हल्की बारिश में बांसा गांव की कच्ची पगडंडी पर पैर कीचड़ में धंस रहे थे। सामने कैमूर की पहाड़ियों की गीली ढलान धुंध में आधी छिपी थी। "इसी ढलान ने कभी इस गांव के चूल्हे जलाए थे। करीब 15 साल पहले यहां खनन होता था और उससे घरों में आमदनी आती थी। खदानें बंद हुईं तो काम भी गया, और पलायन गांव की नियति बन गया।"
इसी गांव के बंधु साव शांत भाव से कहते हैं। अब पहाड़ फिर टूटेंगे, और यह खबर यहां डर नहीं, यह खबर उनके लिए बड़ी उम्मीद बनकर पहुंची है।
चौपाल पर बैठे बिघन चौधरी बारिश की ओर देखते हुए कहते हैं, "अगर यहीं काम मिल जाए तो बाहर जाने की जरूरत ही क्या है?" इस एक वाक्य में गांव की बेरोजगारी और पहाड़ के भविष्य का पूरा विरोधाभास सिमट आया था।
साल 2007 में बिहार सरकार ने जिन इलाकों में पत्थर खनन पर रोक लगाई थी, उन्हीं पहाड़ी इलाकों में अब फिर खनन ब्लॉकों की नीलामी प्रक्रिया शुरू हुई है। गायघाट और गिजवाही में खनन क्षेत्रों तक जाने वाले करीब 15 कच्चे रास्तों की पहचान की गई थी। ये रास्ते करीब 1,500 एकड़ में फैले उन खनन क्षेत्रों तक जाते थे, जो कभी अवैध उत्खनन के लिए बदनाम रहे थे। उन रास्तों को विस्फोट कर नष्ट करने के लिए निविदाएं आमंत्रित की गई थीं।
इन दोनों गांवों के पहाड़ों के आसपास घर हैं, खेत हैं और मवेशियों के चरने के रास्ते हैं। बरसात का पानी उन्हीं ढलानों और नालों से गुजरता है जिन्हें सरकारी नक्शे अब खनन ब्लॉक के रूप में चिह्नित कर रहे हैं। कागज पर यह खनिज को आर्थिक गतिविधि में बदलने की प्रक्रिया है। जमीन पर इसका मतलब है पहाड़ का कटना, भारी वाहनों की आवाजाही और बदलता भू-दृश्य।
गोपी बिगहा के संदीप चंद्रवंशी कहते हैं, "करवंदिया और जमुहार ही नहीं, डिलिया, अमरा तालाब, मदैनी, धौदरह, कंचनपुर, गोपी बिगहा, दावनपुर, गायघाट और वजीरगंज जैसे गाँव-कस्बे भी लंबे समय से खनन गतिविधियों के स्वास्थ्य प्रभावों का सामना कर रहे थे। सिलिकोसिस के प्रभाव से सैकड़ों परिवार प्रभावित हुए।”
साल 2016 में स्थानीय शेरशाह कॉलेज के प्रो. जयशंकर प्रसाद सिंह ने अपने शोध-पत्र में इस क्षेत्र की खनन गतिविधियों और उनके प्रभावों का अध्ययन किया था। उनके अनुसार, सासाराम–डेहरी क्षेत्र में स्टोन माइनिंग ने करीब 10,000 लोगों को रोजगार दिया, लेकिन 505 क्रशर प्लांटों से निकलने वाली धूल, शोर और जल प्रदूषण का असर करवंदिया सहित 21 गांवों पर पड़ा।
नए ब्लॉकों की पहली कतार में गांव
सितंबर 2026 में गायघाट और गिजवाही में पत्थर खनन के दो ब्लॉकों की बंदोबस्ती प्रक्रिया शुरू की गई। दोनों का कुल क्षेत्र करीब 13 हेक्टेयर है और प्रारंभिक निविदा राशि लगभग 24 करोड़ रुपए बताई गई है। गायघाट में करीब 1,500 और गिजवाही में लगभग 2,700 लोग रहते हैं। आसपास करवंदिया और जमुहार जैसे बड़े खनन केंद्र रहे हैं। उपलब्ध गांवों की आबादी और खनन परिवहन मार्गों के आधार पर इस शुरुआती प्रभाव क्षेत्र में 15,000 से 20,000 लोग आ सकते हैं। अनुमानतः करीब तीन दर्जन गाँव इस खनन भूगोल से जुड़े हैं और सासाराम नगर निगम का वार्ड 46 भी पहाड़ी पट्टी से सटा है।
