न्यायाधीशों को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील होना पड़ता है, विशेष रूप से उन्हें जो हरित पीठ (ग्रीन बेंच) में बैठते हैं। जब भी किसी हरित पीठ का गठन किया जाता है, तो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जो न्यायाधीश इसके प्रमुख हैं, वे पर्यावरणीय मुद्दों को लेकर वास्तव में चिंतित हों। यदि वे पर्यावरण की परवाह नहीं करते हैं, तो आप उनसे कभी भी सही निर्णय की अपेक्षा नहीं कर सकते। इसका अर्थ यह नहीं है कि चूंकि आप एक “हरित” न्यायाधीश हैं इसलिए आप विकास के विरोधी हैं। हम प्रगति भी चाहते हैं। इस संबंध में अक्सर “सतत विकास” के सिद्धांत का हवाला दिया जाता है लेकिन सतत विकास क्या है?
सीधे शब्दों में कहें तो, यदि किसी चीज के प्रभाव को उलटा नहीं जा सकता या उसकी क्षतिपूर्ति नहीं की जा सकती तो वह सतत विकास नहीं है। मेरा स्पष्ट रूप से यह मानना है कि खराब पर्यावरण और अच्छी अर्थव्यवस्था साथ-साथ नहीं चल सकते। यदि आपके पर्यावरण को सुरक्षित नहीं किया जा सकता है, तो कोई भी आर्थिक लाभ इसे उचित नहीं ठहरा सकता। यह एक अच्छा व्यवसाय हो सकता है, लेकिन यह अच्छी अर्थव्यवस्था नहीं है, क्योंकि अर्थव्यवस्था को लंबे समय में देश के लिए काम करना चाहिए। यहीं पर अदालतों को हस्तक्षेप करना चाहिए। एक समय था, जब भारत का सर्वोच्च न्यायालय और यहां तक कि उच्च न्यायालय भी पर्यावरण की रक्षा के लिए सक्रिय ही नहीं, बल्कि पूरी तरह से सक्रिय थे। दुर्भाग्य से अब यह सच नहीं है।
आज, अदालतों द्वारा पर्यावरणीय क्षरण को उचित ठहराने के लिए कुछ खास वाक्यांशों का उपयोग किया जाता है। पारिस्थितिकी या पर्यावरण की तुलना में प्रक्रिया अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। अक्सर यह सवाल पूछा जाता है, क्या प्रक्रिया का पालन किया गया है? यदि उत्तर हां है, तो अदालत कहती है कि वह हस्तक्षेप नहीं कर सकती। लेकिन अदालत की भूमिका वहीं समाप्त नहीं होनी चाहिए। यह संभव है कि उचित प्रक्रिया का पालन किया हो, लेकिन यदि अंतिम परिणाम एक पर्यावरणीय आपदा है, तो अदालत के लिए कदम उठाना आवश्यक है।
अदालत का हस्तक्षेप आवश्यक है। ग्रेट निकोबार परियोजना के मामले पर विचार करें। यह संभव है कि पर्यावरण मंजूरी की पूरी प्रक्रिया का पालन किया गया हो। मैं विकास के खिलाफ नहीं हूं। लेकिन आप निकोबार में पेड़ों को कैसे काट सकते हैं और फिर हरियाणा में उनके बदले में पेड़ कैसे लगा सकते हैं? इसी तरह अंडमान द्वीप समूह में पाम ऑयल के बागानों के लिए जो पारिस्थितिकी के लिए अत्यंत हानिकारक हैं, (एक बार फिर हरियाणा और राजस्थान जैसी जगहों पर प्रतिपूरक वनीकरण यानी कि एक स्थान पर वृक्षों की कटाई के बदले किसी दूसरे स्थान पर वृक्षारोपण) का प्रस्ताव दिया गया है। क्या प्रतिपूरक वनीकरण एक मजाक बन गया है?
