिणाम मिलेंगे।
कार्यक्रम के व्यय में राज्य के हिस्से में 10 प्रतिशत से 40 प्रतिशत तक की तीव्र वृद्धि एक और चुनौती पेश करती है। कई बड़े राज्यों के लिए विशेष रूप से पश्चिमी और दक्षिणी भारत में, यह दोहरी मार के समान है (सीमित केंद्रीय आवंटन के साथ-साथ अत्यधिक उच्च राजकोषीय बोझ)। अनुमानों के अनुसार यदि वित्त वर्ष 2025 में 60:40 का लागत-साझाकरण फॉर्मूला लागू होता, तो राज्यों ने सामूहिक रूप से अतिरिक्त ₹31,000 करोड़ का भार वहन किया होता। उत्तर प्रदेश ने ₹4,230 करोड़ अधिक भुगतान किया होता, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु प्रत्येक ने ₹3,000 करोड़ से अधिक। यहां तक कि बिहार और मध्य प्रदेश को भी ₹2,500 करोड़ से अधिक की अतिरिक्त देनदारियों का सामना करना पड़ता। पूर्व परामर्श के बिना इस परिमाण के दायित्वों को राज्यों पर थोपने को न्यायोचित ठहराना कठिन है। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने इसे “लंबे समय से स्थापित वित्तपोषण मॉडल” के साथ संरेखित करने का प्रयास बताकर इसका बचाव करने की कोशिश की है।
यह उल्लेख करना आवश्यक है कि कई राज्य पहले से ही प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) पर भारी खर्च कर रहे हैं। संसद के कामकाज पर नजर रखने वाली संस्था पीआरएस इंडिया के अनुसार, 12 राज्यों ने केवल महिलाओं को बिना शर्त नकद हस्तांतरण के लिए वित्त वर्ष 2026 में ₹1,68,040 करोड़ का बजट रखा है। बिहार को अध्ययन में शामिल नहीं किया गया था लेकिन इस राज्य ने भी हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनावों की पूर्व संध्या पर महिलाओं को बिना शर्त नकद हस्तांतरण (जिसे “दस हजारी” का नाम दिया गया है) के लिए ₹2,500 करोड़ खर्च किए हैं। राज्य सरकार ने बेरोजगार युवाओं को दो साल तक ₹1,000 का मासिक भत्ता देने की योजना की भी घोषणा की है। इसलिए राज्यों के लिए वित्तीय गुंजाइश की कमी के आधार पर नए लागत-साझाकरण फॉर्मूले का विरोध करना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि ग्रामीण रोजगार गारंटी निष्पक्षता और दक्षता दोनों को बढ़ावा देती है।
और आखिर में, क्या राज्य के लिए कृषि के व्यस्ततम समय के दौरान दो महीने के लिए कार्यक्रम को “बंद” करना अनिवार्य बनाना न्यायोचित है? 2005 के अधिनियम के प्रारूपण के दौरान महाराष्ट्र रोजगार गारंटी अधिनियम, 1977 (जो मनरेगा का आधार था) में मौजूद इसी तरह के एक प्रावधान को विचार विमर्श के बाद खारिज कर दिया गया था। नीति-निर्माताओं ने यह स्वीकार किया था कि कृषि के पीक सीजन के दौरान भी मनरेगा जैसे सार्वजनिक रोजगार का विकल्प कृषि श्रमिकों को वैधानिक न्यूनतम मजदूरी के भुगतान को लागू करने वाले एक कारक के रूप में कार्य करता था।