रोजगार बनाम रोजमर्रा
खनन के पक्ष में आर्थिक तर्क साफ़ है। निर्माण उद्योग को पत्थर चाहिए, राज्य को राजस्व मिलेगा, और परिवहन, मशीनरी, लोडिंग व क्रशिंग से रोज़गार बन सकता है। बांसा गाँव के बंधू साव कहते हैं, "स्थानीय युवाओं के लिए यह अवसर महत्वपूर्ण हो सकता है।"
पर चिंता भी उतनी ही वास्तविक है। स्थानीय निवासी रामप्रवेश कहते हैं, "रोज़गार कुछ लोगों को मिलेगा, जबकि खनन से पैदा होने वाले बदलाव का असर पूरे समुदाय पर पड़ सकता है।" इसलिए सवाल खनन होना चाहिए या नहीं, इससे आगे का है। सवाल यह है कि खनन की लागत किसकी ज़िंदगी पर पड़ेगी और फ़ैसला लेने से पहले उसे कैसे मापा जाएगा।
नीलामी के बाद क्या-क्या मंजूरियाँ?
नीलामी दस्तावेज़ों में पर्यावरणीय स्वीकृति, प्रदूषण नियंत्रण संबंधी सहमति, स्वीकृत खनन योजना, जीपीएस, ड्रोन सर्वे, ई-चालान और उत्पादन की ऑनलाइन निगरानी दर्ज हैं। कहीं नहीं कहा गया कि खननकर्ता को पर्यावरणीय कानूनों से छूट मिलेगी।
कानूनी प्रक्रिया में पहले ब्लॉक की नीलामी और सफल बोलीदाता का चयन होता है। नीलामी खनन की अनुमति नहीं, सिर्फ़ खनन का अधिकार देती है। खनन तभी शुरू हो सकता है जब स्वीकृत खनन योजना, पर्यावरणीय स्वीकृति तथा प्रदूषण बोर्ड की स्थापना और संचालन की सहमति मिल जाए। बिहार के 2026 के आदेशों में कुछ ब्लॉकों के लिए नीलामी से पहले खनन योजना और पर्यावरणीय स्वीकृति कराने की व्यवस्था भी है। यानी यह क्रम अपने आप में अवैध नहीं ठहराया जा सकता। गायघाट–गिजवाही में मुख्य सवाल यह है कि कौन-सी मंज़ूरियाँ पहले उपलब्ध हैं और कौन-सी बाद में ली जानी हैं।
कैमूर में खनन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते रहे स्थानीय पत्रकार आलोक चमड़िया कहते हैं, "असली सवाल यह है कि आर्थिक फैसला और पर्यावरणीय मंजूरियाँ किस क्रम में आगे बढ़ती हैं और स्थानीय समुदाय उस पूरी प्रक्रिया को कितना देख और समझ सकता है।" उनके मुताबिक, जब बोली लग चुकी हो और निवेश का हिसाब शुरू हो चुका हो, तब आगे की पर्यावरणीय प्रक्रिया कितनी स्वतंत्र होगी, यह सार्वजनिक जाँच का विषय होना चाहिए। साथ ही यह भी कि आकलन एक खदान तक सीमित रहेगा या उस पूरे पहाड़ी क्षेत्र को देखेगा जहाँ पहले से खनन चल रहा है।
यही सवाल राज्य से है। क्या नीलामी से पहले इस क्षेत्र के जलस्रोतों, गाँवों, कृषि भूमि, आबादी और पहले से जारी खनन के संचयी प्रभाव का कोई आकलन हुआ? अगर हुआ, तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं है? और अगर नहीं, तो बसे हुए इलाके में नए ब्लॉकों की नीलामी किस आधार पर हो रही है? इन सवालों पर प्रकाशन तक खान एवं भूतत्व विभाग, जिला खनन पदाधिकारी, रोहतास और बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद की ओर से कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ।
