इलस्ट्रेशन: योगेंद्र आनंद / सीएसई
अर्थव्यवस्था

नवउदारवादी नीतियों पर सवाल, हिंदी में आई ‘भारत में गरीबी’ किताब से गरीबी, असमानता और विकास मॉडल पर नई बहस

आजादी के बाद के भारत से लेकर वर्तमान तक गरीबी, असमानता, रोजगार और कृषि संकट की कहानी को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास करती यह किताब हिंदी पाठकों के लिए काफी महत्व रखती है

Raju Sajwan

भारत में गरीबी को लेकर कई विरोधाभास हैं। गरीबी की कोई सर्वमान्य और निर्विवाद परिभाषा न होने के कारण यह तय करना कठिन है कि वास्तव में गरीब कौन है और देश में गरीबों की संख्या कितनी है। सरकार द्वारा गठित विभिन्न समितियों और मापदंडों के आधार पर गरीबी के अलग-अलग आकलन सामने आते रहे हैं, जिससे स्पष्टता की बजाय भ्रम की स्थिति ज्यादा बनती गई। सरकारें भी इस भ्रम को दूर करने की बजाय अलग-अलग पैमानों का सहारा लेती रही हैं, ताकि समय-समय पर यह दावा किया जा सके कि देश में गरीबी घट रही है। ऐसे समय में अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा की किताब “भारत में गरीबी” इस विषय पर एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में सामने आई है।

मेहरोत्रा पहले ही पन्ने पर आय के आधार पर गरीबी मापने के पारंपरिक तरीके पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि गरीबी सिर्फ पैसे की कमी नहीं है। यह शिक्षा, स्वास्थ्य और अवसरों की कमी से भी जुड़ी होती है। लेखक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के क्षमता विकास की सोच की पैरवी करते हुए कहते हैं कि आय के साथ-साथ लोगों की क्षमताएं बढ़ाना जरूरी है ताकि वे बेहतर जीवन जी सकें और विकास सही मायने में हो सके।

किताब में नवउदारवादी नीतियों पर सवाल खड़े करते हुए विकास के नए आयामों पर विचार की जरूरत बताई गई है। लेखक कहते हैं कि 21वीं सदी में विकास के लिए केवल बाजार-आधारित या नव-उदारवादी यानी वॉशिंगटन कंसेंसस पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। उल्लेखनीय है कि वॉशिंगटन कंसेंसस शब्द 1989 में अर्थशास्त्री जॉन विलियमसन ने गढ़ा था। इसका आशय उन आर्थिक नीतियों के समूह से है जिनका समर्थन अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन में स्थित प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं जैसे विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और अमेरिकी वित्त मंत्रालय करती थीं। इन नीतियों का मूल विचार आर्थिक विकास को तेज करने के लिए सरकार की भूमिका सीमित करना और बाजार को अधिक स्वतंत्रता देना था। लेखक का कहना है कि इन नीतियों का सैद्धांतिक और दार्शनिक आधार कमजोर साबित हुआ है, इसलिए गरीबी हटाने और समावेशी विकास के लिए एक वैकल्पिक सोच की जरूरत है।

दिलचस्प है कि भारत में गरीबी का भूगोल काफी हद तक हिंदी पट्टी से जुड़ा हुआ है, लेकिन गरीबी पर गंभीर आर्थिक विमर्श प्रायः अंग्रेजी तक सीमित रहा है। ऐसे में “भारत में गरीबी” केवल एक किताब नहीं, बल्कि उस बहस को हिंदी समाज तक पहुंचाने का प्रयास है, जिसका सीधा संबंध करोड़ों लोगों के जीवन से है। लेखक एक ओर जहां आंकड़ों की पड़ताल से गरीबी कम होने के सरकार के दावों को खारिज करते हैं तो दूसरी ओर देश में गरीबी के कारणों का व्यापक विश्लेषण करते हैं। तमाम कवायदों के बावजूद भारत के विकासशील देशों की सूची से बाहर न निकलने की एक बड़ी वजह अर्थव्यवस्था में कृषि पर अत्यधिक निर्भरता को माना जाता है। लेखक कृषि पर निर्भरता कम होने की बजाय बढ़ने के लिए सरकार की नीतियों को दोषी मानते हैं।