दरअसल, मनरेगा का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव सभी ग्रामीण श्रमिकों की मजदूरी को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा देना था, न कि केवल मनरेगा श्रमिकों की, जैसा कि कार्तिक मुरलीधरन ने अपनी 2024 की पुस्तक एक्सेलरेटिंग इंडियाज डेवलपमेंट में कहा है। नए कानून में इस सार्वजनिक विकल्प को हटाने से ग्रामीण श्रम-निर्भर परिवारों को बड़े भूस्वामियों की एकाधिकारवादी शक्ति का जोखिम है। इसके अलावा, इस बात के साक्ष्य हैं कि मनरेगा ने कृषि श्रम आपूर्ति को महत्वपूर्ण रूप से बाधित किया है, कुछ हद तक मिश्रित रहे हैं। बुआई और कटाई के व्यस्ततम महीनों की हिस्सेदारी कुल मनरेगा “पर्सन-डेज” (व्यक्ति-दिवस) में मुश्किल से 15 प्रतिशत है, जो स्थायी कमी पैदा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। दो महीने की पूर्ण बंदी न तो आवश्यक थी और न ही विवेकपूर्ण। सार्वजनिक कार्यों में कटौती का दबाव श्रम की कमी के बजाय किसानों को आनेवाली उच्च मजदूरी लागत की समस्या से प्रेरित प्रतीत होता है।
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री के नेतृत्व में सरकारी प्रवक्ताओं का कहना है कि नया कानून कार्यान्वयन क्षमता को मजबूत करता है, जवाबदेही को तेज करता है और परिणामों को नया रूप देता है, जिससे ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम “विकसित भारत @2047” की महत्वाकांक्षा के साथ संरेखित होता है। मंत्री के हालिया भाषण और लेख यह स्पष्ट करते हैं कि मनरेगा में टुकड़ों में संशोधन करने के बजाय उसका पूर्ण प्रतिस्थापन क्यों आवश्यक था। इसके पीछे मुख्य तर्क यह है कि दो दशक पहले तैयार किए गए कानूनी ढांचे को ग्रामीण भारत में “महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन” के आलोक में समीक्षा की आवश्यकता थी, जो विस्तारित सामाजिक सुरक्षा कवरेज और प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं की अधिकता से प्रेरित है। मंत्री ने कई ऐसी विशेषताओं पर प्रकाश डाला है जिनका उद्देश्य यह दर्शाना है कि वीबी-जी राम जी अधिनियम आजीविका सुरक्षा को कमजोर करने के बजाय मजबूत करता है।
इसमें तयशुदा न्यूनतम रोजगार की गारंटी को हर परिवार के लिए 100 दिन से बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है। इसके तहत होने वाले कामों को अब चार मुख्य विषयों में बांटा गया है, जल सुरक्षा, बुनियादी ग्रामीण ढांचा, आजीविका से जुड़ी संपत्ति, जलवायु एवं आपदा सुरक्षा। साथ-साथ उनके नतीजों का ब्योरा भी दिया गया है। आवंटित किए जाने वाले संसाधनों की व्यवस्था ऐसी रखी गई है जिससे पुरानी कमियों को सुधारा जा सके। इसके जरिए उन राज्यों को अधिक संसाधन दिए जाएंगे जहां ग्रामीण गरीबी अधिक है और साथ ही राज्यों के भीतर भी जरूरत के हिसाब से पारदर्शी बंटवारे को जरूरी बनाया गया है। बेरोजगारी भत्ते और मजदूरी में देरी से जुड़े नियमों को और सख्त कर दिया गया है। निगरानी को बेहतर बनाने के लिए बायोमेट्रिक पहचान, जियोस्पेशियल प्लानिंग, मोबाइल ऐप और डैशबोर्ड जैसे डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल अनिवार्य कर दिया गया है ताकि सोशल ऑडिट के साथ-साथ लगातार मूल्यांकन भी होता रहे।