पट्टे की सीमा, असर की सीमा नहीं
खनन पट्टे की सीमा और उसके प्रभाव की सीमा एक नहीं होती। पर्यावरण पत्रकार उमेश कुमार राय के अनुसार पहाड़ काटने के बाद चट्टान क्रशर तक जाएगी और वहाँ से ट्रकों के ज़रिए बाहर निकलेगी। इसलिए असर नीलामी में दर्ज ज़मीन तक सीमित नहीं रहेगा। परिवहन मार्ग, क्रशर, डंपिंग क्षेत्र और मलबे की आवाजाही साथ जुड़ेंगे।
इसका सबसे सीधा रूप सड़क और हवा में दिखेगा। खनन और जैव-विविधता के विशेषज्ञ शिवम कुमार के मुताबिक, "ड्रिलिंग, क्रशिंग और वाहनों से धूल बढ़ सकती है; ब्लास्टिंग से शोर और कंपन पैदा हो सकता है।" पीएम10, पीएम2.5 और कुछ चट्टानों से निकलने वाली सिलिका-युक्त धूल की निगरानी ज़रूरी होगी, पर उससे भी ज़रूरी यह है कि नतीजे स्थानीय लोगों के लिए सार्वजनिक हों। ब्लास्टिंग के सवाल परिवारों के लिए ठोस हैं। विस्फोट कितनी दूरी पर होंगे? कंपन की निगरानी कैसे होगी? घरों और स्कूलों की सुरक्षा के क्या मानक हैं? शिकायत हुई तो जवाबदेही किसकी होगी?
सड़क भी गाँव के लिए सिर्फ़ परिवहन मार्ग नहीं है। धनकरहा गाँव के बिश्वनाथ सिंह कहते हैं, "उसी रास्ते से किसान खेत जाता है, बच्चे स्कूल जाते हैं और मवेशी चरने निकलते हैं। यदि खनन के कारण पुराने चराई रास्ते बंद या सीमित होते हैं तो उसका असर सीधे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।" इसलिए स्थानीय चिंता को सिर्फ़ खनन-विरोध कहना गलत होगा। यह भूमि उपयोग और आजीविका का सवाल है।
पानी और पहाड़ का हिसाब
पहाड़ी ढलानें, चट्टानी संरचनाएँ और प्राकृतिक नालियाँ वर्षाजल के बहाव और जल पुनर्भरण से जुड़ी होती हैं। चट्टान हटाने से पानी के रास्ते प्रभावित हो सकते हैं, हालाँकि असली असर स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। इसलिए खनन से पहले साफ़ होना चाहिए कि हर ब्लॉक किस जलग्रहण क्षेत्र में आता है, आसपास के जलस्रोत कौन-से हैं और बरसात में मलबा व तलछट खेतों और नालों तक पहुँचने की कितनी आशंका है। यह जानकारी पहले होगी, तभी बाद में किसी बदलाव को मापा जा सकेगा।
भू-दृश्य का नुकसान अलग किस्म का है। वनवासी सेवा केंद्र के अध्यक्ष डॉ. सदानंद राय कहते हैं, "पहाड़ से निकला पत्थर बाज़ार में चला जाएगा, लेकिन मूल चट्टानी संरचना वापस नहीं आएगी।" उनके अनुसार पुनर्वास योजना सिर्फ़ पौधे लगाने या गड्ढे भरने तक सीमित नहीं रह सकती। उसे बताना होगा कि खनन के बाद भूमि, जलनिकासी और जैविक आवास किस हाल में छोड़े जाएँगे और इसकी निगरानी कौन करेगा।
जीपीएस और ड्रोन: निगरानी या औपचारिकता?