वंतारा के मामले को ही ले लीजिए। मैं यह समझ ही नहीं पा रहा हूं कि सर्वोच्च न्यायालय ने उस मामले पर विचार कैसे किया। मुझे तो यह लगभग एक प्रायोजित मामले जैसा लगा। आज, यदि कोई मुख्यमंत्री ऐसी टिप्पणी करता है जिसे बेहद अपमानजनक माना जाता है, तो सर्वोच्च न्यायालय याचिकाकर्ता से उच्च न्यायालय जाने के लिए कहता है, लेकिन वंतारा के मामले में न्यायालय ने सीधे याचिका स्वीकार कर ली। यही नहीं एक आयोग नियुक्त किया और आयोग ने एक सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपते हुए कह दिया कि सब कुछ बिल्कुल ठीक है। जो सज्जन वंतारा चलाते हैं, उनकी मंशा शायद बहुत अच्छी हो सकती है।
मैं उनकी मंशा पर संदेह नहीं कर रहा हूं लेकिन केवल इसलिए कि कोई अमीर है तो इसका मतलब यह नहीं है कि दुनिया की हर प्रजाति उसी के चिड़ियाघर में होनी चाहिए। यही वह जगह है जहां अदालत को और अधिक कड़ाई से गौर करना चाहिए था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।
एक और मामला जिसने मुझे परेशान किया, वह राजस्थान का सौर ऊर्जा संयंत्र मामला था, जिसमें “ग्रेट इंडियन बस्टर्ड” शामिल था। अब इन पक्षियों में से केवल सौ के करीब ही बचे हैं। मुद्दा ऊपर से गुजरने वाली ट्रांसमिशन लाइनों (बिजली के तारों) से संबंधित था। एक न्यायाधीश (जो बहुत उदार हैं) ने कहा कि चूंकि सौर ऊर्जा, ऊर्जा का एक नया रूप है इसलिए हम इसके संचरण के लिए ओवरहेड लाइनों की अनुमति देने वाला एक नया न्यायशास्त्र विकसित कर रहे हैं। लेकिन ओवरहेड ट्रांसमिशन लाइनें कोई नया विकास नहीं हैं।
बिजली को भूमिगत केबलों के माध्यम से भी भेजा जा सकता है। उस मामले में पर्यावरणीय संरक्षण पर व्यावसायिक हित हावी हो गए। इसी तरह संरक्षित क्षेत्रों के आसपास के पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्रों (ईएसजेड) को हर जगह खत्म किया जा रहा है। ये क्षेत्र (चाहे वे एक किलोमीटर हों, आधा किलोमीटर हों या दो किलोमीटर)विशेषज्ञों द्वारा बहुत सोच-समझकर तय किए गए थे। फिर भी आज, इन्हें वापस लेने की अनुमति बहुत आसानी से दी जा रही है।
यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है: क्या प्रक्रिया का पालन किया गया है? यदि उत्तर ‘हां’ है, तो न्यायालय कहता है कि वह हस्तक्षेप नहीं कर सकता। प्रक्रिया का पालन किया गया हो सकता है, लेकिन यदि उसका अंतिम परिणाम पर्यावरणीय आपदा है, तो हस्तक्षेप आवश्यक है
न्यायपालिका पर्यावरण की सभी समस्याओं का उत्तर नहीं है और न ही हो सकती है। यह संभव नहीं है। लेकिन यह सुनिश्चित करने का एक माध्यम जरूर बन सकती है कि सरकारों द्वारा बनाई गई नीतियां संवैधानिक हों। मैं चाहूंगा कि न्यायपालिका नीतिगत मामलों में और अधिक शामिल हो और साथ ही नीतियों की व्याख्या करने में और जहां नीतियां न हों, वहां संस्थान यह संकेत दे सकते हैं कि वह क्षेत्र रिक्त पड़ा है। ऐसे मामलों में, न्यायपालिका हस्तक्षेप कर सकती है। ऐसा नहीं है कि न्यायपालिका कानून नहीं बना सकती, जब किसी क्षेत्र में कोई कानून न हो, वैसी स्थिति में ही वह ऐसा कर सकती है।
उदाहरण के लिए जब मैं हिमाचल प्रदेश में था तो रोहतांग दर्रे पर लगातार ट्रैफिक जाम लगा रहता था। इसलिए मैंने शोध करने के लिए कहा और उन्होंने कहा कि प्रतिदिन एक्स संख्या में कारें ही वहां की वहन क्षमता है। न्यायिक आदेश द्वारा हमने कहा कि जब तक सरकार नीति नहीं बना लेती, तब तक प्रतिदिन केवल उतनी ही कारों की अनुमति दी जाएगी। इसी तरह के काम किए जाने की जरूरत है।
दुख की बात है कि मुझे लगता है कि न्यायपालिका पर्यावरणीय मामलों में पीछे हट रही है। हरित पीठ से अब उस तरह के रोमांचक आदेश देखने को नहीं मिलते जो हम पहले देखा करते थे। पटाखों पर प्रतिबंध लगाने वाले आदेशों को पलट दिया गया। 10 साल पुरानी कारों पर लगा प्रतिबंध पलट दिया गया। यहां तक कि ईंधन से संबंधित आदेश और मुझे लगता है कि बीएस-IV आदेश के संबंध में भी बदलाव हुआ था।
मुझे इस बात को लेकर दुख होता है कि प्रगतिशील तरीके से आगे बढ़ने के बजाय, हम पीछे हटते दिख रहे हैं। लेकिन मैं एक आशावादी व्यक्ति हूं। मुझे हमेशा लगता है कि चीजें बदलेंगी। जीवन में हमेशा एक चक्र होता है और यही बात न्यायपालिका के जीवन पर भी लागू होती है। कभी चीजें आगे बढ़ती हैं तो कभी पीछे हटती हैं। आज के मुद्दों को उठाने वाले युवाओं के रूप में आपको जिस चीज की आवश्यकता है, वह है दृढ़ता। आज न केवल प्रिंट मीडिया बल्कि सोशल मीडिया भी परिवर्तन का एक शक्तिशाली माध्यम है। आप सब पत्रकारों के रूप में परिवर्तन की एक बड़ी शक्ति हैं। इसलिए जब आप कोई स्टोरी करें तो केवल स्टोरी करके वहीं न रुकें। समाधान खोजने और सुझाने का भी प्रयास करें।
(दीपक गुप्ता भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और त्रिपुरा उच्च न्यायालय तथा छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रहे हैं। वह हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहे, जहां उन्होंने इसकी ग्रीन बेंच के प्रमुख के रूप में कार्य किया। यह लेख अनिल अग्रवाल डायलॉग 2026 में उनके द्वारा दिए गए भाषण का अंश है)