इन बदलावों में से कुछ समझदारी भरे हैं तो कुछ बड़े पैमाने पर केवल प्रतीकात्मक हैं। गारंटीशुदा रोजगार के दिनों को बढ़ाकर 125 करने के फैसले पर विचार करें। वित्त वर्ष 2007 से 2020 के बीच मनरेगा के तहत मिलने वाला औसत रोजगार 46 दिनों के आसपास रहा और वित्त वर्ष 2021 से 2025 के बीच मामूली रूप से बढ़कर लगभग 50 दिन तक हो गया। 10 प्रतिशत से भी कम परिवार 100 दिनों की अधिकतम सीमा का फायदा उठा पाए। संक्षेप में कहें तो कानूनी सीमा असल बाधा नहीं थी इसलिए इसे बढ़ाकर 125 दिन करने से कम या मध्यम अवधि में परिणामों में बदलाव आने की संभावना कम ही है।
अनुमेय कार्यों को चार विषयगत क्षेत्रों में फिर से वर्गीकृत करना उचित तो है लेकिन यह कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं है। इनमें से अधिकांश गतिविधियां पहले से ही इस योजना के तहत पात्र थीं। वास्तव में 2014 के एक संशोधन में यह अनिवार्य किया गया था कि 75 प्रतिशत कार्य जल संरक्षण और सूखा-निवारण से जुड़े होने चाहिए। कानून में अपेक्षित परिणामों को स्पष्ट रूप से लिखने से क्रियान्वयन की गुणवत्ता में सुधार होगा या नहीं, यह इसकी रूपरेखा के बजाय इसके निष्पादन पर निर्भर करेगा। इसके विपरीत, बेरोजगारी भत्ते के लिए अयोग्यता वाली शर्त को हटाना और साथ-साथ चलने वाली मूल्यांकन प्रक्रिया शुरू करना स्वागत योग्य बदलाव हैं।
डिजिटल उपकरणों का अनिवार्य उपयोग अधिक विवादास्पद है। इनमें से कई प्रणालियां कार्यकारी आदेशों के माध्यम से पहले से ही लागू हैं। उपस्थिति के सत्यापन के लिए उपयोग किए जाने वाले नेशनल मोबाइल मॉनिटरिंग सिस्टम ऐप की प्रभावशीलता पर उन कार्यकर्ताओं और शोधकर्ताओं ने सवाल उठाए हैं जो जमीनी स्तर के क्रियान्वयन से परिचित हैं। डिजिटल उपकरण पारदर्शिता तो बढ़ा सकते हैं, लेकिन केवल तभी जब ऐसे सुरक्षा उपाय हों जो यह सुनिश्चित करें कि डिजिटल सुविधा से वंचित लोगों को उनके अधिकारों से महरूम न किया जाए और श्रमिकों की गोपनीयता सुरक्षित रहे।
मनरेगा के आलोचकों ने इसके कार्यान्वयन में लंबे समय से चार संरचनात्मक कमजोरियों की पहचान की है, जिन्हें अक्सर भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा भी रेखांकित किया गया है। इनमें अत्यधिक ग्रामीण गरीबी वाले राज्यों का लगातार खराब प्रदर्शन; निर्मित संपत्तियों की गुणवत्ता और टिकाऊपन को लेकर चिंताएं। 15 दिनों की कानूनी समय सीमा के बाद भी मजदूरी के भुगतान में होने वाली लगातार देरी और फर्जी जॉब कार्ड, बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गए माप और मशीनों के उपयोग के माध्यम से होने वाला भ्रष्टाचार और गड़बड़ियां शामिल हैं। सवाल यह है कि क्या नया कानून इन खामियों को सार्थक तरीके से दूर करता है।
पहली समस्या (राज्यों के असमान प्रदर्शन) को प्रत्यक्ष रूप से राज्य-वार मानक आवंटन के माध्यम से सुलझाने की कोशिश की गई है। जैसा कि पहले तर्क दिया गया है कि यह खर्च करने के असंतुलित तरीकों को सुधारने में मदद कर सकता है लेकिन यह तब तक पर्याप्त नहीं होगा जब तक कि गरीब राज्यों में प्रशासनिक क्षमता को मजबूत करने के निरंतर प्रयास न किए जाएं।