जीपीएस लगा होना या ड्रोन सर्वे का प्रावधान होना अपने आप में अवैध उत्खनन रोकने की गारंटी नहीं है। ड्रोन कितनी बार उड़ेंगे, पूरा क्षेत्र कवर होगा या नहीं, और डेटा सार्वजनिक होगा या नहीं, ये सवाल अनुत्तरित हैं।
डेहरी-ऑन-सोन के वरिष्ठ पत्रकार उपेंद्र मिश्र कहते हैं, "ई-चालान और ऑनलाइन उत्पादन रिकॉर्ड तभी प्रभावी नियंत्रण बनेंगे जब वास्तविक उत्पादन का मिलान स्वीकृत सीमा, तौल-पुल और परिवहन रिकॉर्ड से हो। वरना डिजिटल व्यवस्था केवल कागज़ी निगरानी का नया रूप बनकर रह सकती है।"
यही बात स्वीकृति के हस्तांतरण पर लागू होती है। संचालक बदले तो पुरानी शर्तें नए संचालक पर कैसे लागू होंगी और लोगों को कैसे पता चलेगा? हर खदान की स्वीकृति, अनुपालन रिपोर्ट, उत्पादन सीमा, वायु-जल निगरानी और कार्रवाई का रिकॉर्ड एक सार्वजनिक मंच पर हो, तभी तकनीक जवाबदेही का माध्यम बनेगी।
सबसे बड़ी चुनौती: संचयी प्रभाव
संचयी प्रभाव का मतलब है कई खदानों, क्रशरों और ट्रकों का एक ही इलाके पर पड़ने वाला कुल दबाव। करवंदिया और जमुहार जैसे मौजूदा केंद्रों के बीच नए ब्लॉक जुड़ें और विस्तार की तैयारी हो, तो किसी एक परियोजना का आकलन पूरी तस्वीर नहीं देगा। गिजवाही का प्रभाव क्षेत्र एक गाँव तक सीमित नहीं है। धनकरहा, कुर्दाउन, धौदनर और गायघाट से लेकर फाज़िलपुर, अदमापुर, अमरा, बसंतपुर, अमरी, बसा, घाटमापुर, कंचनपुर और कोटा तक गाँवों की पूरी पट्टी इससे जुड़ी है। यहाँ परियोजना-दर-परियोजना अनुपालन काफ़ी नहीं होगा। पूरे क्षेत्र की वहन-क्षमता, जलग्रहण और परिवहन दबाव का संयुक्त आकलन ज़रूरी है। हर खदान अपनी शर्त पूरी करे, फिर भी सब मिलकर सीमा पार कर दें, तो कागज़ पर अनुपालन और ज़मीन पर सुरक्षा के बीच का अंतर साफ़ दिखेगा।
पत्थर गया या सिर्फ़ धूल बची
गायघाट और गिजवाही में असली सवाल सिर्फ़ खनन के पक्ष या विपक्ष का नहीं है। युवाओं के लिए रोज़गार ज़रूरी है और राज्य के लिए राजस्व भी। पर ग्रामीणों के लिए खेत, पानी, चारागाह और सुरक्षित आवागमन भी उतने ही वास्तविक संसाधन हैं। किसी परियोजना की सफलता सिर्फ़ इससे नहीं नापी जानी चाहिए कि कितना पत्थर निकला या कितनों को रोज़गार मिला। यह भी देखना होगा कि कितने ट्रक चले, सड़क का क्या हाल हुआ, कितनी शिकायतें आईं, कितनी शर्तों की जाँच हुई और उल्लंघन पर कितनी बार कार्रवाई हुई। ये आँकड़े सार्वजनिक होंगे तो बहस अनुमान के बजाय प्रमाण पर टिकेगी।