विकसित देशों में कृषि का योगदान चाहे उत्पादन में हो या रोजगार में 10 प्रतिशत से भी कम होता है और यही विकसित देश की पहचान है, लेकिन भारत में वर्ष 2020 में भारत की लगभग 42 प्रतिशत कार्यशील आबादी खेती से जुड़ी थी, लेकिन देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में खेती का योगदान केवल 15 प्रतिशत था। वह लिखते हैं कि भारत की आजादी के बाद शायद ही कोई ऐसा दशक बीता हो, जब कृषि विकास दर 3.2 प्रतिशत से अधिक पहुंची हो। हालांकि 2004 से 2014 का दशक अपवाद रहा, इस दशक में कृषि विकास दर 4 प्रतिशत के आसपास पहुंची थी। लेखक कहते हैं कि सरकार विनिर्माण (मैन्यूफैक्चरिंग) क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए सही नीतियों का क्रियान्वयन नहीं कर पाई। यही वजह है कि खेती किसानी पर निर्भरता के चलते गरीबी कम नहीं हुई।

मेहरोत्रा मानते हैं कि भारत की असमानता को समझने के लिए आय, संपति और सामाजिक विषमताओं को ध्यान में रखना जरूरी है

विश्व बैंक ने 2025 की अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि भारत में न केवल गरीबी, बल्कि असमानता भी तेजी से घट रही है। उपभोग (खर्च) आधारित आंकड़ों के आधार पर उसने भारत का गिनी सूचकांक 25.5 बताया और भारत को दुनिया के अपेक्षाकृत अधिक समान देशों में रखा। लेकिन लेखक इस दावे पर सवाल उठाते हैं। उनका तर्क है कि उपभोग आधारित सर्वेक्षण वास्तविक असमानता को कम करके दिखाते हैं, क्योंकि अमीर लोग अपनी आय का बड़ा हिस्सा खर्च करने के बजाय बचाते और निवेश करते हैं। इसलिए आय और संपत्ति के आधार पर देखी जाने वाली असमानता, उपभोग आधारित आंकड़ों में पूरी तरह दिखाई नहीं देती। लेखक के अनुसार, भारत की असमानता को समझने के लिए आय, संपत्ति और सामाजिक विषमताओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

लेखक चेताते हैं कि किसी भी सरकार के लिए अगले 2 दशकों की अवधि के भीतर इन लक्ष्यों को एक साथ हासिल करने की चुनौती है, क्योंकि 2040 तक जनसांख्यिकीय लाभांश किसी भी राष्ट्र के जीवन में एक बार का अवसर समाप्त हो जाएगा। ऐसे में प्रत्येक राजनीतिक दल के नेतृत्व को चाहे वह केवल एक राज्य में हो, कई राज्य में या संघ स्तर पर हावी हो, इस तथ्य को ध्यान में रखकर नीतिगत कदम उठाने चाहिए।

किताब की भाषा अपेक्षाकृत सरल है। खासियत भी है कि किताब मूल रूप से हिंदी में लिखी गई है। वरना, ऐसे विषयों पर अंग्रेजी से हिंदी में अनुवादित किताबों को पढ़ना आसान नहीं होता। हालांकि कुछ अध्यायों में आर्थिक अवधारणाओं और आंकड़ों की अधिकता सामान्य पाठकों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती है। फिर भी शोधकर्ताओं, पत्रकारों, नीति-निर्माताओं और विकास के मुद्दों में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह किताब एक उपयोगी संदर्भ सामग्री सिद्ध होगी। “भारत में गरीबी” समकालीन भारत को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण किताब है। ऐसे समय में जब विकास को अक्सर जीडीपी वृद्धि के आंकड़ों से मापा जाता है, यह किताब याद दिलाती है कि विकास का वास्तविक पैमाना लोगों का जीवन स्तर, पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक रोजगार है।