संपत्ति की गुणवत्ता को लेकर चिंताएं हालांकि वैध हैं लेकिन अक्सर उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। इस पर अधिकांश संदेह प्रमाणों के बजाय सुनी-सुनाई बातों पर आधारित है। शैक्षणिक शोध एक अधिक अनुकूल तस्वीर पेश करते हैं। आर्थिक विकास संस्थान द्वारा 2018 में किए गए एक अध्ययन में (जो 21 राज्यों के 30 जिलों के फील्डवर्क पर आधारित था) पाया गया कि सर्वेक्षण में शामिल 76 प्रतिशत परिवारों ने संपत्ति की गुणवत्ता को अच्छी या बहुत अच्छी श्रेणी में रखा, केवल 0.5 प्रतिशत ने इसे असंतोषजनक माना। इस पृष्ठभूमि में केंद्र स्तर पर समवर्ती मूल्यांकन और राज्य स्तर की गुणवत्ता-नियंत्रण टीमों द्वारा व्यवस्थित निरीक्षण के नए कानून के प्रावधान, परिणामों में सुधार के नेक प्रयास प्रतीत होते हैं। मजदूरी के भुगतान में होने वाली देरी को दूर करने के लिए नए कानून ने अनुसूची II में प्रावधानों का एक समूह शामिल किया है जो 15 दिनों के भीतर भुगतान को अनिवार्य बनाता है। ये प्रावधान ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा जारी मौजूदा दिशा-निर्देशों की हूबहू नकल हैं। आधारभूत प्रक्रियाओं में बदलाव किए बिना केवल उन्हें वैधानिक दर्जा देने से भुगतान में होने वाली देरी खत्म होगी या नहीं, इस बात को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
मनरेगा की तरह ही नया ढांचा भ्रष्टाचार और लीकेज को रोकने के लिए तकनीक आधारित निगरानी और सोशल ऑडिट (सामाजिक अंकेक्षण) पर बहुत अधिक निर्भर है। अनुभव हमें सावधान रहने की सीख देते हैं। वैचारिक मजबूती के बावजूद, भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए सभी राज्यों में सोशल ऑडिट को कभी भी पूरी तरह या लगातार लागू नहीं किया गया है और उनका प्रभाव भी असमान रहा है, जैसा कि स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट 2022 में प्रकाशित हमारे अध्ययन में दिखाया गया है। पारदर्शिता के प्रति प्रतिरोधक क्षमता को खत्म करना अभी भी एक बड़ी परिचालन चुनौती है। इसी तरह क्या नए कानून में परिकल्पित “रोजगार गारंटी कार्ड” जारी करने से फर्जी जॉब कार्ड की समस्या खत्म हो सकती है, यह एक खुला सवाल है।
हालांकि, कार्यान्वयन की इन चिंताओं से परे एक व्यापक मुद्दा भी है। “विकसित भारत@2047” में क्या ग्रामीण आजीविका की सुरक्षा मुख्य रूप से अकुशल शारीरिक श्रम पर ही आधारित रहनी चाहिए? इस दृष्टि से वीबी-ग्राम जी अधिनियम भविष्योन्मुखी प्रतीत नहीं होता है। यह ग्रामीण सेवा क्षेत्र, विशेष रूप से “केयर इकोनॉमी” (देखभाल आधारित अर्थव्यवस्था) की बढ़ती रोजगार संभावनाओं को काफी हद तक नजरअंदाज करता है। महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी को सक्षम बनाने के लिए क्रेच (शिशु गृह), बुजुर्ग आबादी के लिए प्रशिक्षित कर्मी, उपशामक देखभाल (पैलियेटिव केयर) प्रदाताओं और ग्राम पुस्तकालयों के लिए कर्मचारियों की मांग बढ़ रही है। उत्पादकता बढ़ाने और अवसरों को विस्तार देने के लिए ग्रामीण कार्यबल के व्यवस्थित कौशल विकास की भी उतनी ही आवश्यकता है। एक पुनर्कल्पित रोजगार गारंटी योजना अपने दायरे में श्रम के इन उभरते रूपों को शामिल कर सकती थी। ऐसा न होना एक हाथ से गंवाया गया अवसर है, जिस पर वीबी-ग्राम जी अधिनियम को लेकर चल रही बहस में अधिक प्रमुखता से चर्चा होनी चाहिए।
(जुगल महापात्र भारत सरकार के ग्रामीण विकास विभाग के सचिव रह चुके हैं और सिराज हुसैन पूर्व कृषि सचिव हैं)