खनन क्षेत्र के बेहद करीब स्थित जमुहार स्थित नारायण मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल खनन गतिविधियों के लिहाज से विशेष रूप से संवेदनशील संस्थान है। "जहां मरीज उपचार और आराम की स्थिति में रहते हैं, इसलिए भारी वाहनों की धूल, लगातार शोर और ब्लास्टिंग से होने वाले कंपन का असर सामान्य आबादी की तुलना में अधिक गंभीर हो सकता है" बांदू गाँव के नीरज कुमार पांडेय कहते हैं । अस्पताल के आसपास यातायात और वायु-प्रदूषण बढ़ना उपचार के अनुकूल वातावरण को भी प्रभावित कर सकता है, क्योंकि यह मेडिकल कॉलेज पहाड़ी के बेहद करीब है।
"कैमूर की पहाड़ियों को सरकार के दस्तावेजों में खनिज का भंडार माना जा रहा है, लेकिन इन्हीं में हजारों वर्ष पुराना मानव इतिहास भी दर्ज है। सासाराम के बेहद करीब इन पहाड़ियों में सौ से अधिक प्रागैतिहासिक शैलाश्रयों में बने चित्र और उत्कीर्णन केवल पत्थर पर निशान नहीं, बल्कि उस सभ्यता के प्रमाण हैं जो लिखित इतिहास से बहुत पहले यहां मौजूद थी" पुरातत्वविद डॉ० श्यामसुंदर तिवारी कहते हैं। "बरहामसिया, हथियामान, छमासियामान, कोनवमान, छौकोनवामान जैसे स्थलों के बीच नए खनन ब्लॉक खोलने की तैयारी इसलिए सिर्फ पहाड़ तोड़ने का मामला नहीं है। सवाल यह है कि क्या नीलामी और खनन की रफ्तार में वह इतिहास भी कुचल दिया जाएगा, जिसकी कीमत तय करने का कोई सरकारी पैमाना ही नहीं है?" डॉ० तिवारी पूछते हैं।
यह सवाल लोकमानस को और भी परेशान कर रही कि ब्लास्टिंग से पैदा होने वाला कंपन, पत्थर कटाई और क्रशर की धूल, चट्टानों की कटाई तथा प्राकृतिक जल प्रवाह में बदलाव इन स्थलों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नुकसान पहुँचा सकते हैं-- इसके बावजूद मूल सवाल और बड़ा है—जब सरकार को पता है कि इन्हीं पहाड़ियों में प्रागैतिहासिक विरासत मौजूद है, तो खनन की नीलामी से पहले उसकी सुरक्षा का स्वतंत्र और अनिवार्य आकलन क्यों नहीं किया गया?
नीलामी की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। आर्थिक हिसाब जल्द शुरू हो जाएगा। लेकिन पहाड़, पानी और गाँव का हिसाब लंबा चलेगा। अगर निगरानी को नीलामी के बाद की औपचारिकता समझा गया और समुदाय को सिर्फ़ "प्रभावित आबादी" मानकर छोड़ दिया गया, तो कुछ वर्षों बाद इलाके में सिर्फ़ उत्पादन का नहीं, नुकसान का भी हिसाब होगा।
आलोक चमड़िया कहते हैं, "तब सवाल यह नहीं रहेगा कि रोहतास से कितना पत्थर निकला। सवाल होगा कि उसके बदले कितनी पहाड़ी बदली, कितने रास्ते बदले, कितने खेत दबाव में आए, कितने जलस्रोत प्रभावित हुए और कितने गाँवों ने अपने आसपास की पुरानी दुनिया को बदलते देखा। सरकार ने पत्थर की कीमत लगा दी है। क्या उसने यह भी हिसाब लगाया है कि पहाड़ टूटने के बाद गाँव को क्या खोना पड़ेगा? नीलामी में बिकने वाला पत्थर वापस लाया जा सकता है। लेकिन टूटे पहाड़, बदले जलस्रोत और मिटे शैलचित्र नहीं।"